UN Warning: हिमालय की ग्लेशियर झीलों से बढ़ा GLOF का खतरा, UN ने दी गंभीर चेतावनी

ग्लोबल वार्मिंग से बढ़ा GLOF जोखिम, भारत-नेपाल की लाखों आबादी पर मंडरा रहा संकट

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UN Warning: वैश्विक तापमान में हो रही अनियंत्रित वृद्धि और तेजी से बदलते जलवायु चक्र के बीच संयुक्त राष्ट्र (UN) ने हिमालयी क्षेत्र को लेकर एक अत्यंत चिंताजनक और आपात चेतावनी जारी की है। संयुक्त राष्ट्र के पर्यावरण व आपदा विशेषज्ञों के अनुसार, हिमालय की अत्यधिक ऊंचाई पर स्थित सैकड़ों हिमनद झीलें (Glacial Lakes) अस्थिर होकर फटने के कगार पर पहुंच रही हैं। यदि इनमें समय रहते जल निकासी और प्रभावी प्रबंधन नहीं किया गया, तो ये झीलें किसी भी समय भीषण ‘ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड’ (GLOF) का रूप ले सकती हैं। इस संभावित जल प्रलय की सीधी जद में भारत, नेपाल और तिब्बत (चीन) के संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्र तथा तलहटी में बसी घनी आबादी वाले लाखों नागरिक आ सकते हैं।
अगस्त के अंत में नेपाल के उच्च हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर और भारी चट्टानी संरचना टूटने से भोटेकोशी व त्रिशूली नदी घाटियों में मची भीषण तबाही ने इस चेतावनी की गंभीरता को कई गुना बढ़ा दिया है। नेपाल त्रासदी में एक हजार से अधिक लोगों की मौत, सैकड़ों का विस्थापन और प्रमुख जलविद्युत परियोजनाओं के पूरी तरह ध्वस्त होने की घटना ने यह स्पष्ट कर दिया है कि हिमालय अब केवल प्राकृतिक सुंदरता और मीठे पानी का स्रोत नहीं, बल्कि एक अति-संवेदनशील पर्यावरणीय टाइम बम में तब्दील हो रहा है।

UN Warning: क्या होता है ‘GLOF’ और कैसे प्राकृतिक बांध बनते हैं तबाही का सबब?

ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी हिमनद झील विस्फोट बाढ़ (GLOF) पर्वतीय क्षेत्रों में अचानक आने वाली सबसे घातक आपदाओं में से एक है। जब विशालकाय हिमनद (ग्लेशियर) अत्यधिक गर्मी या जलवायु परिवर्तन के कारण तेजी से पिघलते हैं, तो उनका पानी ग्लेशियर के ठीक नीचे या पास में जमा होने लगता है। इन झीलों को रोकने के लिए कोई सीमेंट या कंक्रीट की दीवार नहीं होती, बल्कि ये बर्फ, ढीली मिट्टी, बोल्डर और पत्थरों से बने प्राकृतिक बांधों (Moraine Dam) के सहारे टिकी होती हैं।
जब इन झीलों में पानी की मात्रा उनकी धारण क्षमता से अधिक हो जाती है, या फिर ऊपर से हिमस्खलन, बादल फटने अथवा विशाल चट्टानों के गिरने से भारी कंपन होता है, तो ये कमजोर मोरेन बांध अचानक टूट जाते हैं। इसके परिणामस्वरूप लाखों क्यूसेक पानी, गाद और भारी मलबे के साथ अत्यधिक तीव्र गति से नीचे की ओर दौड़ता है। सामान्य नदी बाढ़ की तुलना में जीएलओएफ की गति इतनी तेज होती है कि निचले इलाकों में रहने वाले लोगों को सुरक्षित स्थानों पर भागने का चंद मिनटों का समय भी नहीं मिल पाता। रास्ते में आने वाले गांव, राष्ट्रीय राजमार्ग, पुल और बांध ताश के पत्तों की तरह बह जाते हैं।

ग्लोबल वार्मिंग से पिघलते ‘थर्ड पोल’ के ग्लेशियर: क्यों बढ़ रहा है विस्फोट का जोखिम?

हिमालयी क्षेत्र को ध्रुवों के बाद दुनिया का सबसे बड़ा बर्फ भंडार माना जाता है, जिसके कारण इसे भूवैज्ञानिक ‘थर्ड पोल’ (तीसरा ध्रुव) भी कहते हैं। हालांकि, औद्योगीकरण और ग्रीनहाउस गैसों के बढ़ते उत्सर्जन से हिमालय का औसत तापमान वैश्विक औसत की तुलना में लगभग दोगुनी रफ्तार से बढ़ रहा है। अंतरराष्ट्रीय पर्वतीय विकास केंद्र (ICIMOD) और संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की हालिया रिपोर्टों से पता चलता है कि हिमालय के ग्लेशियर पिछले तीन दशकों में 65 प्रतिशत अधिक तेजी से पिघल रहे हैं।
इस अनियंत्रित पिघलाव के चलते जहां एक ओर ग्लेशियर सिकुड़कर पीछे हट रहे हैं, वहीं उनके मुहाने पर नई-नई कृत्रिम झीलों की संख्या और क्षेत्रफल में खतरनाक वृद्धि हो रही है। समस्या केवल पानी के फैलाव तक सीमित नहीं है, बल्कि ‘पर्माफ्रॉस्ट’ (हजारों वर्षों से जमी हुई जमीन की बर्फ) के पिघलने से पूरी पहाड़ी ढलानें ढीली और अस्थिर हो रही हैं। इसके साथ ही बेमौसम होने वाली भीषण बारिश और बादलों का फटना इन झीलों पर दबाव को चरम स्तर पर पहुंचा देता है, जिससे इनके प्राकृतिक किनारे किसी भी क्षण टूटने का जोखिम बना रहता है।

भारत के लिए खतरे की घंटी: उत्तराखंड, सिक्किम और हिमाचल की 200 झीलों पर नजर

संयुक्त राष्ट्र की यह चेतावनी भारत के लिए अत्यंत गंभीर राष्ट्रीय सुरक्षा और आपदा प्रबंधन का विषय है। भारत के हिमालयी राज्य—जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश—सीधे तौर पर इन ग्लेशियरों की पारिस्थितिकी से जुड़े हुए हैं। भारत ने पहले भी इस तरह की विभीषिका के गहरे घाव झेले हैं। वर्ष 2013 की भीषण केदारनाथ त्रासदी (चोराबाड़ी झील का टूटना), वर्ष 2021 की चमोली आपदा (ऋषिगंगा और धौलीगंगा में जल प्रलय) और अक्टूबर 2023 में सिक्किम की ल्होनक झील (South Lhonak Lake) के फटने से तीस्ता बांध का बह जाना इसी प्रकृति की विनाशकारी घटनाएं थीं।
भारत सरकार के राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) और केंद्रीय जल आयोग (CWC) के अध्ययनों के अनुसार, भारतीय हिमालय में मौजूद हजारों हिमनद झीलों में से लगभग 189 झीलों को ‘अत्यधिक उच्च जोखिम’ (High Risk) की श्रेणी में चिन्हित किया गया है। नेपाल की ताजा बाढ़ के बाद भारतीय भूवैज्ञानिकों ने उत्तराखंड, हिमाचल और सिक्किम की करीब 200 झीलों पर विशेष तकनीकी निगरानी शुरू कर दी है, क्योंकि इन झीलों के मुहाने से निकलने वाली नदियां गंगा, ब्रह्मपुत्र और सिंधु की प्रमुख सहायक नदियां हैं। यदि इनमें विस्फोट होता है, तो सीमावर्ती बुनियादी ढांचे और सैकड़ों हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स को अपूरणीय क्षति पहुंच सकती है।

नेपाल पर दोहरा संकट: जलविद्युत ढांचा और घनी आबादी सबसे ज्यादा असुरक्षित

नेपाल भौगोलिक रूप से हिमालय के सबसे दुर्गम और ढलान वाले मध्य क्षेत्र में बसा हुआ है, जिसके चलते वह जीएलओएफ की घटनाओं के प्रति विश्व में सबसे अधिक संवेदनशील देशों में गिना जाता है। नेपाल की अधिकांश ग्रामीण आबादी, बाजार, कृषि भूमि और लाइफलाइन माने जाने वाले प्रमुख राजमार्ग संकरी नदी घाटियों के किनारे ही बसे हुए हैं। इसके अतिरिक्त, नेपाल की पूरी राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था और ऊर्जा उत्पादन उसकी तेज बहने वाली नदियों पर बने हाइड्रोपावर प्लांट्स पर टिकी है।
नेपाल में अगस्त में आई बाढ़ के दौरान सिंधुपालचौक, रासुवा और काठमांडू से जुड़े संपर्क मार्गों का पूरी तरह कट जाना तथा 15 से अधिक जलविद्युत इकाइयों का बंद होना यह दर्शाता है कि एक छोटी सी झील या ग्लेशियर का टूटना पूरे देश की अर्थव्यवस्था को पंगु बना सकता है। काठमांडू स्थित वैज्ञानिकों का आकलन है कि नेपाल और तिब्बत सीमा पर स्थित कम से कम 21 ग्लेशियर झीलें वर्तमान में ‘खतरनाक रूप से अस्थिर’ स्थिति में हैं, जिनमें छो रोल्पा (Tsho Rolpa) और इम्जा (Imja) झीलें प्रमुख हैं। यदि इनमें से कोई भी झील फटी, तो सीमा पार भारत के उत्तरी बिहार और उत्तर प्रदेश के मैदानी इलाकों में भी अप्रत्याशित सैलाब आ सकता है।

क्या आधुनिक सैटेलाइट और अर्ली वार्निंग तकनीक रोक सकती हैं आपदा?

इस विकराल संकट के सामने यह सवाल सबसे अहम है कि क्या हमारे पास मौजूद आधुनिक अंतरिक्ष और रडार तकनीक इस तबाही को रोकने में सक्षम हैं। इसरो के ‘कार्टोसैट’, ‘रिसैट’ और नासा-इसरो के संयुक्त ‘निसार’ (NISAR) जैसे सिंथेटिक अपर्चर रडार उपग्रह अंतरिक्ष से इन झीलों के जलस्तर, आयतन और बांधों में आ रही दरारों की निरंतर तस्वीरें ले रहे हैं। इसके साथ ही उच्च हिमालयी झीलों पर ऑटोमेटेड वेदर स्टेशन (AWS), वॉटर लेवल सेंसर्स और सायरन आधारित अर्ली वार्निंग सिस्टम (EWS) स्थापित करने के प्रयास तेज किए गए हैं।
हालांकि, भू-वैज्ञानिकों का स्पष्ट मानना है कि तकनीक हमें केवल ‘पूर्व चेतावनी’ दे सकती है, वह आपदा के घटित होने को पूरी तरह नहीं टाल सकती। उच्च हिमालयी क्षेत्रों में मौसम इतना अप्रत्याशित और दुर्गम होता है कि कई बार भारी बादलों, बर्फबारी या संचार नेटवर्क ठप होने से डेटा ट्रांसमिशन में विलंब हो जाता है। इसके अलावा, जीएलओएफ की प्रक्रिया इतनी त्वरित होती है कि चेतावनी जारी होने और पानी के आबादी तक पहुंचने के बीच का समय अत्यंत कम होता है। इसलिए तकनीक के साथ-साथ झीलों से नियंत्रित रूप से पानी बाहर निकालने के लिए ‘साइफनिंग’ और इंजीनियरिंग चैनलों के निर्माण जैसे स्थायी भौतिक उपाय करना अनिवार्य हो गया है।

UN Warning: सीमा पार जल सहयोग और भविष्य की ठोस कार्ययोजना

हिमालय का भूगोल किसी एक देश की राजनीतिक सीमाओं में बंधा नहीं है। तिब्बत से निकलने वाली नदियां नेपाल और भारत से होकर बहती हैं, जबकि नेपाल की सभी नदियां अंततः भारत के गंगा बेसिन में समाहित होती हैं। ऐसे में संयुक्त राष्ट्र ने स्पष्ट किया है कि भारत, नेपाल, भूटान और चीन के बीच पारदर्शी, त्वरित और बहुपक्षीय ‘हाइड्रोलॉजिकल डेटा शेयरिंग’ (जल संबंधी सूचनाओं का आदान-प्रदान) के बिना इस महाविनाश से निपटना असंभव है।
आपदा पूर्व सूचना प्रणाली को मजबूत करने के साथ-साथ तीनों देशों को संवेदनशील नदी घाटियों में अंधाधुंध बुनियादी ढांचा निर्माण, बिना वैज्ञानिक अध्ययन के बनने वाले बांधों और अनियंत्रित पर्यटन पर तुरंत लगाम लगानी होगी। स्थानीय स्तर पर पर्वतीय समुदायों को निकासी योजनाओं और मॉक ड्रिल के जरिए प्रशिक्षित करना होगा ताकि खतरे की पहली घंटी बजते ही लोग सुरक्षित स्थानों पर पहुंच सकें। समय रहते उठाए गए सामूहिक वैज्ञानिक कदम ही हिमालय की इन झीलों को भविष्य के ‘जल प्रलय’ में बदलने से रोक सकते हैं।

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