Treadmill Invention History: फिटनेस के लिए नहीं, तड़पाने के लिए हुआ था ट्रेडमिल का आविष्कार, जानें इसका खौफनाक इतिहास
Treadmill Invention History: साल 1818 में विलियम क्यूबिट ने बनाई थी टॉर्चर मशीन, कैदियों से पिसवाया जाता था अनाज, 1898 में लगी रोक।
Treadmill Invention History: आज के समय में जब हम फिट रहने की बात करते हैं, तो जिम में सबसे पहले ‘ट्रेडमिल’ का नाम दिमाग में आता है। वजन कम करना हो या खुद को एक्टिव रखना, ट्रेडमिल पर दौड़ना एक आधुनिक लाइफस्टाइल का हिस्सा बन चुका है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिस मशीन का इस्तेमाल आज हम अपनी सेहत बनाने के लिए करते हैं, उसका इतिहास बेहद डरावना और दर्दनाक रहा है?
हैरानी की बात यह है कि ट्रेडमिल का आविष्कार फिटनेस के लिए नहीं, बल्कि कैदियों को सजा देने के लिए किया गया था। साल 1818 में जब इसे पहली बार बनाया गया, तो यह किसी टॉर्चर मशीन से कम नहीं थी। आइए विस्तार से जानते हैं ट्रेडमिल के उस खौफनाक सफर के बारे में, जो जेल की कालकोठरियों से शुरू होकर आज के आधुनिक जिम तक पहुंचा है।
Treadmill Invention History: विलियम क्यूबिट ने 1818 में बनाई थी पहली ‘ट्रेडवील’
ट्रेडमिल का असली इतिहास 19वीं सदी की शुरुआत से जुड़ा है। ब्रिटेन के एक जाने-माने सिविल इंजीनियर विलियम क्यूबिट (William Cubitt) ने 1818 में इस मशीन का आविष्कार किया था। उस समय उन्होंने इसे ‘ट्रेडमिल’ नहीं, बल्कि ‘ट्रेडवील’ (Treadwheel) नाम दिया था।
विलियम क्यूबिट का मकसद लोगों को सेहतमंद बनाना बिल्कुल नहीं था। दरअसल, उस समय जेलों में कैदियों को अनुशासित करने और उनसे कड़ी मेहनत करवाने के लिए किसी सख्त सजा की जरूरत महसूस की जा रही थी। क्यूबिट ने इसी समस्या का समाधान निकालने के लिए एक बड़ा लकड़ी का पहिया तैयार किया, जिस पर कैदियों को घंटों तक लगातार चलना पड़ता था।
कैदियों के लिए खौफ का दूसरा नाम थी यह मशीन
ट्रेडमिल का वह शुरुआती मॉडल आज के जैसा छोटा और आरामदायक नहीं था। वह एक विशाल बेलनाकार पहिया होता था, जिस पर लकड़ी की सीढ़ियां बनी होती थीं। जब यह पहिया घूमता था, तो कैदियों को उस पर इस तरह चलना पड़ता था जैसे वे कभी न खत्म होने वाली सीढ़ियां चढ़ रहे हों।
इस मशीन पर चलते समय कैदियों को जरा भी सुस्ताने का मौका नहीं मिलता था। अगर कोई कैदी अपनी रफ्तार धीमी करता या रुकने की कोशिश करता, तो वह सीधे नीचे गिर सकता था। गिरने के डर से कैदी अपनी पूरी ताकत लगाकर उस पहिए पर कदम मिलाते रहते थे। यह शारीरिक और मानसिक, दोनों तरह से एक बेहद थका देने वाला टॉर्चर था।
रोज 6 से 8 घंटे तक कैदियों को मिलती थी सजा
उस समय की जेलों में यह नियम था कि कैदियों को दिनभर में कम से कम 6 से 8 घंटे तक इस मशीन पर चलना ही होगा। अगर हम आज के हिसाब से तुलना करें, तो यह किसी ऊंची पहाड़ी पर लगातार चढ़ने जैसा था।
अनुमान लगाया जाता है कि एक कैदी इस मशीन पर चलते हुए रोजाना लगभग 10 से 15 हजार फीट की ऊंचाई जितनी चढ़ाई कर लेता था। लगातार इतनी मेहनत और खराब खान-पान के कारण कई कैदी गंभीर रूप से बीमार पड़ जाते थे और कुछ की तो मौत तक हो जाती थी।
सजा के साथ-साथ अनाज पीसने में होता था इस्तेमाल
विलियम क्यूबिट ने इस मशीन को इस तरह डिजाइन किया था कि कैदियों की मेहनत बेकार न जाए। कैदी जब इस विशाल पहिए पर चलते थे, तो उससे पैदा होने वाली ऊर्जा का इस्तेमाल भारी पत्थरों को घुमाने में किया जाता था। इससे अनाज पीसा जाता था या फिर कुओं से पानी निकाला जाता था।
इसी वजह से इसका नाम ‘ट्रेडमिल’ पड़ा, जिसमें ‘ट्रेड’ का अर्थ है कदम रखना और ‘मिल’ का अर्थ है चक्की। हालांकि, कई जेलों में बिना किसी काम के भी कैदियों को सिर्फ सजा के तौर पर इस पर चलाया जाता था। वहां इसका एकमात्र उद्देश्य कैदियों को शारीरिक रूप से तोड़ना और उन्हें सजा का अहसास कराना था।
Treadmill Invention History: 19वीं सदी के अंत में क्यों लगा दी गई रोक?
जैसे-जैसे समय बीतता गया, इस मशीन की क्रूरता दुनिया के सामने आने लगी। मानवाधिकारों और जेल सुधारों पर काम करने वाले लोगों ने इसे अमानवीय करार दिया। यह बात साफ हो गई कि ट्रेडमिल कैदियों में सुधार लाने के बजाय उन्हें शारीरिक रूप से अपाहिज बना रही थी।
कैदियों पर हो रहे इस अत्याचार के खिलाफ आवाजें उठने लगीं और 19वीं सदी के खत्म होते-होते ब्रिटेन और अमेरिका की जेलों में इस मशीन के इस्तेमाल पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया गया। साल 1898 के ‘प्रिज़न एक्ट’ के तहत इसे एक क्रूर सजा मानकर बंद कर दिया गया।
Treadmill Invention History: जेल से जिम तक का सफर, कैसे बदली ट्रेडमिल की परिभाषा?
जेलों में प्रतिबंध लगने के कई दशकों बाद, ट्रेडमिल ने एक नए रूप में वापसी की। 20वीं सदी के मध्य में डॉक्टरों और वैज्ञानिकों ने महसूस किया कि नियंत्रित तरीके से पैदल चलना या दौड़ना हृदय स्वास्थ्य (Heart Health) के लिए बहुत फायदेमंद है।
साल 1952 में डॉ. रॉबर्ट ब्रूस और वेन क्विनटन ने पहली बार मेडिकल उद्देश्यों के लिए आधुनिक ट्रेडमिल का इस्तेमाल किया। इसके बाद 1960 के दशक में ‘एरोबिक्स’ के जनक डॉ. केनेथ कूपर ने घर पर एक्सरसाइज करने के लिए इसके फायदों के बारे में बताया। तब से लेकर आज तक, यह मशीन लगातार अपडेट होती रही और अब इसमें सेंसर, स्क्रीन और हार्ट रेट मॉनिटर जैसी सुविधाएं जुड़ चुकी हैं।
आज हम ट्रेडमिल का इस्तेमाल अपनी मर्जी से और अपनी सुविधा के अनुसार करते हैं, लेकिन इसका इतिहास हमेशा हमें याद दिलाता रहेगा कि कभी यह इंसानों के लिए सबसे डरावनी सजाओं में से एक हुआ करती थी।
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