Supreme Court Verdict: ‘गरीब न्याय की कतार में खड़े हैं, लग्जरी मुकदमेबाजी नहीं चलेगी’; 11 साल पुराने विवाद में दोनों पक्षों पर 5-5 लाख रुपये जुर्माना
11 साल पुराने विवाद में कोर्ट ने लग्जरी मुकदमेबाजी पर जताई नाराजगी, याचिकाएं खारिज
Supreme Court Verdict: देश की शीर्ष अदालत ने संपन्न और साधन संपन्न लोगों द्वारा अपनी निजी रंजिश, अहंकार और प्रतिष्ठा की खातिर अदालतों का कीमती समय बर्बाद करने की बढ़ती प्रवृत्ति पर बेहद तल्ख और सख्त रुख अपनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि देश के लाखों गरीब, असहाय और वास्तविक फरियादी वर्षों से न्याय की कतार में खड़े होकर अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं। ऐसे संवेदनशील माहौल में प्रभावशाली पक्षों द्वारा अनर्गल और अंतहीन रूप से चलाई जाने वाली ‘लग्जरी मुकदमेबाजी’ (Luxury Litigation) को किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की संयुक्त खंडपीठ ने एक दशक से भी अधिक पुराने यानी 11 साल लंबे विवाद का निपटारा करते हुए दोनों पक्षों—अभिनेत्री रेहाना खान और उनके पूर्व वकील रिजवान सिद्दीकी—की याचिकाओं को खारिज कर दिया। अदालत ने न्यायिक तंत्र का भारी समय बर्बाद करने, महत्वपूर्ण तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करने और व्यवस्था का दुरुपयोग करने के लिए दोनों पक्षों पर पांच-पांच लाख रुपये का भारी जुर्माना (Cost) लगाया है।
11 साल पुराना विवाद: मुवक्किल और वकील के बीच तकरार की पूरी पृष्ठभूमि
यह पूरा कानूनी विवाद वर्ष 2013-14 के दौरान शुरू हुआ था, जब अभिनेत्री रेहाना खान ने अपने कुछ कानूनी मामलों के निस्तारण के लिए एडवोकेट रिजवान सिद्दीकी को अपना अधिकृत वकील नियुक्त किया था। कुछ समय बाद दोनों पक्षों के बीच मतभेद उत्पन्न हो गए, जिसने आगे चलकर एक बेहद कड़वे कानूनी संघर्ष का रूप ले लिया। अभिनेत्री ने अपने पूर्व वकील पर गंभीर व्यावसायिक कदाचार (Professional Misconduct) का आरोप लगाते हुए बार काउंसिल में औपचारिक शिकायत दर्ज कराई थी।
शिकायत में मुख्य रूप से यह आरोप लगाया गया था कि वकील ने अपने मुवक्किल के स्पष्ट निर्देशों और सहमति के बिना कानूनी नोटिस जारी किए, मुवक्किल से जुड़ी अत्यंत गोपनीय और संवेदनशील व्यक्तिगत जानकारी को सार्वजनिक मीडिया में लीक किया और सोशल मीडिया व सार्वजनिक मंचों पर अपमानजनक टिप्पणियां कीं। बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) की अनुशासनात्मक समिति ने विस्तृत जांच के बाद वकील को कदाचार का दोषी ठहराया था और उनके नाम को दो साल के लिए एडवोकेट्स रोल से निलंबित (सस्पेंड) कर दिया था। इसके साथ ही वकील पर 3 लाख रुपये मुवक्किल को देने और 2 लाख रुपये बार काउंसिल वेलफेयर फंड में जमा करने का आदेश दिया गया था। इस निर्णय को बॉम्बे हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट में दोनों ही पक्षों द्वारा लगातार चुनौती दी जाती रही।
अदालत कोई सभागार नहीं और मुकदमा कोई थिएटर नहीं: पीठ की कड़ी फटकार
सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ ने अपने विस्तृत फैसले में दोनों पक्षों के कानूनी आचरण पर गहरा असंतोष व्यक्त किया। पीठ ने कहा कि यह एक ऐसा मामला है जहां दोनों पक्ष अदालत के समक्ष गलत काम की शिकायत लेकर आए हैं, किंतु वास्तविकता यह है कि वे दोनों ही इस पूरे तमाशे के लिए समान रूप से जिम्मेदार हैं। इन दोनों पक्षों ने पिछले 11 वर्षों के दौरान बार काउंसिल ऑफ इंडिया, बॉम्बे हाईकोर्ट और अंततः सुप्रीम कोर्ट के बहुमूल्य घंटों का उपभोग किया, जो समय वास्तव में उन निर्दोष और पीड़ित फरियादियों का था जो न्याय की सच्ची उम्मीद में अदालतों के चक्कर काट रहे हैं।
पीठ ने अपने आदेश में अत्यंत व्यंग्यात्मक और गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा कि इन मामलों की केस फाइलें देखने और पढ़ने में काफी आकर्षक या नाटकीय लग सकती हैं, किंतु देश की अदालतें कोई सार्वजनिक सभागार (ऑडिटोरियम) या थिएटर नहीं हैं। किसी भी मुकदमे का नाटकीय पहलू उसकी कानूनी योग्यता का पैमाना नहीं हो सकता। थिएटर के इस पर्दे को हटाकर देखा जाए तो यह विवाद दोनों पक्षकारों द्वारा स्वयं तैयार किया गया, जानबूझकर लंबा खींचा गया और शीर्ष अदालत तक पहुंचाया गया। दोनों पक्ष यह उम्मीद कर रहे थे कि अदालत उनके इस तमाशे को देखकर उनके अपने गलत आचरण और योगदान को नजरअंदाज कर देगी, लेकिन कानून की अदालतें ऐसी चालों को कतई प्रश्रय नहीं दे सकतीं।
तथ्यों को दबाने और निजी रंजिश के लिए न्याय तंत्र के इस्तेमाल पर रोक
अदालत ने अपने आदेश में रेखांकित किया कि इस पूरे मामले के दौरान दोनों ही पक्षों ने वास्तविक तथ्यों को दबाने, छोटी बातों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने और बाद में नए सिरे से गढ़े गए बयानों (Afterthoughts) का सहारा लिया। न्यायाधीशों को हर एक महत्वपूर्ण बिंदु को रिकॉर्ड से खींचकर बाहर निकालना पड़ा। पीठ ने साफ किया कि न्याय की मशीनरी पक्षकारों की व्यक्तिगत सुविधा का साधन नहीं है कि वे जब चाहें अपने निजी विवादों को निपटाने, अपनी स्व-निर्मित प्रतिष्ठा को बचाने अथवा अपने ही खड़े किए गए विवादों से अनुचित लाभ उठाने के लिए अदालतों को माध्यम बना लें।
पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि न तो याचिकाकर्ता और न ही प्रतिवादी इस अदालत से किसी भी प्रकार की सहानुभूति या भरोसा लेकर जा सकते हैं। जब सक्षम और धनाढ्य लोग अपने अहं की तुष्टि के लिए न्यायपालिका के दरवाजे खटखटाते हैं और तारीख पर तारीख लेकर प्रक्रिया को खींचते हैं, तो इसका सीधा और विनाशकारी प्रभाव उन गरीब वादियों पर पड़ता है जिनकी जमानत याचिकाएं, भूमि विवाद या पारिवारिक मामले वर्षों से लंबित पड़े रहते हैं। न्यायपालिका एक सीमित सार्वजनिक संसाधन है और इसका व्यावसायिक या व्यक्तिगत दुरुपयोग न्याय के मूल सिद्धांतों पर सीधा कुठाराघात है।
Supreme Court Verdict: चार सप्ताह के भीतर जुर्माना जमा करने का कड़ा आदेश और निलंबन बरकरार
सुप्रीम कोर्ट ने मामले का अंतिम निपटारा करते हुए दोनों पक्षों की सभी अपीलों और अंतरिम अर्जियों को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने दोनों पक्षों को निर्देश दिया कि वे आदेश जारी होने के चार सप्ताह के भीतर पांच-पांच लाख रुपये की जुर्माना राशि सुप्रीम कोर्ट लीगल सर्विसेज कमेटी (SCLSC) के खाते में अनिवार्य रूप से जमा कराएं। यदि निर्धारित समय सीमा के भीतर इस राशि का भुगतान नहीं किया जाता है, तो कानून के तहत वसूली की कठोर प्रक्रिया शुरू की जाएगी।
इसके अतिरिक्त बार काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा संबंधित वकील के खिलाफ दिए गए दो साल के निलंबन आदेश और जुर्माने को अदालत ने पूरी तरह बरकरार रखा है। फैसले के बाद जब दोनों पक्षों की ओर से सार्वजनिक प्रतिष्ठा का हवाला देते हुए फैसले में से अपने नाम हटाने (Redaction of Names) का मौखिक अनुरोध किया गया, तो पीठ ने उसे भी तत्काल प्रभाव से खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि चूंकि फैसला खुली अदालत में सुनाया जा चुका है और पूरा विवाद दोनों पक्षों का ही रचा हुआ था, इसलिए इसमें नाम छिपाने का कोई कानूनी आधार नहीं बनता।
Supreme Court Verdict: न्यायिक व्यवस्था, पेशेवर नैतिकता और आम नागरिकों के लिए बड़ा संदेश
सर्वोच्च न्यायालय का यह ऐतिहासिक निर्णय देश के संपूर्ण विधिक तंत्र, वकीलों और मुवक्किलों के लिए एक अत्यंत कड़ा और स्पष्ट संदेश है। यह फैसला उन सभी लोगों के लिए एक नजीर है जो मामूली और व्यक्तिगत अहंकार से जुड़े विवादों को दशकों तक खींचकर अदालतों पर बोझ बढ़ाते हैं। अदालत ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि वकील और मुवक्किल के बीच का संबंध अटूट विश्वास और गोपनीयता के सिद्धांत पर आधारित होता है, और व्यावसायिक मर्यादाओं का उल्लंघन करने वाले वकीलों को कड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई का सामना करना पड़ेगा।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा लगाया गया यह दस लाख रुपये का कुल जुर्माना सुप्रीम कोर्ट लीगल सर्विसेज कमेटी को जाएगा, जिसका सीधा उपयोग उन गरीब, वंचित और असहाय कैदियों व वादियों को मुफ्त कानूनी सहायता उपलब्ध कराने में किया जाएगा जो आर्थिक तंगी के कारण अपना पक्ष रखने में असमर्थ होते हैं। शीर्ष अदालत की इस सख्त टिप्पणी ने यह पुन: स्थापित किया है कि भारतीय न्यायपालिका की सर्वोच्च प्राथमिकता देश के अंतिम पायदान पर खड़े उस आम नागरिक को न्याय दिलाना है जो वर्षों से अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहा है।
Read More Here