Indian Agriculture: देश में मानसून की बारिश 14% कम, खरीफ फसलों की बुआई 16 लाख हेक्टेयर घटी; धान की खेती पर सबसे बड़ा संकट
खरीफ बुआई 16.07 लाख हेक्टेयर घटी, धान का रकबा 13.19 लाख हेक्टेयर कम हुआ
Indian Agriculture: दक्षिण-पश्चिम मानसून की चाल में अगस्त के दूसरे पखवाड़े में आई अचानक सुस्ती ने देश के कृषि क्षेत्र और किसानों के माथे पर चिंता की लकीरें गहरी कर दी हैं। अगस्त की शुरुआत में देश के कई हिस्सों में हुई संतोषजनक बारिश के बाद मानसूनी गतिविधियों में आई अचानक गिरावट के कारण राष्ट्रीय स्तर पर संचयी वर्षा का घाटा बढ़कर 14 प्रतिशत तक पहुंच गया है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 1 जून से 23 अगस्त 2026 तक की अवधि में मानसूनी वर्षा का वितरण देश के विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में अत्यधिक असमान रहा है।
इस असमान मानसूनी वर्षा का सीधा और प्रतिकूल प्रभाव देश भर में चल रही चालू खरीफ फसलों की बुआई पर स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा जारी ‘ऑल इंडिया क्रॉपवाइज प्रोग्रेसिव एरिया सोन’ की नवीनतम रिपोर्ट के मुताबिक, देशभर में खरीफ फसलों का कुल बुआई रकबा पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में 16.07 लाख हेक्टेयर यानी लगभग 1.50 प्रतिशत पिछड़ गया है। इसमें सबसे बड़ा झटका देश की मुख्य खाद्य फसल धान (चावल) की रोपाई को लगा है, जिसके रकबे में 13.19 लाख हेक्टेयर से अधिक की भारी गिरावट दर्ज की गई है।
Indian Agriculture: क्षेत्रीय स्तर पर मानसून का गंभीर असंतुलन और कम मानसूनी बारिश के आंकड़े
भारत मौसम विज्ञान विभाग के क्षेत्रीय वर्षा विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि देश के विभिन्न हिस्सों में मानसूनी बादलों की मेहरबानी बेहद असंतुलित रही है। मौसम विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, पूर्वी और उत्तर-पूर्वी भारत के राज्यों में इस मानसूनी सीजन के दौरान सामान्य से सबसे अधिक 27 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई है। इस क्षेत्र में बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल और असम जैसे प्रमुख कृषि प्रधान राज्य शामिल हैं, जहां पर्याप्त मानसूनी फुहारों के अभाव में खेत सूखे पड़े हैं।
इसके अलावा दक्षिण-प्रायद्वीपीय भारत के राज्यों में भी वर्षा की कमी 23 प्रतिशत के चिंताजनक स्तर पर पहुंच चुकी है। कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के कई आंतरिक कृषि मंडलों में मानसूनी ब्रेक के कारण भूजल और सतही जल स्रोतों पर दबाव बढ़ गया है। वहीं उत्तर-पश्चिम भारत के राज्यों—पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश—में वर्षा की कमी अपेक्षाकृत कम यानी 11 प्रतिशत दर्ज की गई है, किंतु इन क्षेत्रों के भी कई गैर-सिंचित जिलों में फसलों के विकास के लिए आवश्यक नमी का गंभीर संकट बना हुआ है।
खरीफ फसलों के बुआई रकबे में गिरावट और धान की खेती पर मंडराता संकट
खरीफ सीजन भारतीय कृषि अर्थव्यवस्था और ग्रामीण आजीविका की रीढ़ माना जाता है। देश में खाद्यान्न सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण मानी जाने वाली फसलें जैसे धान, मक्का, बाजरा, सोयाबीन, मूंगफली, कपास, अरहर और उड़द इसी सीजन में बोई जाती हैं। कृषि मंत्रालय द्वारा 21 अगस्त 2026 तक संकलित किए गए आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, कुल खरीफ बुआई में आई 16.07 लाख हेक्टेयर की कमी का लगभग 82 प्रतिशत हिस्सा अकेले धान की फसल से जुड़ा हुआ है।
धान की खेती पूर्ण रूप से जल-गहन होती है और इसकी रोपाई के लिए खेतों में लगातार खड़े पानी की आवश्यकता होती है। पूर्वी राज्यों और प्रायद्वीपीय भारत में मानसूनी बारिश में आए लंबे अंतराल (Monsoon Break) के चलते किसानों को धान की नर्सरी तैयार करने और खेतों में रोपाई टालने पर विवश होना पड़ा है। पिछले वर्ष की तुलना में धान के रकबे में 3.15 प्रतिशत की शुद्ध कमी दर्ज की गई है। कृषि अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यदि बुआई का यह अंतर समय रहते नहीं भरा गया, तो आगामी महीनों में देश में चावल के कुल उत्पादन और केंद्रीय पूल में सरकारी खरीद पर सीधा असर पड़ सकता है।
मौसम प्रणालियों की स्थिति: ट्रफ लाइन का हिमालय की ओर खिसकना बना मुख्य कारण
मौसम विज्ञानियों के अनुसार, मानसूनी वर्षा में आई इस अचानक कमी का प्राथमिक कारण मानसून ट्रफ (Monsoon Trough) का अपनी सामान्य स्थिति से उत्तर दिशा में खिसककर हिमालय की तलहटी के पास चले जाना है। मौसम विज्ञान की भाषा में इस स्थिति को ‘मानसून ब्रेक’ कहा जाता है। जब मानसूनी द्रोणिका हिमालयी तराई की ओर शिफ्ट हो जाती है, तब मध्य, पश्चिमी और दक्षिणी भारत के मैदानी इलाकों में मानसूनी हवाओं का प्रवाह कमजोर पड़ जाता है और बादलों का बनना बंद हो जाता है।
इसके साथ ही, बंगाल की खाड़ी और अरब सागर में इस अवधि के दौरान सक्रिय होने वाले निम्न दबाव क्षेत्रों (Low-Pressure Systems) की तीव्रता और आवृत्ति भी उम्मीद से कम रही है। हालांकि जुलाई माह के दौरान कुछ मजबूत मौसमी प्रणालियों ने मध्य भारत में बारिश का कोटा पूरा किया था, किंतु अगस्त में उन प्रणालियों की अनुपस्थिति ने मानसूनी घाटे को तेजी से 14 प्रतिशत तक पहुंचा दिया, जिससे मिट्टी की ऊपरी सतह की नमी तेजी से सूखने लगी है।
बंगाल की खाड़ी में बने निम्न दबाव से पूर्वी भारत में भारी बारिश की नई उम्मीद
देशभर में गहराते सूखे के खतरे के बीच मौसम विभाग ने एक राहत भरी चेतावनी भी जारी की है। भारत मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार, उत्तर-पश्चिम बंगाल की खाड़ी और उससे सटे ओडिशा-पश्चिम बंगाल के तटीय क्षेत्रों में एक नया निम्न दबाव का क्षेत्र (Low Pressure Area) सक्रिय हो रहा है। इसके प्रभाव से आगामी 24 से 27 अगस्त 2026 के दौरान पूर्वी और मध्य भारत के कई हिस्सों में तेज और मूसलाधार बारिश का नया दौर शुरू होने की प्रबल संभावना है।
मौसम विभाग के पूर्वानुमान के अनुसार, 24 से 26 अगस्त के दौरान ओडिशा और 24 व 25 अगस्त को छत्तीसगढ़ के कई हिस्सों में भारी से अत्यंत भारी वर्षा हो सकती है। इसके अतिरिक्त, गांगेय पश्चिम बंगाल में 24 अगस्त को, झारखंड में 24 से 27 अगस्त तक और बिहार के दक्षिणी व मध्य भागों में 24 से 26 अगस्त के दौरान व्यापक वर्षा का अनुमान है। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि यह आगामी मानसूनी बौछार पूर्वी राज्यों में धान की बची हुई रोपाई को पूरा करने और खेतों में खड़ी फसलों को जीवनदान देने में अत्यंत संजीवनी साबित होगी।
प्रायद्वीपीय भारत में शुष्क मौसम की चेतावनी और किसानों के सामने चुनौतियां
एक तरफ जहां पूर्वी भारत में मानसूनी बारिश के पुनर्जीवित होने के आसार हैं, वहीं दूसरी ओर दक्षिण-प्रायद्वीपीय भारत के अधिकांश राज्यों के लिए मौसम विभाग का अनुमान चिंताजनक बना हुआ है। विस्तारित अवधि पूर्वानुमान (Extended Range Forecast) के अनुसार, कर्नाटक, केरल, आंतरिक महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश के अधिकांश जिलों में अगले एक से दो हफ्तों तक मानसूनी गतिविधियां सामान्य से काफी कमजोर और शुष्क रहने की संभावना जताई गई है।
दक्षिणी राज्यों में पहले से ही 23 प्रतिशत वर्षा की भारी कमी चल रही है। ऐसे में बारिश के अभाव से कपास, मूंगफली, सोयाबीन और दलहनी फसलों की वानस्पतिक वृद्धि (Vegetative Growth) प्रभावित हो सकती है। जिन किसानों के पास नलकूप, नहर या ड्रिप इरिगेशन की सुविधा उपलब्ध है, वे तो अपनी फसलों को बचा पा रहे हैं, किंतु विशुद्ध रूप से वर्षा-आधारित (Rainfed) क्षेत्रों में खेती करने वाले छोटे और सीमांत किसानों के सामने अपनी लागत डूबने का गंभीर संकट खड़ा हो गया है।
खाद्य सुरक्षा, मुद्रास्फीति और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर संभावित आर्थिक प्रभाव
खरीफ उत्पादन का सीधा संबंध देश की वृहद अर्थव्यवस्था, ग्रामीण क्रय शक्ति और खाद्य महंगाई से होता है। धान और दलहन के रकबे में कमी आने से भविष्य में खाद्य वस्तुओं की थोक और खुदरा कीमतों में अस्थिरता बढ़ने का जोखिम रहता है। हालांकि, केंद्र सरकार के पास भारतीय खाद्य निगम (FCI) के गोदामों में चावल और गेहूं का पर्याप्त बफर स्टॉक सुरक्षित है, जो किसी भी आपातकालीन मांग को नियंत्रित करने में पूरी तरह सक्षम है।
फिर भी, ग्रामीण इलाकों में कृषि उत्पादन घटने से कृषि श्रमिकों के रोजगार और ग्रामीण उपभोग की मांग पर नकारात्मक असर पड़ता है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) और आर्थिक नीति निर्माता भी मानसून की चाल पर लगातार नजर बनाए हुए हैं, क्योंकि खाद्य मुद्रास्फीति पर नियंत्रण ही ब्याज दरों और देश की आर्थिक विकास दर को दिशा प्रदान करता है। विशेषज्ञों का कहना है कि सितंबर माह में मानसूनी बारिश का प्रदर्शन यह तय करने में निर्णायक भूमिका निभाएगा कि देश का अंतिम कृषि उत्पादन लक्ष्य किस हद तक हासिल हो सकेगा।
Indian Agriculture: जिला स्तर पर निगरानी और किसानों के लिए आवश्यक कृषि सलाह
वर्तमान चुनौतीपूर्ण मानसूनी परिदृश्य को देखते हुए केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने सभी प्रभावित राज्यों के साथ मिलकर जिला स्तरीय आपातकालीन कृषि कार्ययोजना (Contingency Plan) को सक्रिय कर दिया है। राज्य सरकारों को निर्देशित किया गया है कि वे प्रमुख जलाशयों, नहरों और नलकूपों से बिजली की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करें ताकि किसानों को सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी मिल सके।
कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को सलाह दी है कि जहां धान की रोपाई संभव न हो पाई हो, वहां किसान कम अवधि में पकने वाली दलहनी फसलों (जैसे उड़द व मूंग), तिलहन (जैसे तोरिया) अथवा मोटे अनाजों (जैसे बाजरा व मक्का) की बुआई का विकल्प चुनें। इसके साथ ही, खेतों में नमी संरक्षण के लिए मल्चिंग तकनीकों का उपयोग करने और खरपतवारों को तुरंत हटाने का निर्देश दिया गया है ताकि उपलब्ध नमी का पूरा लाभ मुख्य फसल को मिल सके। किसान मौसम विभाग के ‘दामिनी’ और ‘मेघदूत’ मोबाइल ऐप्स के माध्यम से सटीक मौसम पूर्वानुमान देखकर ही उर्वरकों और कीटनाशकों का छिड़काव करें।
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