Rabies Virus: क्या रेबीज संक्रमित गाय का दूध पीने से फैलता है वायरस? जानें WHO की गाइडलाइन और बचाव के तरीके

गोरखपुर में संदिग्ध रेबीज संक्रमित गाय के दूध से बने चरणामृत के सेवन के बाद सैकड़ों लोगों को एंटी-रेबीज वैक्सीन लगाए जाने की खबर सामने आई।

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Rabies Virus: उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले से सामने आई एक असामान्य घटना ने पूरे देश में स्वास्थ्य विशेषज्ञों और आम नागरिकों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। यहां एक संदिग्ध रूप से रेबीज संक्रमित गाय के दूध से तैयार चरणामृत का सेवन करने के बाद स्वास्थ्य विभाग द्वारा एहतियातन लगभग 450 ग्रामीणों को एंटी-रेबीज वैक्सीन (ARV) लगाई गई। इस घटना के बाद से समाज में यह सवाल अत्यंत तेजी से उठ रहा है कि क्या किसी रेबीज पीड़ित पशु—विशेषकर गाय या भैंस—का दूध पीने से इंसानों में यह जानलेवा न्यूरोट्रॉपिक वायरस फैल सकता है? क्या दूध को उबालने या उससे दही, पनीर व मक्खन जैसे डेयरी उत्पाद बनाने पर संक्रमण का खतरा समाप्त हो जाता है? इन सभी गंभीर संशयों पर भारत सरकार के राष्ट्रीय रेबीज नियंत्रण कार्यक्रम (NRCP), राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (NCDC) और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के वैज्ञानिक दिशा-निर्देश स्थिति को पूरी तरह स्पष्ट करते हैं।

Rabies Virus: गोरखपुर में चरणामृत सेवन के बाद क्यों मची अफरा-तफरी?

यह सनसनीखेज मामला गोरखपुर जनपद के दो ग्रामीण क्षेत्रों में आयोजित धार्मिक अनुष्ठान के दौरान सामने आया। दुर्गा पूजा महोत्सव के अवसर पर बांटे गए चरणामृत को जिस गाय के दूध से तैयार किया गया था, कुछ ही दिनों बाद उस गाय में अचानक आक्रामक व्यवहार, अत्यधिक लार टपकाने और पानी से डरने जैसे संदिग्ध लक्षण देखे गए, जिसके उपरांत उसकी मृत्यु हो गई। प्राथमिक आशंका जताई गई कि उक्त गाय को कुछ सप्ताह पूर्व किसी पागल या लावारिस कुत्ते ने काट लिया था।

गाय की मृत्यु और उसमें रेबीज जैसे लक्षणों की बात फैलते ही प्रसाद ग्रहण करने वाले सैकड़ों ग्रामीणों में दहशत का माहौल बन गया। ग्रामीणों के व्यापक दबाव और किसी भी संभावित जोखिम से बचने के लिए स्थानीय स्वास्थ्य प्रशासन ने त्वरित कार्रवाई करते हुए चरणामृत का सेवन करने वाले 450 से अधिक लोगों को चिन्हित किया और उन्हें एहतियाती प्रोटोकॉल के तहत एंटी-रेबीज टीकाकरण की खुराक देना शुरू कर दिया। हालांकि, पशु के शव का प्रयोगशाला परीक्षण न होने के कारण रेबीज की आधिकारिक पुष्टि नहीं हो सकी थी, किंतु इस कदम ने दूध जनित रेबीज संक्रमण की वैज्ञानिक संभावनाओं पर एक राष्ट्रव्यापी बहस छेड़ दी।

क्या संक्रमित गाय का दूध पीने से इंसान को रेबीज हो सकता है?

चिकित्सा विज्ञान और महामारी विज्ञान (Epidemiology) के स्थापित तथ्यों के अनुसार, रेबीज से पीड़ित किसी भी पशु का दूध पीने या उससे बने डेयरी उत्पादों का सेवन करने से आज तक विश्व में एक भी ऐसा पुष्ट मानव मामला दर्ज नहीं हुआ है, जिसमें संक्रमण का कारण केवल दूध पीना रहा हो। केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अधीन संचालित राष्ट्रीय रेबीज नियंत्रण कार्यक्रम (NRCP) और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की आधिकारिक गाइडलाइंस स्पष्ट रूप से रेखांकित करती हैं कि ओरल रूट यानी पाचन तंत्र के माध्यम से रेबीज वायरस के संचरण का कोई वैज्ञानिक प्रमाण मौजूद नहीं है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, रेबीज वायरस मुख्य रूप से केंद्रीय तंत्रिका तंत्र और लार ग्रंथियों (Salivary Glands) को प्रभावित करता है। गाय या भैंस के दूध में वायरस के जीवित कणों का उत्सर्जन होना अत्यंत दुर्लभ माना जाता है। इसके अलावा, यदि कोई व्यक्ति अनजाने में ऐसा दूध पी भी लेता है, तो पेट में मौजूद हाइड्रोक्लोरिक एसिड (HCl) और गैस्ट्रिक एंजाइम इस लिपिड-एनवेलप्ड वायरस को तुरंत नष्ट कर देते हैं। यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय मानकों के तहत केवल संक्रमित पशु का दूध पीने की स्थिति को ‘कैटेगरी-1’ एक्सपोजर माना जाता है, जिसमें सामान्यतः पोस्ट-एक्सपोजर प्रोफिलैक्सिस (PEP) या वैक्सीन लगाने की सिफारिश नहीं की जाती। इसके बावजूद, सार्वजनिक स्वास्थ्य के कड़े एहतियाती नियमों के तहत विशेषज्ञ हमेशा रेबीज से पीड़ित या अस्वस्थ पशुओं के दूध का किसी भी रूप में उपयोग न करने की सख्त सलाह देते हैं।

रेबीज वायरस के संचरण का वास्तविक और वैज्ञानिक मार्ग

रेबीज एक जानलेवा ज़ूनोटिक वायरल संक्रमण है, जो केवल तभी फैलता है जब संक्रमित जानवर की लार सीधे मानव शरीर की संवेदनशील ऊतकों या रक्तप्रवाह में प्रवेश करती है। वायरस मुख्य रूप से संक्रमित जानवर के दांतों के घाव, गहरे खरोंच या त्वचा के कटे-फटे हिस्सों के जरिए सीधे पेरिफेरल नसों तक पहुंचता है और वहां से रीढ़ की हड्डी होते हुए मस्तिष्क को अपनी चपेट में लेता है।

यदि किसी व्यक्ति के मुंह में ताजे छाले, मसूड़ों से खून बहने की समस्या या भोजन नली में खुला घाव हो, केवल उसी अत्यंत सैद्धांतिक स्थिति में कच्चे संक्रमित दूध के संपर्क से जोखिम की परिकल्पना की जा सकती है, लेकिन सामान्य स्वस्थ पाचन नली में इसका खतरा व्यावहारिक रूप से नगण्य रहता है। भारत में 96 प्रतिशत से अधिक रेबीज संक्रमण कुत्तों के काटने या खरोंचने से होते हैं, जबकि शेष मामलों में बिल्ली, बंदर या जंगली मांसाहारी जीव जिम्मेदार होते हैं।

क्या दूध उबालने और पाश्चुरीकरण से निष्क्रिय हो जाता है वायरस?

रेबीज एक अत्यंत थर्मो-लायबिल (गर्मी के प्रति अत्यधिक संवेदनशील) वायरस है। इसका अर्थ यह है कि तापमान में मामूली वृद्धि होते ही इस वायरस की बाहरी वसायुक्त परत टूट जाती है और यह पूरी तरह निष्क्रिय हो जाता है। राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (NCDC) के पशु जन्य रोग विशेषज्ञों के अनुसार, दूध को सामान्य रूप से उबालने (Boiling) या व्यावसायिक पाश्चुरीकरण (Pasteurization) तापमान पर गर्म करने से रेबीज का वायरस कुछ ही सेकंडों में निष्प्रभावी हो जाता है।

हालांकि, स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि उबले हुए दूध के विपरीत, दूध को बिना गर्म किए उससे दही जमाना, पनीर बनाना या कच्चा सेवन करना जोखिम भरा हो सकता है। किण्वन (Fermentation) की प्रक्रिया सूक्ष्मजीवों को समाप्त करने की गारंटी नहीं देती, इसलिए कच्चे दूध से बने उत्पादों का उपयोग किसी भी परिस्थिति में नहीं किया जाना चाहिए।

Rabies Virus: पशु संपर्क की स्थिति में क्या करें और कब लें डॉक्टरी सलाह?

यदि किसी व्यक्ति को किसी पागल, संदिग्ध या आक्रामक जानवर ने काटा या खरोंचा है, तो इसे मेडिकल इमरजेंसी माना जाना चाहिए। ऐसी स्थिति में बिना किसी देशी नुस्खे, मिर्च या हल्दी लगाए, घाव को तुरंत बहते नल के पानी और साबुन से लगातार 15 मिनट तक अच्छी तरह धोना चाहिए। यह प्राथमिक उपचार घाव में मौजूद वायरस के लोड को 70 से 80 प्रतिशत तक कम कर देता है।

इसके तत्काल बाद सरकारी अस्पताल या योग्य चिकित्सक से संपर्क कर रेबीज रोधी टीके (ARV) और गहरे घाव होने पर रेबीज इम्युनोग्लोबुलिन (RIG) का इंजेक्शन समय सारिणी के अनुसार लगवाना चाहिए। लक्षणों के प्रकट होने के बाद रेबीज लाइलाज हो जाता है, इसलिए समय पर किया गया टीकाकरण ही जीवन रक्षा का एकमात्र अचूक उपाय है। दुधारू पशुओं के बीमार होने पर पशु चिकित्सकों की सलाह लेनी चाहिए और किसी भी अस्वस्थ पशु का दूध मानव उपभोग में लाने से पूर्णतः परहेज करना चाहिए।

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