Diwali 2026: अयोध्या से कोलकाता तक, भारत के इन 7 शहरों में अनोखे अंदाज में मनाई जाती है दिवाली
भारत में दिवाली का त्योहार अलग-अलग राज्यों और शहरों में अपनी विशिष्ट परंपराओं के साथ मनाया जाता है।
Diwali 2026: सनातन संस्कृति और भारतीय लोकजीवन में दीपावली का महापर्व केवल रोशनी और मिष्ठान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश की असीम सांस्कृतिक और धार्मिक विविधता का सबसे जीवंत उत्सव है। कार्तिक मास की अमावस्या को समूचा राष्ट्र दीपों की आभा से जगमगा उठता है, किंतु भारत के विभिन्न भूभागों में इस पर्व को मनाने की परंपराएं, ऐतिहासिक संदर्भ और अनुष्ठान एक-दूसरे से काफी अलग और अनूठे हैं। कहीं मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम के 14 वर्ष के वनवास के पश्चात अयोध्या लौटने का उल्लास है, तो कहीं महाकाली की तांत्रिक व सात्विक साधना का विधान है। कहीं यह दिन सिख इतिहास के गौरवमयी बंदी छोड़ दिवस के रूप में श्रद्धा से मनाया जाता है, तो कहीं भगवान श्रीकृष्ण द्वारा आतातायी नरकासुर के वध का प्रतीक बनता है। यदि आप दिवाली के इस पावन अवसर पर भारत के अलग-अलग कोनों की जीवंत परंपराओं और उत्सव के विशिष्ट स्वरूप को नजदीक से देखना चाहते हैं, तो देश के प्रमुख सात शहरों का यह सांस्कृतिक सफर अत्यंत ज्ञानवर्धक और मनोहारी सिद्ध होगा।
Diwali 2026: अयोध्या का विश्वविख्यात दीपोत्सव और सरयू के जगमगाते घाट
भगवान श्री राम की जन्मस्थली अयोध्या में दीपावली का उत्सव अपनी ऐतिहासिक और आध्यात्मिक जड़ों से सीधा जुड़ता है। वाल्मीकि रामायण और लोक मान्यताओं के अनुसार, लंका विजय के उपरांत जब प्रभु श्री राम, माता जानकी और लक्ष्मण के साथ पुष्पक विमान से अयोध्या पधारे थे, तब नगरवासियों ने पूरी अयोध्या को दीपों की कतारों से सजाकर उनका स्वागत किया था। इसी पावन स्मृति को जीवंत रखते हुए अयोध्या में प्रतिवर्ष भव्य ‘दीपोत्सव’ का आयोजन किया जाता है।
अयोध्या में सरयू नदी के राम की पैड़ी, गुप्तार घाट और नया घाट सहित सभी प्रमुख तटों पर लाखों मिट्टी के पारंपरिक दीपक एक साथ प्रज्वलित किए जाते हैं, जिससे पूरी नदी का जल स्वर्णिम आभा से दमक उठता है। भव्य नवनिर्मित श्री राम जन्मभूमि मंदिर परिसर और कनक भवन में विशेष वैदिक अनुष्ठान और लेजर शो का आयोजन होता है। देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों और रामभक्तों के लिए अयोध्या की यह अलौकिक दिवाली आस्था और भव्यता का अप्रतिम संगम पेश करती है।
वाराणसी में मां अन्नपूर्णा का स्वर्ण दर्शन और दशाश्वमेध घाट की महाआरती
मोक्ष की नगरी काशी में दीपावली का आरंभ धनतेरस से ही एक दुर्लभ और पावन परंपरा के साथ होता है। वाराणसी स्थित मां अन्नपूर्णा मंदिर के स्वर्णमयी गर्भगृह के कपाट आम श्रद्धालुओं के लिए वर्ष में केवल धनतेरस से लेकर अन्नकूट तक के कुछ विशेष दिनों के लिए ही खोले जाते हैं। इस दौरान मंदिर परिसर में भगवान कुबेर और मां अन्नपूर्णा के साक्षात दर्शन होते हैं और श्रद्धालुओं को धान की बाली व सिक्कों का ‘अक्षय भंडार’ प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है, जिसके बारे में मान्यता है कि इसे तिजोरी में रखने से कभी अन्न-धन की कमी नहीं होती।
दिवाली की पावन संध्या पर काशी के चौरासी घाटों, विशेषकर दशाश्वमेध, अस्सी और मणिकर्णिका घाट पर हजारों दीपों की ज्योति मां गंगा की लहरों पर तैरती दिखाई देती है। दशाश्वमेध घाट पर होने वाली दैनिक गंगा आरती इस दिन महाआरती का रूप ले लेती है, जहां वैदिक ब्राह्मणों द्वारा शंखनाद, डमरू वादन और अग्नि दीपों के साथ होने वाली वंदना का साक्षी बनना किसी भी साधक के लिए जीवनभर का आध्यात्मिक अनुभव बन जाता है। इसके पश्चात कार्तिक पूर्णिमा को काशी की प्रसिद्ध ‘देव दीपावली’ का महाउत्सव भी समूचे विश्व को अपनी ओर आकर्षित करता है।
जयपुर और उदयपुर में रजवाड़ी शान और झीलों के शहर का दीपोत्सव
राजस्थान के ऐतिहासिक शहरों में दिवाली का पर्व राजपूताना वैभव और राजसी ठाठ-बाट के साथ मनाया जाता है। गुलाबी नगरी जयपुर में धनतेरस से लेकर भाई दूज तक पूरे परकोटे के ऐतिहासिक बाजारों—जैसे जौहरी बाजार, बापू बाजार, त्रिपोलिया और किशनपोल बाजार—को दुल्हन की तरह सजाया जाता है। जयपुर में व्यापारियों और नगर प्रशासन के बीच सबसे सुंदर रोशनी प्रतियोगिता की परंपरा दशकों पुरानी है। हवा महल, आमेर किला और नाहरगढ़ की पहाड़ियों से नीचे देखने पर ऐसा प्रतीत होता है मानो तारों भरा आसमान धरती पर उतर आया हो।
वहीं झीलों की नगरी उदयपुर में दिवाली का दृश्य अत्यंत शांत और विस्मयकारी होता है। पिछोला झील, फतेह सागर और जयसमंद झील के किनारे बने सिटी पैलेस, जग मंदिर और लेक पैलेस की जगमगाहट जब शांत जल में प्रतिबिंबित होती है, तो वह दृश्य शब्दों से परे होता है। पारंपरिक राजस्थानी पोशाकों में सजे लोग, लोक कलाकारों की प्रस्तुतियां और पारंपरिक मावे की मिठाइयों की खुशबू राजस्थान की दिवाली को अविस्मरणीय सांस्कृतिक पहचान प्रदान करती है।
कोलकाता में महाकाली की निशा पूजा और भव्य पंडाल संस्कृति
पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता और समूचे बंगाल में दिवाली का स्वरूप देश के बाकी हिस्सों से बिल्कुल अलग और रहस्यमयी होता है। जहां उत्तर और पश्चिमी भारत में इस रात धन की देवी लक्ष्मी और विघ्नहर्ता गणेश की पूजा होती है, वहीं बंगाल में कार्तिक अमावस्या की गहन अंधियारी रात में संहार और शक्ति की अधिष्ठात्री देवी मां काली की ‘श्यामा पूजा’ संपन्न की जाती है।
कोलकाता शहर में दक्षिणेश्वर काली मंदिर, कालीघाट और काली बाड़ियों में तंत्र और वैदिक दोनों परंपराओं के अनुसार मध्यरात्रि में मां काली का आह्वान किया जाता है। पूरे महानगर में भव्य, विशाल और कलात्मक पंडाल सजाए जाते हैं, जहां मां काली की विशाल प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं। ढाक की गूंज, धूप-आरती की सुगंध और लाखों श्रद्धालुओं की कतारें पूरी रात कोलकाता की सड़कों पर जीवंतता बनाए रखती हैं। पश्चिम बंगाल में दिवाली प्रकाश पर्व के साथ-साथ शक्ति की उपासना और बुराई पर आंतरिक विजय का महापर्व मानी जाती है।
अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में बंदी छोड़ दिवस का पावन इतिहास
पंजाब के अमृतसर में दिवाली का दिन सिख समुदाय के लिए अत्यंत पावन और ऐतिहासिक माना जाता है, जिसे ‘बंदी छोड़ दिवस’ के रूप में श्रद्धापूर्वक मनाया जाता है। सिख इतिहास के अनुसार, इसी दिन सिखों के छठे गुरु, गुरु हरगोबिंद साहिब जी मुग़ल बादशाह जहांगीर की कैद से ग्वालियर के किले से सकुशल रिहा होकर पवित्र नगरी अमृतसर पहुंचे थे। गुरु साहिब ने केवल अपनी रिहाई स्वीकार नहीं की, बल्कि अपने चोले के 52 छोरों के साथ 52 निर्दोष हिंदू राजाओं को भी मुग़ल कारागार से सम्मानपूर्वक मुक्त कराया था।
इस ऐतिहासिक विजय और गुरु आगमन की खुशी में स्वर्ण मंदिर (श्री हरमंदिर साहिब) के विशाल परिसर और पवित्र अमृत सरोवर के चारों ओर लाखों दीप और मोमबत्तियां जलाई जाती हैं। पूरा स्वर्ण मंदिर परिसर स्वर्णिम रोशनी से नहा उठता है और रात के समय सरोवर में होने वाली आतिशबाजी व गुरुवाणी की मधुर गूंज श्रद्धालुओं के मन में भक्ति और त्याग की भावना भर देती है। यहां की दिवाली भाईचारे, परोपकार और स्वतंत्रता के मानवीय मूल्यों का सर्वोच्च प्रतीक है।
असम में मिट्टी और बांस के दीयों से लोक संस्कृति का प्रकटीकरण
पूर्वोत्तर भारत के प्रमुख राज्य असम में दिवाली को स्थानीय संस्कृति और प्रकृति के साथ एकाकार करके मनाया जाता है। गुवाहाटी, तेजपुर, सिलचर और डिब्रूगढ़ में दिवाली की रात मां काली की विशेष पूजा का विधान है। प्राचीन नीलांचल पर्वत पर स्थित मां कामाख्या देवी के शक्तिपीठ परिसर में इस रात तांत्रिक साधकों और गृहस्थ भक्तों का तांता लगा रहता है, जहां हजारों दीपों से शक्तिपीठ को आलोकित किया जाता है।
असम के ग्रामीण अंचलों में प्लास्टिक या कृत्रिम सजावट के बजाय स्थानीय रूप से उपलब्ध हरे बांस के खंभों पर मिट्टी के दीये रखकर घरों के प्रवेश द्वारों और धान के खेतों के किनारे सजाने की अनूठी परंपरा है। इसे स्थानीय भाषा में धान की अच्छी फसल और कीट-पतंगों से अन्न की रक्षा के रूप में भी देखा जाता है। पारंपरिक लोकगीतों, ढोल और स्थानीय खानपान जैसे पीठा और नारिकोल लारू (नारियल के लड्डू) के साथ असम की दिवाली अपनी सहजता और नैसर्गिक सौम्यता के लिए जानी जाती है।
गोवा में नरक चतुर्दशी पर नरकासुर के विशालकाय पुतलों का दहन
पश्चिमी तटीय राज्य गोवा में दिवाली का उत्सव उत्तर भारतीय परंपराओं से एक दिन पूर्व यानी ‘नरक चतुर्दशी’ के दिन अपने चरम पर होता है। पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान श्री कृष्ण और उनकी पत्नी सत्यभामा ने इसी दिन प्रागज्योतिषपुर के अत्याचारी और अधर्मी असुर नरकासुर का वध करके 16,100 कन्याओं को उसके बंदीगृह से मुक्त कराया था और धर्म की स्थापना की थी।
इस पावन विजय की स्मृति में गोवा के प्रत्येक शहर और गांव में कई हफ्तों पहले से नरकासुर के विशाल, भयानक और कलात्मक पुतले तैयार किए जाते हैं, जिनमें आधुनिक लाइटिंग और तकनीकी प्रभाव जोड़े जाते हैं। नरक चतुर्दशी की पूर्व संध्या पर इन पुतलों की भव्य झांकियां निकाली जाती हैं और प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं। इसके बाद दिवाली के दिन सूर्योदय से पूर्व सुबह चार बजे इन विशाल पुतलों का दहन कर बुराई के अंत का उत्सव मनाया जाता है। पुतला दहन के उपरांत लोग पारंपरिक रूप से उबटन और सुगंधित तेल लगाकर स्नान करते हैं और स्थानीय पोहा व्यंजन (फोव) का आनंद लेते हैं।
Diwali 2026: विविधता में एकता का सजीव दर्शन कराता भारत का प्रकाश पर्व
भारत के इन सात प्रमुख शहरों की दिवाली यह सिद्ध करती है कि भौगोलिक दूरी, स्थानीय भाषा और खानपान के भेदों के बावजूद पूरे देश की आत्मा एक ही सूत्र में बंधी है। चाहे वह अयोध्या में रामराज्य की मर्यादा का स्मरण हो, काशी में मोक्ष और गंगा की वंदना हो, राजस्थान में शौर्य का प्रकाश हो, बंगाल में मां काली की संहारक व कृपालु शक्ति की आराधना हो, पंजाब में मानवीय अधिकारों की रक्षा का बंदी छोड़ पर्व हो, असम में प्रकृति से जुड़ाव हो या फिर गोवा में अधर्म के विनाश का शंखनाद हो—दिवाली हर रूप में अंधकार पर प्रकाश, अज्ञान पर ज्ञान और अधर्म पर धर्म की सार्वभौमिक विजय का शाश्वत संदेश देती है।
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