Punjab Drug Problem: राघव चड्ढा का बड़ा दावा, बोले- BJP चिट्टा मुक्त कर सकती है पंजाब
राघव चड्ढा ने जालंधर में नशा मुक्त पंजाब यात्रा के समापन पर पार्टी की रणनीति बताई
Punjab Drug Problem: पंजाब में आगामी 2027 विधानसभा चुनावों की बिसात बिछने के साथ ही राज्य की सबसे संवेदनशील और पुरानी समस्या ‘नशा’ एक बार फिर मुख्य राजनीतिक विमर्श के केंद्र में आ गई है। भारतीय जनता पार्टी द्वारा राज्यभर में आयोजित की गई ‘नशा मुक्त पंजाब यात्रा’ के औपचारिक समापन के अवसर पर जालंधर पहुंचे बीजेपी सांसद राघव चड्ढा ने राज्य को नशे के दलदल से बाहर निकालने को लेकर पार्टी की क्षमता पर बड़ा बयान दिया है। मीडिया से मुखातिब होते हुए चड्ढा ने दो-टूक शब्दों में कहा कि यदि पंजाब से मादक पदार्थों और विशेष रूप से ‘चिट्टा’ (सिंथेटिक ड्रग्स) के अवैध तंत्र को जड़ से उखाड़ फेंकने की वास्तविक प्रशासनिक और राजनीतिक इच्छाशक्ति किसी दल में है, तो वह केवल बीजेपी है।
राघव चड्ढा का यह वक्तव्य उस व्यापक राजनीतिक अभियान की अगली कड़ी है जिसे बीजेपी ने पंजाब के वनांचल, ग्रामीण और शहरी अंचलों में नशे के खिलाफ जन-जागरूकता जगाने के लिए छेड़ा हुआ है। उन्होंने दावा किया कि राज्य की जनता अब परंपरागत राजनीति और खोखले आश्वासनों से ऊब चुकी है और बीजेपी के नशा-विरोधी संकल्प को समाज के सभी वर्गों, विशेषकर माताओं और युवाओं का भारी समर्थन हासिल हो रहा है।
Punjab Drug Problem: जालंधर में यात्रा समापन के बाद राघव चड्ढा का तीखा रुख
जालंधर में यात्रा के समापन समारोह के उपरांत पत्रकारों से बातचीत करते हुए राघव चड्ढा ने यात्रा को व्यापक रूप से सफल और ऐतिहासिक बताया। उन्होंने कहा कि पंजाब की पहचान कभी देश के अन्नदाता और सीमाओं के रक्षक के रूप में रही है, किंतु दुर्भाग्यवश पिछले कुछ दशकों के दौरान नशीले पदार्थों के अनियंत्रित प्रसार ने राज्य की युवा पीढ़ी और सामाजिक ताने-बाने को गहरी चोट पहुंचाई है।
चड्ढा ने अपने संबोधन में केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के पिछले दस वर्षों के प्रशासनिक ट्रैक रिकॉर्ड का हवाला दिया। उन्होंने तर्क दिया कि जिस प्रकार केंद्र सरकार ने पूर्वोत्तर में उग्रवाद, देश के मध्य हिस्सों में दशकों पुरानी नक्सल समस्या और सीमा पार से संचालित आतंकवाद के खिलाफ बिना किसी समझौते के कड़े नीतिगत कदम उठाकर उन्हें समाप्त करने की दिशा में सफलता हासिल की है, ठीक उसी स्तर की तकनीकी निगरानी और कानून-व्यवस्था का इस्तेमाल पंजाब में नशे के सिंडिकेट को खत्म करने के लिए किया जाएगा।
अमित शाह की रैली और 31 दिसंबर 2029 की डेडलाइन
राघव चड्ढा का यह बयान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा जालंधर की विशाल जनसभा में दिए गए भाषण के ठीक बाद सामने आया है। अमित शाह ने मंच से घोषणा करते हुए स्पष्ट किया था कि आगामी पंजाब विधानसभा चुनाव में बीजेपी का मुख्य एजेंडा केवल और केवल ‘नशा मुक्त पंजाब’ रहेगा। उन्होंने पंजाब की महिलाओं और युवाओं को सीधा वचन देते हुए 31 दिसंबर 2029 की समय-सीमा तय की और कहा कि सत्ता में आने पर इस तारीख से पहले पंजाब को ‘चिट्टे के कारोबार’ से पूरी तरह मुक्त कर दिया जाएगा।
अमित शाह ने जालंधर में उन पीड़ित परिवारों से भी व्यक्तिगत मुलाकात की थी जिन्होंने नशे के ओवरडोज के कारण अपने युवा बच्चों को खो दिया है। उन्होंने कहा कि एक बेबस मां की गोद में उसके दो दिवंगत बेटों की तस्वीरें देखकर यह स्पष्ट हो जाता है कि पंजाब को इस दलदल से निकालने के लिए कठोर राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है, न कि केवल बयानों की। उन्होंने आरोप लगाया कि आम आदमी पार्टी की मौजूदा सरकार ने अपने शासनकाल में इस अवैध कारोबार को खुलेआम फलने-फूलने दिया, जिससे स्थिति सुधरने के बजाय और विकराल हो गई।
विधानसभा चुनाव 2027 से पूर्व गरमाई नशा मुक्ति की राजनीति
पंजाब में वर्ष 2027 की शुरुआत में प्रस्तावित विधानसभा चुनावों को लेकर तमाम राजनीतिक दलों ने अपनी गोटियां बिछानी शुरू कर दी हैं। राज्य में नशा लंबे समय से एक अत्यंत भावुक और चुनावी प्रभाव डालने वाला मुद्दा रहा है, जिसके इर्द-गिर्द पूर्व में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी भी चुनावी वैतरणी पार कर चुकी हैं। हालांकि, धरातल पर आपूर्ति श्रृंखला टूटने के बजाय नशे के स्वरूप में रासायनिक बदलाव देखे गए हैं, जिसने स्थानीय आक्रोश को बनाए रखा है।
बीजेपी की रणनीति अब इस मुद्दे पर आक्रामक रूप से आगे बढ़ने की है ताकि वह सत्ताधारी ‘आप’ और प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस दोनों को इस मुद्दे पर कटघरे में खड़ा कर सके। राघव चड्ढा का आम आदमी पार्टी से नाता तोड़कर बीजेपी में शामिल होने के बाद पंजाब के जमीनी मुद्दों पर निरंतर मुखर होना यह संकेत देता है कि बीजेपी उन्हें आगामी चुनाव में पार्टी के प्रमुख चेहरों में से एक के तौर पर आगे बढ़ा रही है। इससे पहले सितंबर महीने में भी उन्होंने राज्य सरकार के स्वास्थ्य और नशा-रोधी प्रबंधन पर कड़े सवाल दागे थे।
‘नशा मुक्त पंजाब यात्रा’ का दायरा और रणनीति
बीजेपी द्वारा सितंबर के मध्य में पठानकोट से शुरू की गई ‘नशा मुक्त पंजाब यात्रा’ ने राज्य के सभी 117 विधानसभा क्षेत्रों का भ्रमण किया और लगभग 4,000 किलोमीटर का सफर तय करते हुए जालंधर में अपनी परिणति पाई। इस यात्रा का प्राथमिक उद्देश्य केवल राजनीतिक भाषण देना नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर नशे से तबाह हुए परिवारों, युवाओं और पुनर्वास केंद्रों से सीधा संपर्क साधना था।
यात्रा के दौरान कई स्थानों पर राजनीतिक झड़पें और विरोध प्रदर्शन भी देखने को मिले, जिससे यह साफ हो गया कि चुनाव से पहले राज्य में सियासी तनाव बढ़ेगा। बीजेपी नेताओं का दावा है कि इस यात्रा ने न केवल कार्यकर्ताओं में नया जोश भरा है, बल्कि उन सामान्य मतदाताओं को भी एक विकल्प की उम्मीद दी है जो पिछले कई वर्षों से नशे के खिलाफ ठोस कानूनी कार्रवाई की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
Punjab Drug Problem: चुनौतियां और आगामी राजनीतिक परिदृश्य
यद्यपि बीजेपी और राघव चड्ढा ने पंजाब को नशा मुक्त करने के लिए 2029 की समय-सीमा का संकल्प सामने रखा है, किंतु विश्लेषकों का मानना है कि पंजाब में नशे की समस्या की जड़ें केवल स्थानीय कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं हैं। पाकिस्तान की ओर से ड्रोन के जरिए होने वाली सीमा पार हेरोइन तस्करी, हवाला नेटवर्क, स्थानीय स्तर पर व्याप्त भ्रष्टाचार और युवाओं में बेरोजगारी जैसे पहलू इस समस्या को अत्यधिक जटिल बनाते हैं।
आने वाले महीनों में पंजाब की राजनीति इसी मुद्दे के इर्द-गिर्द घूमती नजर आएगी। एक तरफ जहां भगवंत मान सरकार अपने पुलिस अभियानों और नशा तस्करों की संपत्तियों को जब्त करने की उपलब्धियों को गिनाएगी, वहीं बीजेपी केंद्र की सख्त सुरक्षा एजेंसियों और मजबूत राजनीतिक नेतृत्व को पंजाब की रक्षा का एकमात्र विकल्प बताकर पेश करेगी। राघव चड्ढा का ताजा बयान यह पुष्ट करता है कि 2027 के चुनाव में पंजाब की जनता के सामने ‘चिट्टा मुक्ति’ का संकल्प ही सबसे बड़ा चुनावी पैमाना बनने जा रहा है।
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