Pratyusha Banerjee Case: 10 साल बाद राहुल राज सिंह को बड़ी राहत, हाईकोर्ट ने किया डिस्चार्ज
बॉम्बे हाईकोर्ट ने आत्महत्या के लिए उकसाने, मारपीट और धमकी के मामले में राहुल राज सिंह को डिस्चार्ज किया
Pratyusha Banerjee Case: टीवी धारावाहिक ‘बालिका वधू’ में आनंदी के किरदार से घर-घर में लोकप्रिय हुईं दिवंगत अभिनेत्री प्रत्युषा बनर्जी की मौत से जुड़े बहुचर्चित मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने प्रत्युषा के पूर्व प्रेमी एवं अभिनेता-निर्माता राहुल राज सिंह को भारतीय दंड संहिता की धारा 306 (आत्महत्या के लिए उकसाना), 323 (मारपीट) और 506 (आपराधिक धमकी) के तहत दर्ज मामले से औपचारिक रूप से डिस्चार्ज (आरोपमुक्त) कर दिया है।
जस्टिस एसजी डिगे की एकल पीठ ने राहुल राज सिंह की पुनरीक्षण याचिका को स्वीकार करते हुए यह आदेश पारित किया। राहुल ने मुंबई की डिंडोशी सेशंस कोर्ट द्वारा अगस्त 2023 में उनकी डिस्चार्ज अर्जी खारिज किए जाने के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। हाईकोर्ट के इस आदेश के पश्चात अब राहुल राज सिंह पर इस मामले में कोई आपराधिक मुकदमा नहीं चलेगा, जिससे उन्हें करीब दस वर्षों से चल रही कानूनी प्रक्रिया से पूरी मुक्ति मिल गई है।
Pratyusha Banerjee Case: 2016 की दुखद घटना और दर्ज हुई एफआईआर की पृष्ठभूमि
यह संवेदनशील मामला अप्रैल 2016 का है, जब 24 वर्षीय अभिनेत्री प्रत्युषा बनर्जी मुंबई के गोरेगांव स्थित अपने किराए के फ्लैट में संदिग्ध परिस्थितियों में मृत पाई गई थीं। प्रत्युषा की असामयिक मृत्यु ने समूचे मनोरंजन जगत को स्तब्ध कर दिया था। घटना के तुरंत बाद प्रत्युषा की मां सोमा बनर्जी ने बंगुर नगर पुलिस स्टेशन में राहुल राज सिंह के विरुद्ध गंभीर आरोपों के साथ लिखित शिकायत दर्ज कराई थी।
परिजनों ने आरोप लगाया था कि राहुल प्रत्युषा के साथ मानसिक, शारीरिक और वित्तीय स्तर पर प्रताड़ना कर रहे थे, जिसके अवसाद और दबाव में आकर अभिनेत्री ने यह आत्मघाती कदम उठाया। पुलिस ने शिकायत के आधार पर राहुल के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने और उत्पीड़न की धाराओं में मामला दर्ज किया था। हालांकि, राहुल ने शुरुआत से ही खुद को निर्दोष बताते हुए इन आरोपों को खारिज किया था और जुलाई 2016 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने उन्हें अंतरिम अग्रिम जमानत प्रदान की थी।
अंतिम कॉल रिकॉर्डिंग बनी बचाव पक्ष की सबसे मजबूत ढाल
बॉम्बे हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान राहुल राज सिंह की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता आबाद पोंडा और अधिवक्ता श्रेयांस मिथारे ने विस्तृत दलीलें प्रस्तुत कीं। बचाव पक्ष ने घटना से ठीक पहले प्रत्युषा और राहुल के बीच हुई अंतिम फोन कॉल की ट्रांसक्रिप्ट को अदालत के समक्ष प्रमुखता से रखा।
वकीलों ने यह तर्क दिया कि अंतिम बातचीत के ऑडियो और ट्रांसक्रिप्ट से यह स्पष्ट रूप से प्रमाणित होता है कि राहुल प्रत्युषा को कोई भी अनुचित या आत्मघाती कदम उठाने से लगातार रोक रहे थे और उन्हें सांत्वना देते हुए तुरंत उनसे मिलने उनके फ्लैट पर पहुंच रहे थे। बचाव पक्ष ने कहा कि बातचीत में कहीं भी उकसावे (Instigation), धमकी या मानसिक रूप से विवश करने वाला कोई तत्व मौजूद नहीं था, बल्कि राहुल एक सहयोगी और चिंतित साथी की भूमिका निभाते नजर आए थे।
अस्पताल ले जाने और प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों का संदर्भ
बचाव पक्ष ने यह भी रेखांकित किया कि फ्लैट पर पहुंचने के बाद राहुल ने तुरंत पड़ोसियों और सुरक्षाकर्मियों की मदद से प्रत्युषा को फंदे से उतारा और तत्काल कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी अस्पताल पहुंचाया। मामले की विस्तृत जांच के दौरान पुलिस को फ्लैट से कोई सुसाइड नोट बरामद नहीं हुआ था जो राहुल की संलिप्तता की ओर संकेत करता हो।
वकीलों ने शीर्ष अदालत के विभिन्न न्यायिक दृष्टांतों का हवाला देते हुए कहा कि किसी रिश्ते में तनाव, अनबन या आपसी मतभेद होना अपने आप में आत्महत्या के लिए उकसाने का संज्ञेय अपराध नहीं माना जा सकता, जब तक कि आरोपी का सक्रिय और प्रत्यक्ष इरादा पीड़िता को मृत्यु की ओर धकेलने का न रहा हो। आरोपपत्र में ऐसी कोई साक्ष्य सामग्री मौजूद नहीं थी जो इस कसौटी पर खरी उतरती हो, इसलिए मामले को नियमित ट्रायल में घसीटना न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग के समान था।
अभियोजन और पीड़िता के परिवार की आपत्तियां
इसके विपरीत राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त लोक अभियोजक सागर अगरकर और प्रत्युषा के परिवार के अधिवक्ता तेजस माने ने डिस्चार्ज याचिका का कड़ा विरोध किया। अभियोजन का तर्क था कि पुलिस द्वारा वर्ष 2018 में दाखिल किए गए आरोपपत्र में कई मित्रों और गवाहों के बयान शामिल हैं, जो दर्शाते हैं कि प्रत्युषा गंभीर भावनात्मक और आर्थिक संकट से जूझ रही थीं।
अभियोजन पक्ष ने दलील दी थी कि इन परिस्थितियों की सत्यता की जांच केवल विस्तृत गवाही और जिरह (Cross-examination) के जरिए ट्रायल कोर्ट में ही हो सकती है, इसलिए आरोपी को प्रारंभिक स्तर पर डिस्चार्ज नहीं किया जाना चाहिए। डिंडोशी सेशंस कोर्ट ने भी अगस्त 2023 में इसी आधार पर राहुल की अर्जी खारिज कर दी थी कि प्रथम दृष्टया मामले की सुनवाई के लिए पर्याप्त सामग्री उपलब्ध है।
बॉम्बे हाईकोर्ट का कानूनी निष्कर्ष: ट्रायल की आवश्यकता नहीं
हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की विस्तृत दलीलें सुनने और केस डायरी के सभी रिकॉर्ड्स का गहन परीक्षण करने के बाद यह निष्कर्ष निकाला कि धारा 306 के तहत आपराधिक मुकदमा चलाने के लिए आवश्यक विधिक तत्व गायब हैं। अदालत ने माना कि सेशंस कोर्ट ने डिस्चार्ज अर्जी खारिज करते समय रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री का वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन करने में त्रुटि की थी।
जस्टिस एसजी डिगे की पीठ ने स्पष्ट किया कि मात्र आरोपों और संदेह के आधार पर किसी व्यक्ति को एक दशक लंबे आपराधिक ट्रायल के कष्ट से नहीं गुजारा जा सकता। अंतिम फोन कॉल के साक्ष्य और घटनाक्रम की कड़ियों को देखते हुए राहुल राज सिंह के विरुद्ध उकसाने का कोई ठोस आधार नहीं बनता, जिसके चलते उन्हें इस मामले से पूर्णतः डिस्चार्ज करने का आदेश पारित किया गया।
Pratyusha Banerjee Case: एक दशक बाद कानूनी विवाद का औपचारिक अंत
बॉम्बे हाईकोर्ट के इस फैसले ने वर्ष 2016 से चल रहे इस हाई-प्रोफाइल मामले की कानूनी दिशा को निर्णायक रूप से समाप्त कर दिया है। प्रत्युषा बनर्जी की असामयिक मृत्यु भारतीय टेलीविजन जगत के लिए एक अपूरणीय क्षति बनी हुई है और उनकी स्मृति आज भी दर्शकों के दिलों में बसी है।
दूसरी ओर, राहुल राज सिंह के लिए यह आदेश दस वर्षों की लंबी और कष्टप्रद कानूनी लड़ाई के बाद एक बहुत बड़ा नैतिक और विधिक संबल बनकर आया है। अदालत के इस आदेश के साथ ही प्रत्युषा बनर्जी आत्महत्या मामले में राहुल राज सिंह पर लगे सभी आपराधिक अभियोग औपचारिक रूप से निष्प्रभावी हो गए हैं।
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