Supreme Court: जातिगत जनगणना के खिलाफ याचिका खारिज, कहा- यह नीतिगत मामला है, सरकार को पिछड़े वर्गों का सही डेटा जानने का अधिकार
SC ने कहा- जातिगत जनगणना नीतिगत विषय, अदालत नहीं करेगी हस्तक्षेप
Supreme Court: देश में लंबे समय से चल रही जातिगत जनगणना की मांग को लेकर एक बार फिर राजनीतिक और कानूनी बहस छिड़ गई है। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को जातिगत जनगणना के खिलाफ दायर एक याचिका को खारिज कर दिया। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट कहा कि जातिगत जनगणना एक नीतिगत मामला है और इसमें अदालत दखल नहीं दे सकती।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा कि सरकार को यह जानना चाहिए कि देश में पिछड़े वर्गों की संख्या कितनी है, ताकि उनके कल्याण के लिए सही योजनाएं बनाई जा सकें। इस फैसले से जातिगत जनगणना की मांग करने वालों को बड़ी राहत मिली है, जबकि विरोध करने वालों को झटका लगा है।
सुप्रीम कोर्ट का तर्क: नीति सरकार बनाएगी, अदालत नहीं
सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच, जिसमें सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली शामिल थे, ने याचिकाकर्ता के तर्कों को खारिज करते हुए कहा कि यह पूरी तरह से नीतिगत फैसला है। याचिकाकर्ता ने दलील दी थी कि जातिगत आंकड़ों का दुरुपयोग हो सकता है और सरकार के पास पहले से पर्याप्त डेटा उपलब्ध है। इस पर सीजेआई सूर्यकांत ने जवाब दिया कि सरकार के लिए यह जानना बेहद जरूरी है कि देश में कितने लोग पिछड़े वर्ग से हैं। इससे आरक्षण नीतियों को सही ढंग से लागू करने और लक्षित कल्याण योजनाएं बनाने में मदद मिलेगी।
अदालत ने यह भी कहा कि जब तक कोई नीति संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन नहीं करती, तब तक अदालत उसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकती। यह फैसला नीति निर्माण को पूरी तरह से सरकार के क्षेत्राधिकार में रखता है।
Supreme Court: याचिका के मुख्य बिंदु और आपत्तियां
याचिकाकर्ता ने अदालत के समक्ष तर्क दिया था कि जातिगत जनगणना से समाज में विभाजन बढ़ेगा और इससे सामाजिक सद्भाव प्रभावित हो सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि मौजूदा आंकड़ों के आधार पर ही आरक्षण और कल्याण कार्यक्रम सुचारू रूप से चलाए जा सकते हैं। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इन तर्कों को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कूटनीतिक रूप से इस बात पर जोर दिया कि सटीक आंकड़े उपलब्ध होने से सरकार की जन कल्याणकारी नीतियां पहले से ज्यादा प्रभावी बन सकती हैं।
2027 की जनगणना में जाति गणना की मांग
वर्तमान में देश की जनगणना 2027 चल रही है। इसका पहला चरण अप्रैल 2026 से शुरू हो चुका है। कई राजनीतिक दल और सामाजिक संगठन लंबे समय से मांग कर रहे हैं कि इस जनगणना में जातिगत आंकड़ों को भी अनिवार्य रूप से शामिल किया जाए। बिहार में नीतीश कुमार सरकार ने पहले ही जातिगत जनगणना कराई थी, जिसके आंकड़ों का राजनीतिक रूप से काफी इस्तेमाल हुआ। अब कई अन्य राज्यों में भी ऐसी मांग तेजी से जोर पकड़ रही है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद केंद्र सरकार पर जातिगत जनगणना कराने का दबाव पहले से अधिक बढ़ सकता है।
जनगणना 2027: पहला चरण शुरू, डिजिटल होगा पूरा सर्वे
भारत की जनगणना 2027 दो चरणों में हो रही है। पहला चरण 1 अप्रैल 2026 से शुरू होकर 30 सितंबर 2026 तक चलेगा। इस चरण में मुख्य रूप से घरों की सूची तैयार करना और संपत्ति संबंधी जानकारी एकत्र करने का कार्य किया जा रहा है। दूसरा चरण 2027 में होगा, जिसमें परिवार के प्रत्येक सदस्य की व्यक्तिगत जानकारी ली जाएगी।
यह देश की पहली पूरी तरह डिजिटल जनगणना है, जिसमें नागरिक स्व-गणना पोर्टल के जरिए भी अपनी जानकारी दर्ज कर सकते हैं। अभी 8 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में पहला चरण चल रहा है, जिसमें दिल्ली, गोवा, कर्नाटक, ओडिशा आदि क्षेत्र शामिल हैं।
Supreme Court: जातिगत जनगणना पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं
सुप्रीम कोर्ट के इस बड़े फैसले पर विभिन्न राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। कांग्रेस, आरजेडी, एसपी और अन्य विपक्षी दल इसे अपनी कूटनीतिक जीत बता रहे हैं क्योंकि वे लंबे समय से जातिगत जनगणना की मांग कर रहे थे। वहीं बीजेपी और उसके सहयोगी दल इस मुद्दे पर अभी बेहद सतर्क रुख अपनाए हुए हैं। उनका कहना है कि जनगणना का अंतिम फैसला केंद्र सरकार करेगी और सामाजिक सद्भाव को बनाए रखते हुए ही कोई भी कदम उठाया जाएगा।
ऐतिहासिक संदर्भ: कब-कब हुई जातिगत गणना?
ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो आखिरी बार ब्रिटिश काल में 1931 में पूर्ण जातिगत जनगणना हुई थी। उसके बाद स्वतंत्र भारत में जातिगत आंकड़े अलग से नहीं लिए गए। साल 2011 में सामाजिक-आर्थिक जातिगत जनगणना की गई थी, लेकिन उसके आंकड़ों को किन्हीं कारणों से सार्वजनिक नहीं किया गया। बिहार मॉडल की तर्ज पर अब कई राज्यों ने अपने स्तर पर जातिगत सर्वेक्षण कराए हैं, जिसके बाद केंद्र स्तर पर भी इसकी मांग काफी तेज हो गई है।
इस कदम के मुख्य फायदे और चुनौतियां
इस नीति के मुख्य फायदों के अंतर्गत पिछड़े वर्गों की सही संख्या पता चलने से आरक्षण नीतियां अधिक प्रभावी होंगी और कल्याण योजनाओं में बेहतर लक्ष्यीकरण संभव हो सकेगा, जिसे सामाजिक न्याय की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है। दूसरी तरफ, इसकी प्रमुख चुनौतियों में इन आंकड़ों का राजनीतिक दुरुपयोग होने की संभावना, सामाजिक तनाव बढ़ने की आशंका और डेटा गोपनीयता व सुरक्षा को सुनिश्चित करना शामिल है।
विशेषज्ञों की राय
विभिन्न सामाजिक वैज्ञानिकों का कहना है कि सटीक जातिगत डेटा के बिना आधुनिक नीति निर्माण का कार्य अधूरा है। वहीं कुछ विशेषज्ञ यह चेतावनी भी देते हैं कि जाति आधारित गणना से समाज में जातिवाद को बढ़ावा मिल सकता है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने अब पूरी तरह से स्पष्ट कर दिया है कि यह मुद्दा अदालत के क्षेत्राधिकार के बजाय संसद और सरकार के विवेक के अधीन आता है।
आगे की राह
सरकार अब इस अदालती फैसले के बाद जातिगत जनगणना को 2027 की आम जनगणना में शामिल करने पर गंभीरता से विचार कर सकती है। आने वाले समय में संसद के भीतर इस मुद्दे पर बड़ी बहस होने की पूरी संभावना है। विपक्षी दल जल्द ही इस मुद्दे को संसद के आगामी सत्र में मजबूती से उठा सकते हैं।
निष्कर्ष: सामाजिक न्याय vs नीतिगत विवेक
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला संवैधानिक सीमाओं का सम्मान करते हुए सरकार को नीति निर्माण की पूरी स्वतंत्रता देता है। जातिगत जनगणना का मुद्दा अब पूरी तरह से राजनीतिक और नीतिगत एजेंडे में आ गया है। देश की जनसांख्यिकी को गहराई से समझने और सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए सही आंकड़े जरूरी हैं, लेकिन समाज में आपसी सद्भाव बनाए रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
सरकार को अब इस दिशा में ठोस और संतुलित कदम उठाने होंगे ताकि न तो कोई वर्ग उपेक्षित रहे और न ही देश में नई विभाजन की स्थितियां उत्पन्न हों।
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