One Nation One Election: सुप्रीम कोर्ट के जजों से नहीं होगी JPC की बैठक, न्यायिक समीक्षा की संभावना
एक साथ चुनाव विधेयकों पर JPC की SC जजों से अनौपचारिक चर्चा प्रस्तावित थी, बैठक टली
One Nation One Election: देश में लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ संपन्न कराने के महत्वाकांक्षी प्रस्ताव ‘एक देश, एक चुनाव’ की रूपरेखा तैयार कर रही संयुक्त संसदीय समिति (JPC) और न्यायपालिका के बीच प्रस्तावित अनौपचारिक विमर्श अब नहीं होगा। सुप्रीम कोर्ट प्रशासन ने समिति को औपचारिक रूप से अवगत कराया है कि भारत के मुख्य न्यायाधीश और वरिष्ठ न्यायाधीश इस विषय पर संसदीय समिति के साथ किसी भी प्रकार की अनौपचारिक चर्चा में सम्मिलित नहीं होंगे।
यह निर्णय न्यायपालिका की स्वतंत्रता, संविधान के आधारभूत ढांचे और ‘न्यायिक समीक्षा’ की संभावनाओं की रक्षा के उद्देश्य से लिया गया है। सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीशों के अनुसार, यह प्रस्तावित कानून भविष्य में न्यायिक चुनौती का विषय बन सकता है, ऐसे में वर्तमान न्यायाधीशों का पहले से ही कानून निर्माण प्रक्रिया में अनौपचारिक राय देना न्यायिक आचार संहिता के विपरीत होगा।
One Nation One Election: 6 अक्टूबर का प्रस्तावित दौरा और बैठक रद्द होने की विधिक पृष्ठभूमि
भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ सांसद पीपी चौधरी की अध्यक्षता वाली संयुक्त संसदीय समिति ने 6 अक्टूबर को देश की सर्वोच्च अदालत का एक स्थानीय अध्ययन दौरा तय किया था। समिति के सदस्यों के बीच साझा किए गए आधिकारिक कार्यक्रम में सुप्रीम कोर्ट की कार्यप्रणाली, ई-कोर्ट्स प्रोजेक्ट और ऐतिहासिक पुस्तकालय के अवलोकन के साथ-साथ मुख्य न्यायाधीश और अन्य न्यायाधीशों के साथ ‘एक साथ चुनाव’ (Simultaneous Elections) पर अनौपचारिक चर्चा का बिंदु भी सम्मिलित किया गया था।
जैसे ही इस प्रस्तावित बैठक की जानकारी सार्वजनिक हुई, देश के विधिक और राजनीतिक गलियारों में बहस छिड़ गई। इसके उपरांत सुप्रीम कोर्ट के सेक्रेटरी जनरल (महासचिव) की ओर से संसदीय समिति को भेजे गए पत्र में स्पष्ट कर दिया गया कि वरिष्ठ न्यायाधीशों की आंतरिक बैठक में यह निष्कर्ष निकला है कि इस विषय पर अनौपचारिक संवाद उचित अथवा वांछनीय नहीं है। हालांकि समिति के अध्यक्ष पीपी चौधरी ने स्पष्टीकरण देते हुए कहा कि यह दौरा सीधे तौर पर जजों से कानून पर राय लेने के लिए नहीं था और अन्य प्रशासनिक व्यस्तताओं के चलते इसे फिलहाल टाल दिया गया है।
न्यायिक समीक्षा की संभावना और शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धांत
सुप्रीम कोर्ट प्रशासन द्वारा बैठक से दूरी बनाने का सबसे बड़ा संवैधानिक आधार भारतीय संविधान का ‘शक्तियों का पृथक्करण’ (Separation of Powers) सिद्धांत है। भारतीय लोकतंत्र में संसद का कार्य संविधान संशोधन और कानून बनाना है, जबकि न्यायपालिका का मूल दायित्व यह देखना है कि बनाया गया कानून संविधान के बुनियादी ढांचे और नागरिकों के मौलिक अधिकारों के अनुरूप है या नहीं।
वरिष्ठ अधिवक्ता और राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने इस प्रस्तावित बैठक पर कड़ा ऐतराज जताते हुए सार्वजनिक मंचों पर यह तर्क रखा था कि यदि संसद द्वारा पारित होने वाले किसी भावी कानून पर मौजूदा न्यायाधीश पहले ही अनौपचारिक बैठकों में चर्चा करेंगे, तो कानून बनने के बाद जब याचिकाकर्ता उसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगे, तो अदालत की निष्पक्षता और वस्तुनिष्ठता पर गंभीर प्रश्न खड़े हो सकते हैं। न्यायाधीशों ने भी इस विधिक तर्क को स्वीकार करते हुए संस्थागत शुचिता को बनाए रखने के लिए बैठक से स्वयं को पूरी तरह अलग रखा।
संसदीय समिति के समक्ष विचाराधीन दो महत्वपूर्ण विधेयक
संयुक्त संसदीय समिति वर्तमान में दो अत्यंत दूरगामी विधायी प्रस्तावों की सूक्ष्म जांच कर रही है, जिन्हें दिसंबर 2024 में संसद के पटल पर प्रस्तुत किया गया था। इनमें पहला ‘संविधान (129वां संशोधन) विधेयक, 2024’ है और दूसरा ‘केंद्र शासित प्रदेश विधि (संशोधन) विधेयक, 2024’ है। इन दोनों विधेयकों का प्राथमिक उद्देश्य पूरे देश के चुनावी चक्र को एक निश्चित तारीख पर सिंक्रोनाइज (एकीकृत) करना है।
इस संविधान संशोधन विधेयक के माध्यम से संविधान में एक नया अनुच्छेद 82A जोड़ने का प्रस्ताव रखा गया है। इसके लागू होने पर राष्ट्रपति एक ‘निर्धारित तिथि’ (Appointed Date) की अधिसूचना जारी करेंगे। उस तिथि के बाद गठित होने वाली सभी राज्य विधानसभाओं का कार्यकाल स्वतः ही अगली लोकसभा के सामान्य कार्यकाल के साथ समाप्त हो जाएगा, भले ही संबंधित विधानसभा अपने पांच वर्ष पूरे न कर सकी हो। इसके अतिरिक्त संविधान के अनुच्छेद 83 (संसद के सदनों की अवधि), अनुच्छेद 172 (राज्य विधानमंडलों की अवधि) और अनुच्छेद 327 में भी व्यापक फेरबदल प्रस्तावित किए गए हैं।
अकाल सदन भंग होने की स्थिति और संघीय ढांचे से जुड़े विवाद
‘एक देश, एक चुनाव’ की सबसे विवादास्पद और जटिल कानूनी पहेली यह है कि यदि किसी राज्य में साझा चुनाव के बाद सरकार अल्पमत में आ जाए, त्रिशंकु विधानसभा बने या सदन समय से पूर्व भंग हो जाए, तो क्या होगा। विधेयक में प्रस्तावित प्रावधान के अनुसार, ऐसी आपात स्थिति में होने वाले मध्यावधि चुनाव के बाद बनने वाली नई विधानसभा का कार्यकाल पूरे पांच साल का नहीं होगा।
नई विधानसभा केवल उस शेष अवधि (Unexpired Term) के लिए ही कार्य करेगी जो उस बड़े चुनावी चक्र के पूरा होने में बची होगी। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रावधान राज्यों की स्वायत्तता और भारत के संघीय ढांचे (Federal Structure) को सीधे प्रभावित करता है। विपक्षी दलों का तर्क है कि इससे क्षेत्रीय मुद्दों का राष्ट्रीय मुद्दों में विलय हो जाएगा और जनता द्वारा पांच वर्षों के लिए चुनी गई राज्य सरकारों के संवैधानिक अधिकार कमजोर पड़ जाएंगे।
पूर्व मुख्य न्यायाधीशों से पहले ही विमर्श कर चुकी है समिति
मौजूदा न्यायाधीशों से बातचीत टलने से पूर्व, संयुक्त संसदीय समिति ने देश के कई पूर्व मुख्य न्यायाधीशों और सेवानिवृत्त न्यायाधीशों से विस्तृत विमर्श किया है। समिति ने पूर्व सीजेआई यूयू ललित, रंजन गोगोई, जेएस खेहर और डीवाई चंद्रचूड़ से बंद कमरों में लंबी चर्चाएं की हैं।
फरवरी 2025 में समिति के समक्ष पेश हुए पूर्व सीजेआई यूयू ललित ने किसी राज्य विधानसभा के कार्यकाल को मनमाने तरीके से छोटा करने पर संभावित न्यायिक चुनौतियों की ओर इंगित किया था और सुझाव दिया था कि इस व्यवस्था को दो चरणों में धीरे-धीरे लागू किया जाना अधिक सुरक्षित होगा। वहीं पूर्व सीजेआई जेएस खेहर और डीवाई चंद्रचूड़ ने जुलाई 2025 में अपनी राय में कहा था कि सिद्धांत रूप में एक साथ चुनाव कराना संविधान के मूल ढांचे के विपरीत नहीं है, किंतु राज्य विधानसभाओं के कार्यकाल को सीमित करने वाले विशिष्ट खंडों को सुप्रीम कोर्ट में कड़ी न्यायिक कसौटी से गुजरना होगा।
सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच गहराती राजनीतिक खाई
‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ को लेकर देश का राजनीतिक परिदृश्य स्पष्ट रूप से दो धड़ों में बंटा हुआ है। केंद्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी और उसके सहयोगी दलों का दृढ़ मत है कि बार-बार होने वाले चुनावों से देश के हजारों करोड़ रुपये बर्बाद होते हैं, सुरक्षा बलों का अत्यधिक दबाव बढ़ता है और बार-बार आदर्श आचार संहिता लागू होने से विकास कार्य महीनों तक ठप पड़ जाते हैं।
इसके विपरीत, प्रमुख विपक्षी दलों का स्पष्ट आरोप है कि यह कदम देश के बहुदलीय लोकतंत्र और संघीय व्यवस्था को नुकसान पहुंचाकर एकात्मक शासन प्रणाली स्थापित करने का प्रयास है। विपक्ष का कहना है कि यह अवधारणा राज्यों की राजनीतिक विविधता को समाप्त कर देगी। संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत और कम से कम आधे राज्यों की विधानसभाओं के अनुसमर्थन की संवैधानिक अनिवार्यता के चलते इस विधेयक का भविष्य कड़े संसदीय संघर्ष पर निर्भर करता है।
One Nation One Election: न्यायिक स्वतंत्रता की मिसाल बनी सुप्रीम कोर्ट की दूरी
सुप्रीम कोर्ट प्रशासन द्वारा संयुक्त संसदीय समिति की अनौपचारिक बैठक को रद्द करने का कदम भारतीय न्यायपालिका की संस्थागत परिपक्वता और स्वतंत्रता का उत्कृष्ट प्रमाण है। शीर्ष अदालत ने यह स्पष्ट संदेश दिया है कि न्यायपालिका कानून बनाने की राजनीतिक या विधायी प्रक्रिया का अनौपचारिक हिस्सा नहीं बन सकती।
अदालत का यह फैसला न तो ‘एक देश, एक चुनाव’ के समर्थन में है और न ही इसके विरोध में, बल्कि यह केवल इस बात की गारंटी है कि भविष्य में जब यह विधेयक कानून का रूप लेकर सर्वोच्च अदालत की संविधान पीठ के समक्ष चुनौती के लिए आएगा, तब देश के न्यायाधीश किसी भी पूर्व-धारणा से मुक्त होकर पूरी निष्पक्षता से संविधान के तराजू पर उसकी वैधता की समीक्षा कर सकेंगे। अब सबकी निगाहें इस बात पर हैं कि जेपीसी अपनी अंतिम रिपोर्ट संसद के शीतकालीन सत्र में किस रूप में प्रस्तुत करती है।
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