Friday Pooja Vidhi: शुक्रवार को मां लक्ष्मी और संतोषी माता की पूजा विधि, सामग्री और नियम

2 अक्टूबर को शुक्रवार पूजा में मां लक्ष्मी और संतोषी माता की पूजा, व्रत और दान के नियम जानें

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Friday Pooja Vidhi: हिंदू धर्म और वैदिक परंपरा में सप्ताह का प्रत्येक दिन किसी न किसी देवी-देवता और नवग्रहों की ऊर्जा को समर्पित माना गया है। इनमें शुक्रवार का दिन विशेष रूप से परम कल्याणकारी, धन, धान्य और ऐश्वर्य की अधिष्ठात्री महालक्ष्मी तथा मनोकामना सिद्धि व आत्मिक शांति प्रदान करने वाली संतोषी माता की साधना के लिए अत्यंत फलदायी माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शुक्रवार के दिन निष्काम भाव, पूर्ण पवित्रता और शास्त्रसम्मत विधि से की गई पूजा-अर्चना से घर में व्याप्त दरिद्रता, कलह और आर्थिक अभावों का निवारण होता है तथा परिवार में सुख-समृद्धि का वास होता है।

2 अक्टूबर 2026 को आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि का शुभ संयोग बन रहा है। पंचांगीय गणनाओं के अनुसार इस दिन सुबह से लेकर संध्या प्रदोष काल तक देवी उपासना के लिए अत्यंत सकारात्मक ऊर्जा विद्यमान रहेगी। जो श्रद्धालु शुक्रवार का नियमित पूजन करते हैं अथवा 16 शुक्रवार के व्रत का संकल्प ले रहे हैं, उनके लिए इस दिन का धार्मिक व व्यावहारिक महत्व कई गुना बढ़ जाता है।

Friday Pooja Vidhi: शुक्रवार के दिन किस देवी-देवता की उपासना का है विधान

शुक्रवार के दिन मुख्य रूप से त्रिदेवी स्वरूप में शामिल मां लक्ष्मी की पूजा का विधान है। मां लक्ष्मी केवल भौतिक धन ही नहीं, बल्कि अष्टलक्ष्मी रूप में आरोग्य, ज्ञान, संतान, विजय और धैर्य की भी दात्री मानी जाती हैं। भारतीय परिवारों में शुक्रवार की संध्या को घर के मुख्य द्वार और देवालय में गाय के घी का दीपक प्रज्वलित कर श्री सूक्त अथवा कनकधारा स्तोत्र का पाठ करने की सुदीर्घ परंपरा रही है।

इसके साथ ही, पारिवारिक समरसता, अखंड सौभाग्य और मानसिक शांति की प्राप्ति के लिए संतोषी माता के व्रत एवं पूजन का विशेष प्रचलन है। संतोषी माता को भगवान श्री गणेश की पुत्री के रूप में मान्यता प्राप्त है, जिनकी आराधना से साधक के जीवन में अभाव और असंतोष दूर होकर आत्मिक तृप्ति आती है। वहीं ज्योतिषीय दृष्टिकोण से कुंडली में शुक्र ग्रह की अनुकूलता प्राप्त करने, दांपत्य जीवन में माधुर्य लाने और कला-सौंदर्य के क्षेत्र में प्रगति के लिए भी शुक्रवार को शुक्र देव का पूजन व बीज मंत्र जप किया जाता है।

शुक्रवार पूजा के लिए आवश्यक पूजन सामग्री

शुक्रवार की पूजा आरंभ करने से पूर्व सभी आवश्यक सामग्रियों को एक स्थान पर व्यवस्थित कर लेना चाहिए, जिससे पूजा काल में एकाग्रता भंग न हो। प्रमुख पूजन सामग्रियों में एक स्वच्छ लकड़ी की चौकी (पाटा), लाल या पीला नया वस्त्र, मां लक्ष्मी अथवा संतोषी माता की पावन प्रतिमा या चित्रपट शामिल हैं।

इसके अलावा पूजन के लिए रोली, कुमकुम, अक्षत (अखंडित चावल), सफेद चंदन, गाय के शुद्ध घी का दीपक, धूपबत्ती, कपूर और माचिस की आवश्यकता होती है। देवी को अर्पित करने के लिए ताजा लाल गुलाब, कमल का फूल या मौसमी सुगंधित पुष्प, तांबूल (पान के पत्ते), लौंग, इलायची, सुपारी, ऋतु फल और सफेद मिष्ठान, मखाना, बताशा अथवा खीर की व्यवस्था की जाती है। यदि संतोषी माता का व्रत रखा जा रहा है, तो सवा पाव अथवा सामर्थ्यानुसार शुद्ध गुड़ और भुने हुए देसी चने का नैवेद्य तथा कलश स्थापना के लिए जल भरा तांबे या पीतल का लोटा विशेष रूप से रखा जाता है।

प्रातःकालीन संपूर्ण पूजा विधि: चरणबद्ध निर्देश

शुक्रवार के दिन साधक को सूर्योदय से पूर्व ब्रह्म मुहूर्त में उठकर दैनिक क्रियाओं से निवृत्त होना चाहिए और शुद्ध जल से स्नान करना चाहिए। इस दिन हल्के लाल, गुलाबी अथवा श्वेत रंग के स्वच्छ वस्त्र धारण करना अत्यंत शुभ माना जाता है। इसके पश्चात पूजा गृह की भली-भांति सफाई कर गंगाजल का छिड़काव करें और पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके पूजा की चौकी सजाएं।

चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर मां लक्ष्मी या संतोषी माता की प्रतिमा स्थापित करें। सर्वप्रथम प्रथम पूज्य भगवान श्री गणेश का स्मरण करते हुए उन्हें दूर्वा और मोदक अर्पित करें। इसके बाद हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर व्रत अथवा पूजा का संकल्प लें। संकल्प के पश्चात देवी को पंचामृत व शुद्ध जल से प्रतीकात्मक स्नान कराएं, रोली-कुमकुम का तिलक लगाएं, अक्षत अर्पित करें और सुगंधित पुष्पमाला पहनाएं। घी का दीप प्रज्वलित कर धूप दिखाएं और नैवेद्य अर्पित करें। इसके बाद संबंधित देवी की स्तुति, चालीसा और मंत्रों का जप कर श्रद्धापूर्वक आरती उतारें और क्षमा प्रार्थना के साथ पूजा संपन्न करें।

संतोषी माता के 16 शुक्रवार व्रत के नियम और कथा का महत्व

संतोषी माता का व्रत सामान्यतः किसी शुक्ल पक्ष के पहले शुक्रवार से प्रारंभ कर लगातार 16 शुक्रवार तक रखने का शास्त्रीय विधान है। इस व्रत की संपूर्ण अवधि के दौरान चित्त को शांत, निर्मल और विवादों से दूर रखना अनिवार्य होता है। प्रातःकाल पूजा के समय एक तांबे के पात्र में शुद्ध जल भरकर उस पर गुड़ और चने से भरी कटोरी रखें।

पूजा के दौरान हाथ में थोड़ा सा गुड़ और चना रखकर संतोषी माता की पावन व्रत कथा का पाठ करें अथवा श्रवण करें। कथा श्रवण करते समय ‘जय संतोषी माता’ का मन ही मन स्मरण करते रहें। कथा समाप्त होने के पश्चात हाथ के गुड़-चने को कलश के जल में प्रवाहित कर दें अथवा गौमाता को खिला दें और कटोरी का शेष गुड़-चना उपस्थित सभी परिजनों में प्रसाद स्वरूप वितरित करें। शाम के समय एक बार बिना नमक अथवा सात्विक आहार ग्रहण करने का नियम होता है।

खटाई से पूर्ण परहेज: इस व्रत की सबसे कड़ी मर्यादा

संतोषी माता के व्रत का सबसे प्रमुख और अनिवार्य नियम खट्टी वस्तुओं से पूर्ण परहेज करना है। इस व्रत में न केवल व्रत रखने वाले व्यक्ति को, बल्कि उसके परिवार के किसी भी सदस्य को उस दिन किसी भी खट्टी वस्तु का सेवन नहीं करना चाहिए। नींबू, इमली, आमचूर, दही, छाछ, टमाटर, सिरका, संतरा या किसी भी प्रकार के खट्टे फल व आचार का स्पर्श और उपभोग वर्जित माना गया है।

मान्यता है कि यदि व्रत के दिन भूलवश भी खटाई का सेवन कर लिया जाए अथवा किसी को खट्टा पदार्थ खिला दिया जाए, तो व्रत खंडित हो जाता है और साधना का पुण्य फल नष्ट हो जाता है। अतः व्रत रखने वाले साधक को भोजन तैयार करते समय और दिनभर की दिनचर्या में इस नियम का अत्यंत कड़ाई से पालन करना चाहिए।

संध्याकालीन महालक्ष्मी पूजन: प्रदोष काल का विशेष महत्व

हिंदू धर्मग्रंथों में मां लक्ष्मी की आराधना के लिए गोधूलि वेला और प्रदोष काल (सूर्यास्त के आसपास का समय) को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। मान्यता है कि संध्या के समय मां लक्ष्मी पृथ्वी लोक पर भ्रमण करती हैं और जिस घर में स्वच्छता, दीप ज्योति और शांति होती है, वहां उनका स्थायी वास होता है।

शुक्रवार की शाम को सूर्यास्त के बाद पुनः हाथ-मुंह धोकर पूजा स्थान पर बैठें। पूजा स्थल के साथ-साथ घर के मुख्य द्वार के दोनों कोनों पर, तुलसी के पौधे के समीप और रसोई घर में घी या तिल के तेल का दीपक प्रज्वलित करें। मां लक्ष्मी को मखाने की खीर या सफेद पेड़े का भोग लगाएं और ‘ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं श्री सिद्ध लक्ष्म्यै नमः’ अथवा ‘ॐ महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णुपत्नी च धीमहि तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात्’ मंत्र की एक माला का जप करें। अंत में मां लक्ष्मी की कपूर से आरती उतारकर घर में सुख, शांति और कर्जमुक्ति की प्रार्थना करें।

शुक्रवार के दिन क्या दान करना माना जाता है सर्वोत्तम

शुक्र ग्रह और मां लक्ष्मी की प्रसन्नता के लिए शुक्रवार के दिन दान-पुण्य करने का विशेष महात्म्य है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इस दिन श्वेत वर्ण (सफेद रंग) की वस्तुओं का दान करने से कुंडली में शुक्र ग्रह बलवान होता है और जीवन में भौतिक अभाव समाप्त होते हैं।

साधक अपनी सामर्थ्य के अनुसार जरूरतमंद कन्याओं, निर्धन ब्राह्मणों अथवा असहाय लोगों को कच्चा चावल, चीनी (शर्करा), दूध, दही, सफेद वस्त्र, चांदी का सिक्का अथवा सफेद मिष्ठान व खीर का भोजन करा सकते हैं। दान देते समय मन में किसी प्रकार का अहंकार नहीं होना चाहिए, बल्कि सेवा और समर्पण का भाव होना आवश्यक है।

16 शुक्रवार के बाद उद्यापन की शास्त्रीय विधि

जब 16 शुक्रवार के व्रत विधिवत पूरे हो जाएं, तो अंतिम यानी 16वें या 17वें शुक्रवार को व्रत का उद्यापन किया जाता है। उद्यापन के दिन सामान्य दिनों की तुलना में विशेष पूजा का आयोजन होता है। इस दिन माता की बड़ी प्रतिमा को सजाकर विशेष हवन और कथा का आयोजन किया जाता है।

उद्यापन के पावन अवसर पर 8 वर्ष से कम आयु के 8 बालकों (लड़कों) को आदरपूर्वक घर बुलाकर भोजन कराने की विशिष्ट परंपरा है। बालकों के भोजन में खीर, पूड़ी और चने का प्रसाद परोसा जाता है। अत्यंत महत्वपूर्ण नियम यह है कि उद्यापन के भोजन में किसी भी प्रकार की खटाई का लेशमात्र भी अंश नहीं होना चाहिए। भोजनोपरांत बालकों को दक्षिणा, फल या वस्त्र भेंट कर उनके चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लेना चाहिए और उसके बाद ही स्वयं पारण करना चाहिए।

2 अक्टूबर 2026: शुक्रवार पूजा के शुभ मुहूर्त

2 अक्टूबर 2026 को शुक्रवार के दिन पूजा-अर्चना के लिए पंचांग के अनुसार शुभ समय का ध्यान रखना उपयोगी रहेगा। इस दिन सूर्योदय प्रातः 06:15 बजे होगा। अभिजीत मुहूर्त जो श्रेष्ठ कार्य सिद्धि के लिए जाना जाता है, वह प्रातः 11:46 बजे से दोपहर 12:34 बजे तक रहेगा।

वहीं राहुकाल प्रातः 10:41 बजे से दोपहर 12:10 बजे तक रहेगा, जिसमें कोई भी नया व्रत संकल्प या मुख्य पूजा आरंभ करने से बचना चाहिए। इसके बाद संध्या महालक्ष्मी पूजन के लिए सबसे उत्तम प्रदोष काल सायं 06:06 बजे से रात्रि 08:30 बजे तक रहेगा।

शुक्रवार व्रत में क्या न करें: प्रमुख सावधानियां

धार्मिक अनुष्ठानों की पूर्ण सिद्धि के लिए वर्जनाओं का ध्यान रखना भी उतना ही आवश्यक है जितना कि नियमों का पालन करना। शुक्रवार के दिन घर में चीखने-चिल्लाने, अपशब्द बोलने या परिजनों से कलह करने से मां लक्ष्मी अप्रसन्न होकर प्रस्थान कर जाती हैं, इसलिए घर में शांत और सौहार्दपूर्ण वातावरण रखना चाहिए। घर में मांस, मदिरा, लहसुन और प्याज का पूरी तरह त्याग होना चाहिए।

इसके अतिरिक्त शुक्रवार के दिन किसी को भी बड़ी धनराशि उधार देने या कर्ज लेने से बचना चाहिए, क्योंकि इससे धन की बरकत प्रभावित होने की मान्यता है। यदि कोई साधक शारीरिक रूप से अस्वस्थ है या किसी गंभीर बीमारी से पीड़ित है, तो उसे निर्जल अथवा कठोर निराहार व्रत रखने से बचना चाहिए। भगवान भाव के भूखे होते हैं, इसलिए स्वास्थ्य का ध्यान रखते हुए फलाहार के साथ मानसिक जप को प्राथमिकता दी जा सकती है।

Friday Pooja Vidhi: श्रद्धा, शुचिता और संतोष ही पूजा का मूल आधार

शुक्रवार को मां लक्ष्मी और संतोषी माता की पूजा का मूल उद्देश्य मनुष्य के अंतःकरण में धैर्य, शुचिता और संतोष की भावना को जाग्रत करना है। बाह्य आडंबरों और महंगी पूजन सामग्रियों की तुलना में साधक का निर्मल हृदय, सत्यवादी आचरण और जीवों के प्रति दयाभाव ही भगवती को सर्वाधिक प्रिय होता है।

2 अक्टूबर 2026 के इस पावन शुक्रवार को अपने सामर्थ्यानुसार स्वच्छता के नियमों का पालन करते हुए, माता की आरती और कथा का श्रवण कर दिन को व्यतीत करें। माता लक्ष्मी आपके भंडार परिपूर्ण रखेंगी और संतोषी माता के आशीर्वाद से आपका जीवन हर प्रकार के असंतोष से मुक्त होकर आनंदमय बनेगा।

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