Noida Flat Dispute: नोएडा के फ्लैटों के असली हकदार कौन? सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व हाई कोर्ट जज को सौंपी जांच
जस्टिस सुधीर कुमार सक्सेना करेंगे दावेदारों के दस्तावेजों की जांच, 8 हफ्ते में रिपोर्ट
Noida Flat Dispute: उत्तर प्रदेश के प्रमुख औद्योगिक और आवासीय केंद्र नोएडा में बहुमंजिला फ्लैटों के आवंटन से जुड़े तीन दशक पुराने कानूनी विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा और निर्णायक कदम उठाया है। शीर्ष अदालत ने फ्लैटों के वास्तविक हकदारों की पहचान करने और दावों की निष्पक्ष पड़ताल के लिए इलाहाबाद हाई कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस सुधीर कुमार सक्सेना को एक सदस्यीय स्वतंत्र और उच्चाधिकार प्राप्त समिति का प्रमुख नियुक्त किया है। यह समिति केंद्रीय कर्मचारी सहकारी जीएन समिति से जुड़े मूल सदस्यों और बाद में इन संपत्तियों को खरीदने का दावा करने वाले व्यक्तियों के सभी दस्तावेजों की गहन जांच कर अंतिम सूची तैयार करेगी।
Noida Flat Dispute: तीन दशकों से अदालतों में उलझा है बहुमंजिला फ्लैटों का विवाद
यह पूरा मामला केंद्रीय कर्मचारी सहकारी जीएन समिति और नोएडा प्राधिकरण के बीच लंबे समय से चल रहे कानूनी संघर्ष से संबंधित है। वर्ष 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण आदेश में नोएडा प्राधिकरण को निर्देश दिया था कि वह समिति के चिन्हित 844 मूल सदस्यों को बहुमंजिला फ्लैट आवंटित करे। इसके साथ ही अदालत ने बाद के वर्षों में फ्लैट खरीदने का दावा करने वाले 133 अन्य व्यक्तियों के दस्तावेजों और वैधता की भी विस्तृत जांच करने को कहा था।
अदालती आदेश के बावजूद आवंटन प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी, क्योंकि दोनों पक्षों की ओर से दावेदारों की संख्या और उनकी पात्रता को लेकर लगातार नए-नए आंकड़े पेश किए जाते रहे। बाद की न्यायिक कार्यवाहियों में अदालत के समक्ष दावेदारों के परस्पर विरोधी आंकड़े रखे गए, जिनमें एक चरण पर मूल सदस्यों की संख्या 863 और बाद के खरीदारों की संख्या 120 बताई गई। दावों में मौजूद इसी बड़े अंतर और भ्रम की स्थिति को समाप्त करने के लिए शीर्ष अदालत ने अंततः न्यायिक निगरानी वाली स्वतंत्र जांच का रास्ता चुना।
नोएडा प्राधिकरण और सहकारी समिति के दावों में गहरा मतभेद
इस विवाद में नोएडा प्राधिकरण और सहकारी समिति के कानूनी रुख एक-दूसरे के विपरीत रहे हैं। नोएडा प्राधिकरण का मुख्य तर्क यह है कि मूल आवंटन की शर्तों के तहत फ्लैटों के हस्तांतरण पर पूर्ण प्रतिबंध था। प्राधिकरण ने यह भी रेखांकित किया कि वर्ष 1998 में ही मूल आवंटन रद्द कर दिए गए थे, जिसके चलते बाद में खरीदे गए फ्लैटों के दावों को कानूनी मान्यता नहीं दी जा सकती। प्राधिकरण के अनुसार बिना वैधानिक अनुमति के किया गया कोई भी लेन-देन अमान्य है।
दूसरी ओर, सहकारी समिति का कहना है कि उसने समय रहते फ्लैटों के नियमित हस्तांतरण के लिए प्राधिकरण के समक्ष विधिवत आवेदन प्रस्तुत किए थे, लेकिन प्रशासनिक स्तर पर उन पर कोई आवश्यक कार्रवाई नहीं की गई। समिति ने यह दावा भी किया है कि मूल आवंटियों को जारी किए गए रिफंड चेक कभी भुनाए ही नहीं गए थे, इसलिए आवंटन रद्द करने की प्रक्रिया तकनीकी रूप से अधूरी थी। अब गठित स्वतंत्र समिति इन दोनों विरोधी दावों, बैंक लेन-देन और प्रशासनिक फाइलों की असलियत परखेगी।
जस्टिस सुधीर कुमार सक्सेना समिति को मिले व्यापक अधिकार
सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस सुधीर कुमार सक्सेना को जांच प्रक्रिया और उसकी कार्यप्रणाली तय करने के लिए पूर्ण स्वतंत्रता प्रदान की है। समिति को अधिकार दिया गया है कि वह नोएडा प्राधिकरण और सहकारी समिति के पुराने मूल रिकॉर्ड, फाइलों, रजिस्ट्री दस्तावेजों और बैंक विवरणों को तलब कर सकती है। इसके साथ ही समिति व्यक्तिगत रूप से दावेदारों को अपना पक्ष रखने का अवसर भी देगी।
शीर्ष अदालत ने नोएडा प्राधिकरण, सहकारी समिति के पदाधिकारियों और सभी संबंधित दावेदारों को समिति की जांच में पूर्ण सहयोग करने का सख्त निर्देश दिया है। इसके अलावा नोएडा प्राधिकरण को निर्देशित किया गया है कि वह जस्टिस सक्सेना समिति को सुचारू कामकाज के लिए सभी आवश्यक सचिवीय, तकनीकी और लॉजिस्टिक सुविधाएं तुरंत मुहैया कराए, ताकि दस्तावेजों की स्क्रूटनी तय समय सीमा के भीतर पूरी की जा सके।
Noida Flat Dispute: आठ सप्ताह में सौंपनी होगी रिपोर्ट, 2 दिसंबर को अगली सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने एक सदस्यीय समिति को निर्देश दिया है कि वह अपनी पूरी जांच और पात्र हकदारों की अंतिम सूची वाली सीलबंद रिपोर्ट आठ सप्ताह के भीतर अदालत में दाखिल करे। इस रिपोर्ट के आधार पर ही यह स्पष्ट हो पाएगा कि किन-किन सदस्यों के दावे नियमों के तहत सही पाए गए हैं और किसे संपत्ति का कानूनी अधिकार मिलना चाहिए।
शीर्ष अदालत ने इस बहुचर्चित मामले की अगली सुनवाई के लिए 2 दिसंबर की तारीख तय की है। माना जा रहा है कि पूर्व न्यायाधीश की यह स्वतंत्र रिपोर्ट तीन दशकों से फ्लैट की आस में बैठे वास्तविक आवंटियों को उनका अधिकार दिलाने और अनाधिकृत कब्जों या दावों को छांटने में सबसे अहम दस्तावेज साबित होगी।
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