Nishu Azad Case: जंतर-मंतर मारपीट मामले में CJP का प्रदर्शन, गिरफ्तारी की मांग

संसद मार्ग थाने पहुंची CJP, स्वतंत्र भारद्वाज पर FIR और गिरफ्तारी की मांग तेज

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Nishu Azad Case: राष्ट्रीय राजधानी के ऐतिहासिक धरना स्थल जंतर-मंतर पर घटित कथित हिंसा का प्रकरण एक बार फिर राजनीतिक और सामाजिक हलकों में तीखे विवाद का कारण बन गया है। सामाजिक कार्यकर्ता निशु आजाद के 38 वर्षीय पिता संजय कुमार के साथ हुई मारपीट के मामले को लेकर शुक्रवार को कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के कार्यकर्ताओं और छात्र नेताओं ने नई दिल्ली स्थित संसद मार्ग पुलिस स्टेशन का घेराव किया। प्रदर्शनकारियों ने पटेल चौक मेट्रो स्टेशन से थाने तक विरोध मार्च निकाला और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर स्वतंत्र भारद्वाज के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज कर अविलंब गिरफ्तारी की मांग की। संगठन ने आरोप लगाया कि 23 जून को हुए शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दौरान संजय कुमार पर जानलेवा हमला किया गया था, किंतु पुलिस प्रभावशाली आरोपियों को बचाने के उद्देश्य से नरम रुख अपना रही है।

इस विवाद के दोबारा तूल पकड़ने की मुख्य वजह सोशल मीडिया पर प्रसारित हुआ स्वतंत्र भारद्वाज का एक कथित वीडियो है, जिसमें मारपीट और पुलिस हस्तक्षेप को लेकर कई चौंकाने वाले दावे किए गए हैं। वीडियो के वायरल होते ही मामले में कांग्रेस पार्टी के शीर्ष नेतृत्व की भी सीधी एंट्री हो गई है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और पार्टी के मीडिया विभाग के प्रमुख पवन खेड़ा ने सोशल मीडिया पर दिल्ली पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए निशु आजाद के परिवार को पूर्ण समर्थन देने की घोषणा की है। दूसरी ओर, दिल्ली पुलिस ने किसी भी प्रकार के राजनीतिक दबाव या प्रशासनिक शिथिलता के आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा है कि प्रकरण में कानूनी प्रक्रियाओं का पूरी निष्पक्षता से पालन किया गया है और साक्ष्यों के आधार पर अदालत में आरोप पत्र (चार्जशीट) दाखिल करने की तैयारी है।

Nishu Azad Case: प्रदर्शन के दौरान भड़की हिंसा और दर्ज हुआ मामला

घटनाक्रम की पृष्ठभूमि 23 जून 2026 की है, जब जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी द्वारा एक निर्धारित जनहित मुद्दे पर विरोध प्रदर्शन का आयोजन किया गया था। पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार, प्रदर्शन के दौरान अचानक दो पक्षों के बीच कहासुनी शुरू हो गई, जो देखते ही देखते हाथापाई और मारपीट में तब्दील हो गई। इस झड़प में गाजियाबाद के रहने वाले संजय कुमार के सिर पर गंभीर चोट आई, जिसके बाद उन्हें तत्काल उपचार के लिए नजदीकी राम मनोहर लोहिया (RML) अस्पताल ले जाया गया।

घटना के तुरंत बाद संजय कुमार की लिखित शिकायत के आधार पर संसद मार्ग पुलिस स्टेशन में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की सुसंगत धाराओं के तहत आपराधिक प्रकरण दर्ज किया गया। मौके पर तैनात पुलिस बल ने त्वरित कार्रवाई करते हुए सूरज कुमार और स्वतंत्र भारद्वाज को हिरासत में लिया था। पुलिस का कहना है कि प्रारंभिक पूछताछ और विधिक औपचारिकताओं के उपरांत दोनों आरोपियों को कानूनी प्रावधानों के तहत नोटिस थमाते हुए जांच में सहयोग करने का निर्देश दिया गया था।

स्वतंत्र भारद्वाज का कथित वीडियो वायरल: पुलिस तंत्र और राजनीतिक रसूख पर उठे सवाल

मामले ने उस समय विस्फोटक रूप ले लिया जब सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफॉर्म्स पर स्वतंत्र भारद्वाज से जुड़ा एक वीडियो तेजी से प्रसारित होने लगा। इस वीडियो में कथित तौर पर जंतर-मंतर की मारपीट की घटना का उल्लेख करते हुए कुछ ऐसी बातें कही गई थीं, जिससे यह संदेश गया कि आरोपी अपने राजनीतिक संपर्कों के चलते कानूनी कार्रवाई से बच निकलने में सफल रहा।

इस वीडियो क्लिप के सामने आते ही विपक्षी दलों और छात्र संगठनों ने दिल्ली पुलिस की साख पर तीखे सवाल दाग दिए। सीजेपी और कांग्रेस नेताओं ने आरोप लगाया कि वीडियो इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि सत्ता के संरक्षण में कानून के रखवालों पर दबाव बनाया गया, जिसके कारण गंभीर चोट पहुंचाने के बावजूद आरोपियों को साधारण धाराओं में राहत दे दी गई। हालांकि पुलिस का स्पष्ट कहना है कि सोशल मीडिया पर फैलाई जा रही बातों और जांच के आधिकारिक रिकॉर्ड में जमीन-आसमान का अंतर है।

चोट की गंभीरता और मेडिकल रिपोर्ट पर दिल्ली पुलिस का आधिकारिक रुख

सोशल मीडिया पर संजय कुमार के सिर में गंभीर फ्रैक्चर और गहरी आंतरिक चोटों के किए जा रहे दावों के बीच नई दिल्ली जिले के पुलिस उपायुक्त (DCP) सचिन शर्मा ने पुलिस का पक्ष मीडिया के सामने रखा। पुलिस उपायुक्त ने स्पष्ट किया कि घटना के दिन ही पीड़ित का आरएमएल अस्पताल के ट्रॉमा सेंटर में विस्तृत चिकित्सकीय परीक्षण कराया गया था।

डॉक्टरों द्वारा जारी की गई मेडिकल लीगल केस (MLC) रिपोर्ट में चोटों को ‘साधारण प्रकृति’ (Simple in Nature) की श्रेणी में दर्ज किया गया है। पुलिस अधिकारियों के अनुसार, जांच में यह तथ्य सामने आया है कि सिर में लगी चोट किसी धारदार हथियार या लोहे की रॉड से नहीं, बल्कि मारपीट के दौरान हाथ में पहने गए धातु के कड़े के टकराने से लगी थी। पुलिस ने दोहराया कि सोशल मीडिया पर कपाल की हड्डी टूटने जैसे जो दावे किए जा रहे हैं, वे मेडिकल साक्ष्यों से किसी भी रूप में प्रमाणित नहीं होते हैं।

राहुल गांधी और पवन खेड़ा का सीधा हस्तक्षेप: दिल्ली पुलिस की निष्पक्षता पर घेराबंदी

इस पूरे मामले में उस वक्त बड़ा राष्ट्रीय राजनीतिक मोड़ आया जब कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने निशु आजाद के समर्थन में खुलकर सार्वजनिक बयान जारी किया। निशु आजाद द्वारा सोशल मीडिया पर न्याय की गुहार लगाए जाने के बाद राहुल गांधी ने उन्हें आश्वस्त करते हुए कहा कि उनके संघर्ष में समूचा विपक्ष उनके साथ खड़ा है और उन्हें डरने की कोई आवश्यकता नहीं है। उन्होंने निशु को छात्रों और वंचित समाज के अधिकारों की मजबूत आवाज करार दिया।

वहीं कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने भी दिल्ली पुलिस की कार्यशैली को कटघरे में खड़ा किया। खेड़ा ने कहा कि जब आरोपी स्वयं सार्वजनिक रूप से अपनी संलिप्तता और राजनीतिक रसूख का बखान कर रहा है, तब दिल्ली पुलिस का ढुलमुल रवैया यह दर्शाता है कि राजधानी में कानून का राज चुनिंदा लोगों के लिए काम कर रहा है। कांग्रेस ने इस मामले की किसी उच्चस्तरीय स्वतंत्र एजेंसी से निष्पक्ष जांच कराने और आरोपियों की तत्काल गिरफ्तारी की मांग की है।

संसद मार्ग थाने पर CJP का उग्र प्रदर्शन: एससी-एसटी एक्ट की धाराओं को जोड़ने की मांग

विवाद के गहराने के साथ ही शुक्रवार दोपहर सीजेपी के मुख्य प्रवक्ता सौरव दास और सह-संयोजक आशुतोष रांका के नेतृत्व में दर्जनों कार्यकर्ताओं ने पटेल चौक से संसद मार्ग थाने की ओर कूच किया। थाने के बाहर भारी पुलिस बैरिकेडिंग के बीच प्रदर्शनकारियों ने जोरदार नारेबाजी की और स्वतंत्र भारद्वाज को अविलंब गिरफ्तार करने के नारे लगाए।

सीजेपी नेताओं का कहना है कि यह केवल सामान्य मारपीट का मामला नहीं है, बल्कि एक शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारी को जानबूझकर लक्षित करके हिंसा की गई है। प्रतिनिधिमंडल ने वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों से मुलाकात कर एक विस्तृत ज्ञापन सौंपा, जिसमें मांग की गई कि मामले में हत्या के प्रयास की धाराएं जोड़ी जाएं और चूंकि पीड़ित पक्ष अनुसूचित जाति से संबंध रखता है, इसलिए मामले में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के कड़े प्रावधान भी लागू किए जाएं। संगठन ने चेतावनी दी है कि यदि ठोस कानूनी कदम नहीं उठाए गए तो यह आंदोलन देशव्यापी रूप लेगा।

दिल्ली पुलिस ने खारिज किया राजनीतिक दबाव का आरोप, चार्जशीट दाखिल करने की तैयारी

दिल्ली पुलिस के आला अधिकारियों ने प्रदर्शनकारियों और राजनीतिक दलों द्वारा लगाए गए दुर्भावनापूर्ण जांच के आरोपों को पूरी तरह निराधार बताया है। पुलिस प्रशासन का कहना है कि 23 जून की घटना के बाद से ही जांच अधिकारी (IO) ने हर तकनीकी और फॉरेंसिक साक्ष्य को विधिवत एकत्र किया है। दोनों नामजद आरोपियों से विस्तृत पूछताछ की जा चुकी है और उनके आवागमन व कॉल डिटेल रिकॉर्ड की भी जांच की गई है।

पुलिस ने जोर देकर कहा कि कानून के समक्ष सभी नागरिक समान हैं और जांच पूरी तरह निष्पक्ष और पारदर्शी रही है। जांच की प्रक्रिया अब अपने अंतिम चरण में है और संबंधित धाराओं के तहत सभी आवश्यक मेडिकल साक्ष्यों, प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों और घटनास्थल के सीसीटीवी फुटेज को संकलित कर जल्द ही सक्षम न्यायालय के समक्ष आरोप पत्र (चार्जशीट) पेश किया जाएगा। पुलिस ने नागरिकों से अपील की है कि वे सोशल मीडिया के असत्यापित दावों पर विश्वास न करें और न्यायिक प्रक्रिया पर भरोसा रखें।

Nishu Azad Case: सोशल मीडिया ट्रायल और कानून के शासन के बीच आगे की विधिक डगर

निशु आजाद और उनके पिता से जुड़ा यह मामला इस बात का स्पष्ट उदाहरण बन गया है कि किस प्रकार एक स्थानीय विवाद सोशल मीडिया के दौर में देखते ही देखते एक बड़ा राजनीतिक अखाड़ा बन जाता है। एक तरफ जहां पीड़ित परिवार और उनके समर्थक त्वरित गिरफ्तारी और धाराओं को कड़ा करने के लिए आंदोलित हैं, वहीं पुलिस का जोर वैज्ञानिक साक्ष्यों और अस्पताल की आधिकारिक मेडिकल रिपोर्ट पर टिका हुआ है।

कानूनी जानकारों के अनुसार, अब इस मामले का वास्तविक फैसला न्यायिक पटल पर ही होगा। यदि अभियोजन पक्ष द्वारा दाखिल की जाने वाली चार्जशीट या उसकी धाराओं से पीड़ित पक्ष असंतुष्ट रहता है, तो उनके पास दंड प्रक्रिया संहिता के तहत सक्षम मजिस्ट्रेट के समक्ष विरोध याचिका (Protest Petition) दायर करने का पूर्ण कानूनी अधिकार सुरक्षित है। तब तक के लिए, संसद मार्ग थाने के बाहर उपजा यह तनाव राजधानी के प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में चर्चा का सबसे गर्म विषय बना हुआ है।

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