Nepal Flood Rescue: तबाही के 10 दिन बाद त्रिशूली-3A सुरंग से गूंजी जिंदगी की पुकार, रेस्क्यू टीम ने दो श्रमिकों को निकाला सुरक्षित बाहर; अब भी सैकड़ों की तलाश जारी

नेपाल बाढ़ के 10 दिन बाद सुरंग से मिली जिंदगी की खबर, रेस्क्यू अभियान अब भी जारी

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Nepal Flood Rescue: नेपाल के उत्तरी हिमालयी क्षेत्र में विगत 26 अगस्त को आए भीषण जलप्रलय और ग्लेशियर फटने की भयावह विभीषिका के बाद शुक्रवार को राहत एवं बचाव अभियान के दौरान एक सुखद और चमत्कारिक सफलता हाथ लगी है। भोटेकोशी और त्रिशूली नदी घाटी में आई विनाशकारी बाढ़ के चलते जलमग्न हुई त्रिशूली-3A जलविद्युत परियोजना की मुख्य सुरंग में दबे मजदूरों को बाहर निकालने के अभियान में शुक्रवार को उस समय नया मोड़ आया, जब मलबे के सैकड़ों फीट भीतर से जीवन के सक्रिय संकेत और इंसानी आवाजें सुनाई दीं। भारी पत्थरों, गाद और कीचड़ के अवरोधों को चीरते हुए नेपाल सेना, सशस्त्र पुलिस बल और तकनीकी विशेषज्ञों के संयुक्त दल ने तबाही के 10 दिन बाद सुरंग के भीतर फंसे कम से कम दो श्रमिकों को जीवित बाहर निकालने में ऐतिहासिक कामयाबी हासिल की है।

इस प्राकृतिक आपदा ने नेपाल के जलविद्युत बुनियादी ढांचे को सर्वाधिक नुकसान पहुंचाया था, जिसके चलते छह प्रमुख परियोजनाओं की सुरंगों में काम कर रहे सैकड़ों मजदूर और इंजीनियर मलबे में कैद हो गए थे। लंबे समय से चल रहे इस जटिल भूमिगत अभियान में जीवित बचे श्रमिकों की बरामदगी ने न केवल बचाव कर्मियों के मनोबल को सातवें आसमान पर पहुंचा दिया है, बल्कि अपने प्रियजनों की सलामती की राह देख रहे सैकड़ों बेबस परिवारों की उम्मीदों को भी पुनर्जीवित कर दिया है। नेपाल सेना के प्रवक्ता ने आधिकारिक रूप से पुष्टि की है कि निकाले गए श्रमिकों को प्राथमिक उपचार के बाद सैन्य अस्पताल में स्थानांतरित किया गया है और शेष सुरंगों में जीवन की तलाश के लिए अत्याधुनिक सोनार व रडार उपकरणों के साथ अभियान को और तेज कर दिया गया है।

Nepal Flood Rescue: 26 अगस्त का वह मनहूस दिन जब पहाड़ों से उतरी मौत की सुनामी

नेपाल के सिंधुपालचौक और रसुवा जिले में 26 अगस्त 2026 को प्रकृति का जो रौद्र रूप देखने को मिला, उसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी। उच्च हिमालयी क्षेत्र में अचानक ग्लेशियर झील के टूटने (GLOF) अथवा भारी बादल फटने की घटना के बाद त्रिशूली और भोटेकोशी नदी प्रणालियों में अप्रत्याशित जलप्रवाह उत्पन्न हो गया था। पानी के इस प्रचंड रेले के साथ लाखों टन भारी बोल्डर, पेड़ों के तने और कीचड़ का दलदल बहकर नीचे आया, जिसने कुछ ही मिनटों के भीतर समूची घाटी के भूगोल को बदलकर रख दिया।

नदी किनारे बसे दर्जनों गांव, पक्के पुल, राष्ट्रीय राजमार्ग और बहुकरोधी जलविद्युत संयंत्र पलक झपकते ही मलबे के नीचे समा गए। सबसे विकट परिस्थिति उन जलविद्युत परियोजनाओं के कार्यस्थलों पर उत्पन्न हुई, जहां दिन-रात भूमिगत सुरंगों, टरबाइन हॉल और सर्ज शाफ्ट में निर्माण कार्य चल रहा था। पानी और मलबे का बहाव इतना तीव्र और अचानक था कि श्रमिकों को बाहर निकलने का कोई अवसर नहीं मिल सका और सुरंगों के मुख्य द्वार विशालकाय पत्थरों और कंक्रीट के मलबे से पूरी तरह अवरुद्ध हो गए।

मलबे के नीचे से जब गूंजी इंसानी आवाज: रेस्क्यू टीम का बढ़ा हौसला

आपदा प्रबंधन के अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार किसी भी प्राकृतिक आपदा के 72 घंटे बाद जीवित बचने की संभावनाएं तेजी से घटने लगती हैं। नेपाल में भी जैसे-जैसे दिन बीत रहे थे, मलबे में तब्दील हो चुकी सुरंगों से किसी के जीवित निकलने की आस धुंधली पड़ती जा रही थी। किंतु शुक्रवार सुबह त्रिशूली-3A जलविद्युत परियोजना की टेलरेस और हेडरेस सुरंग के मुहाने पर काम कर रहे बचावकर्मियों के कान में जब पत्थरों की दरारों से धीमी इंसानी चीखें और धातु पर चोट करने की आवाजें पड़ीं, तो समूचा अभियान अचानक एक नई ऊर्जा से भर उठा।

सुरंग के भीतर फंसे मजदूरों ने लोहे की छड़ों और औजारों से पाइपों पर चोट करके अपनी मौजूदगी दर्ज कराई थी। मौके पर तैनात नेपाल सेना के खोजी दस्ते ने तत्काल विशेष ध्वनि संसूचक यंत्रों (एकुस्टिक सेंसर्स) का प्रयोग किया, जिसके बाद भीतर कम से कम दो से तीन व्यक्तियों के जीवित होने की शत-प्रतिशत पुष्टि हो गई। आवाज की सटीक दिशा का आकलन करने के उपरांत बचाव दल ने भारी ड्रिलिंग मशीनों और न्यूमेटिक कटरों के जरिए एक संकरा मार्ग बनाना शुरू किया, जिसके जरिए श्रमिकों तक ताजी हवा और ग्लूकोजयुक्त तरल पदार्थ पहुंचाने की व्यवस्था की गई।

सांसों पर पहरा और ऑक्सीजन का संकट: कैसे 10 दिन तक लड़ी गई जंग

भूमिगत सुरंगों में फंसे इंसानों के लिए सबसे बड़ा जानलेवा खतरा ऑक्सीजन का घटता स्तर और कार्बन डाइऑक्साइड व मीथेन जैसी जहरीली गैसों का जमाव होता है। त्रिशूली-3A परियोजना की इस सुरंग में फंसे श्रमिकों ने जिस साहस और धैर्य का परिचय दिया, वह अदम्य मानवीय जिजीविषा का दुर्लभ उदाहरण है। प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि श्रमिक सुरंग के उस हिस्से में सुरक्षित शरण लेने में सफल रहे थे, जहां प्राकृतिक वायु प्रवाह के लिए पूर्व से वेंटिलेशन शाफ्ट या एयर डक्ट स्थापित थे।

इसके अतिरिक्त, पहाड़ी चट्टानों से रिसते पानी ने उन्हें निर्जलीकरण (डिहाइड्रेशन) से बचाए रखा। हालांकि, लगभग 240 घंटे तक घोर अंधकार, भयानक ठंड और सीमित वायुमंडलीय दबाव में बिना भोजन के टिके रहना किसी भी व्यक्ति के मानसिक और शारीरिक संतुलन की सबसे बड़ी परीक्षा होती है। बचावकर्मियों ने श्रमिकों को बाहर निकालते समय इस बात का विशेष ध्यान रखा कि अचानक तेज धूप और वायुमंडलीय दबाव के संपर्क में आने से उनकी आंखों और फेफड़ों को आघात न पहुंचे, इसलिए उन्हें विशेष चिकित्सा प्रोटोकॉल के तहत बाहर लाया गया।

पहाड़ी भूगोल और दलदल: बचाव अभियान के मार्ग में खड़े थे पहाड़ जैसे रोड़े

नेपाल की इस सुरंग त्रासदी में राहत कार्यों को संचालित करना सामान्य मैदानी इलाकों की तुलना में सौ गुना अधिक चुनौतीपूर्ण रहा है। भोटेकोशी और त्रिशूली की संकरी घाटियों में लगातार हो रहे भूस्खलन और अस्थिर चट्टानों के चलते भारी हाइड्रोलिक एक्सकेवेटर और क्रेन को मौके पर पहुंचाना लगभग असंभव हो गया था। सेना और आपदा राहत दलों को कई किलोमीटर तक पैदल चलकर और रस्सियों के सहारे उपकरणों को ढोना पड़ा।

सुरंगों के भीतर जमा हुआ कीचड़ इतना दलदली था कि जैसे ही आगे से मलबा हटाया जाता, पीछे से और अधिक मलबा धंसने लगता था। इस समस्या से निपटने के लिए खनन इंजीनियरों ने विशेष माइक्रो-टनलिंग और केसिंग पाइप तकनीक का सहारा लिया ताकि ढहने वाले हिस्से को सुरक्षित ढांचा प्रदान किया जा सके। पानी के निरंतर रिसाव के कारण पहले शक्तिशाली सबमर्सिबल पंपों के जरिए लाखों लीटर गंदा पानी बाहर निकाला गया, जिसके बाद ही बचाव दल के जवान रेंगते हुए सुरंग के संकरे गलियारों में प्रवेश कर सके।

सैकड़ों श्रमिकों के लापता होने का दर्द: छह जलविद्युत परियोजनाओं में मातम

त्रिशूली-3A सुरंग से मिली यह कामयाबी एक बड़ी राहत जरूर है, लेकिन इस आपदा का कुल पैमाना इतना विशाल है कि पूरा नेपाल अब भी स्तब्ध है। अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसियों और नेपाल सरकार के गृह मंत्रालय के संयुक्त आंकड़ों के अनुसार, इस पूरे जलप्रलय में विभिन्न छह जलविद्युत परियोजनाओं के लगभग नौ सौ मजदूर, तकनीकी कर्मचारी और स्थानीय ग्रामीण लापता दर्ज किए गए हैं। इनमें भारत, नेपाल और चीन के अनुभवी श्रमिक और इंजीनियर शामिल हैं।

कई परियोजनाओं के पावरहाउस पूरी तरह पानी में डूबे हुए हैं और उनके प्रवेश द्वारों पर कई सौ टन वजनी बोल्डर अटके हुए हैं। परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है और वे अपने आत्मीयों की एक झलक पाने के लिए राहत शिविरों और सुरंगों के मुहानों पर डेरा डाले बैठे हैं। नेपाल सरकार ने स्वीकार किया है कि जब तक सभी प्रभावित सुरंगों का पानी और गाद पूरी तरह बाहर नहीं निकाल लिया जाता, तब तक हताहतों की वास्तविक संख्या का सटीक आकलन प्रस्तुत कर पाना अत्यंत कठिन होगा।

अंतरराष्ट्रीय सहयोग: सिलक्यारा के भारतीय विशेषज्ञों की मदद और वैश्विक संवाद

इस विकट मानवीय त्रासदी के समय अंतरराष्ट्रीय समुदाय और विशेष रूप से भारत ने नेपाल की हरसंभव सहायता के लिए हाथ आगे बढ़ाया है। भारत और नेपाल के भूगर्भीय और खनन इंजीनियरों ने एक विशेष आपातकालीन तकनीकी मंच का गठन किया है, जिसके माध्यम से सुरंगों के 3D ब्लूप्रिंट, संरचनात्मक आरेख और जीपीएस निर्देशांक साझा किए जा रहे हैं।

उत्तराखंड के उत्तरकाशी में स्थित सिलक्यारा सुरंग में 41 श्रमिकों को ऐतिहासिक रूप से सुरक्षित बाहर निकालने वाली भारतीय विशेषज्ञ टीम और अनुभवी रैट माइनर्स ने भी इस अभियान में अपने अनुभव और तकनीकी कौशल का योगदान देने की औपचारिक पेशकश की है। सिलक्यारा में जिस तरह सीमित स्थान में मैनुअल ड्रिलिंग और पाइप पुशिंग तकनीक का सफल प्रयोग किया गया था, उसी तरह की रणनीतियां अब नेपाल की त्रिशूली और भोटेकोशी परियोजनाओं की सुरंगों में भी लागू की जा रही हैं ताकि मलबे में फंसे अंतिम व्यक्ति तक जीवन की किरण पहुंचाई जा सके।

पर्यावरणीय चेतावनी: हिमालयी विकास परियोजनाओं के सुरक्षा मानकों पर पुनर्चिंतन

नेपाल की यह प्रलयंकारी घटना केवल एक स्थानीय आपदा नहीं है, बल्कि संपूर्ण हिमालयी क्षेत्र में चल रहे अनियंत्रित बुनियादी ढांचा निर्माण और जलवायु परिवर्तन के गहरे दुष्प्रभावों की एक गंभीर चेतावनी है। वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों का मानना है कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण हिमालय के ऊंचे ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं और अस्थिर झीलों का निर्माण कर रहे हैं। जब ये झीलें एकाएक फटती हैं, तो नीचे बनी सुरंगों और बांधों को संभलने का न्यूनतम समय भी नहीं मिलता।

इस त्रासदी ने यह अनिवार्य प्रश्न खड़ा कर दिया है कि क्या भविष्य में जलविद्युत परियोजनाओं के निर्माण के दौरान आपातकालीन निकासी सुरंगों, स्वचालित पूर्व चेतावनी प्रणालियों (अर्ली वार्निंग सिस्टम) और मजबूत वेंटिलेशन चैंबर्स को अनिवार्य नहीं बनाया जाना चाहिए। यदि इन परियोजनाओं में आपातकालीन सुरक्षा कक्ष मौजूद होते, तो शायद फंसे हुए सैकड़ों श्रमिकों का जीवन अधिक सुरक्षित रह सकता था।

Nepal Flood Rescue: बची हुई सांसों को तलाशने का अटूट संकल्प

त्रिशूली-3A सुरंग से दो श्रमिकों का जीवित निकलना इस बात का साक्षात प्रमाण है कि जब तक सांस है, तब तक उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा जा सकता। नेपाल के प्रधानमंत्री और गृह मंत्री ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि जब तक सुरंगों के अंतिम छोर की जांच पूरी नहीं हो जाती, राहत एवं बचाव कार्य बिना रुके 24 घंटे लगातार जारी रहेगा। सेना के जवान, इंजीनियर और स्थानीय स्वयंसेवक बिना सोए, विषम परिस्थितियों में अपनी जान जोखिम में डालकर पत्थरों को तराश रहे हैं।

यह अभियान अब केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि इंसान के हौसले और प्रकृति की विनाशकारी ताकत के बीच का महासंग्राम बन चुका है। पूरा देश और दुनिया त्रिशूली नदी के किनारे चल रहे इस रेस्क्यू ऑपरेशन पर टकटकी लगाए हुए है, इस सामूहिक प्रार्थना के साथ कि मलबे की उस काली कोठरी से जिंदगी की पुकारें यूं ही आती रहें और बाकी बचे लोग भी सकुशल अपने परिवारों की गोद में लौट सकें।

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