FCRA Amendment Bill 2026: 31 सदस्यीय JPC गठित, संजय जायसवाल बने अध्यक्ष
विदेशी फंडिंग कानून की क्लॉज-दर-क्लॉज समीक्षा करेगी JPC, 31 सांसदों को समिति में मिली जगह
FCRA Amendment Bill 2026: देश में गैर-सरकारी संगठनों (NGOs), धार्मिक ट्रस्टों और सामाजिक संस्थाओं को मिलने वाले विदेशी चंदे और फंडिंग के नियमों को कड़ा और पारदर्शी बनाने के उद्देश्य से लाए गए विदेशी अभिदाय (विनियमन) संशोधन विधेयक यानी FCRA Amendment Bill 2026 को लेकर संसद में एक निर्णायक कदम उठाया गया है। संसद के दोनों सदनों में विधेयक के विभिन्न प्रावधानों पर सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच बनी सहमति और गतिरोध के उपरांत, इसकी विस्तृत जांच और क्लॉज-दर-क्लॉज समीक्षा के लिए संसद की 31 सदस्यीय संयुक्त संसदीय समिति (JPC) का गठन कर दिया गया है।
लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति द्वारा अधिसूचित इस सर्वदलीय संयुक्त समिति की कमान बिहार के बेतिया (पश्चिम चंपारण) से भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ लोकसभा सांसद डॉ. संजय जायसवाल को सौंपी गई है। समिति में दोनों सदनों के अनुभवी विधिवेत्ताओं, पूर्व राजनयिकों और विभिन्न दलों के प्रमुख सांसदों को शामिल किया गया है। यह समिति प्रस्तावित संशोधनों के संवैधानिक, प्रशासनिक, वित्तीय और व्यावहारिक पहलुओं की गहराई से पड़ताल करेगी और अपने विस्तृत संशोधनों व सिफारिशों के साथ संसद के समक्ष रिपोर्ट प्रस्तुत करेगी।
FCRA Amendment Bill 2026: लोकसभा के 21 और राज्यसभा के 10 सांसदों का प्रतिनिधित्व
संसद द्वारा गठित इस 31 सदस्यीय उच्चस्तरीय समिति में लोकसभा से 21 और राज्यसभा से 10 सांसदों को नामित किया गया है, ताकि प्रस्तावित कानून पर राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक राजनीतिक विमर्श संभव हो सके।
लोकसभा के सदस्यों में समिति के अध्यक्ष डॉ. संजय जायसवाल के अतिरिक्त भर्तृहरि महताब, तेजस्वी सूर्या, कमलेश जांगड़े, मुकेशकुमार चंद्रकांत दलाल, निशिकांत दुबे, विष्णु दयाल राम, अनंता नायक, अरविंद धर्मपुरी, एंटो एंटनी, कैप्टन विरियाटो फर्नांडिस, मोहम्मद हमदुल्लाह सईद, काली चरण मुंडा, जिया उर रहमान, कल्याण बनर्जी, ए. राजा, लावु श्री कृष्ण देवरायालु, नरेश गणपत म्हस्के, कौशलेन्द्र कुमार, सुप्रिया सुले और ई. टी. मोहम्मद बशीर को स्थान दिया गया है।
वहीं उच्च सदन यानी राज्यसभा से पूर्व विदेश सचिव हर्षवर्धन श्रृंगला, वरिष्ठ विधिवेत्ता उज्ज्वल देवराव निकम, सी. सदानंदन मास्टर, अलका गुर्जर, सतपाल शर्मा, प्रफुल्ल पटेल, संजय कुमार झा, क्रिस्टोफर मानिकम, मेनका गुरुस्वामी और पी. विल्सन को सदस्य बनाया गया है। विभिन्न राजनीतिक विचारधाराओं और विधिक पृष्ठभूमि से आने वाले सदस्यों की उपस्थिति से विधेयक के हर पहलू पर संतुलित चर्चा की पृष्ठभूमि तैयार हुई है।
विधेयक का सबसे बड़ा प्रस्ताव: निरस्त पंजीकरण के बाद संपत्तियों के प्रबंधन के लिए ‘नामित प्राधिकरण’
विदेशी अभिदाय (विनियमन) संशोधन विधेयक 2026 के मसौदे में जो सबसे महत्वपूर्ण और दूरगामी संरचनात्मक बदलाव प्रस्तावित किया गया है, वह केंद्र सरकार द्वारा एक ‘नामित प्राधिकरण’ (Designated Authority) के गठन से संबंधित है।
प्रस्तावित कानून के अनुसार, यदि किसी गैर-सरकारी संगठन या संस्था का एफसीआरए पंजीकरण अधिनियम के उल्लंघन के चलते रद्द कर दिया जाता है, संगठन स्वयं अपनी मान्यता सरेंडर कर देता है अथवा समय पर नवीनीकरण न होने के कारण उसका लाइसेंस निष्प्रभावी हो जाता है, तो ऐसी स्थिति में उस संस्था द्वारा विदेशी योगदान से जुटाई गई नकदी, बैंक खातों में जमा विदेशी धन और उससे निर्मित समस्त अचल परिसंपत्तियों (जैसे भूमि, भवन, उपकरण आदि) का प्रबंधन और नियंत्रण इस नामित प्राधिकरण के अधीन आ जाएगा। यह प्रावधान यह सुनिश्चित करने के लिए लाया गया है कि पंजीकरण समाप्त होने के बाद विदेशी पूंजी से खड़ी की गई संपत्तियों का उपयोग देशविरोधी गतिविधियों या अनधिकृत कार्यों में न किया जा सके।
धार्मिक और उपासना स्थलों के लिए विशेष सुरक्षात्मक सुरक्षा कवच
संशोधन विधेयक में विदेशी योगदान से सृजित धार्मिक और पूजा स्थलों के संबंध में एक विशेष अपवाद और सुरक्षात्मक प्रावधान भी जोड़ा गया है। यदि किसी संस्था का पंजीकरण रद्द होने के बाद उसकी ऐसी परिसंपत्ति सरकारी नियंत्रण या नामित प्राधिकरण के अधीन आती है जिसका मूल स्वरूप मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर, गुरुद्वारा या किसी उपासना स्थल का है, तो कानूनन प्राधिकरण को उसके धार्मिक चरित्र, रीति-रिवाजों और स्वरूप को पूर्णतः अक्षुण्ण बनाए रखना होगा।
इस प्रावधान का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि प्रशासनिक कार्रवाई के दौरान धार्मिक आस्था और उपासना की स्वतंत्रता प्रभावित न हो। हालांकि, विपक्ष और कई कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे स्थलों के दैनिक प्रशासनिक प्रबंधन और पूजा के संचालन का अंतिम अधिकार किस रूप में लागू होगा, यह व्यावहारिक स्तर पर एक संवेदनशील विषय है। जेपीसी इस बात की विस्तृत समीक्षा करेगी कि धार्मिक स्वतंत्रता और विनियामक नियंत्रण के बीच एक सुदृढ़ विधिक संतुलन किस प्रकार स्थापित किया जाए।
दंड के प्रावधानों में बड़ा बदलाव: 5 साल की जेल घटाकर 1 वर्ष करने की सिफारिश
संशोधन विधेयक का एक अन्य आश्चर्यजनक और महत्वपूर्ण पहलू एफसीआरए नियमों के उल्लंघन पर दी जाने वाली सजा की अधिकतम सीमा को युक्तिसंगत बनाना है। वर्तमान एफसीआरए अधिनियम के तहत गंभीर प्रक्रियात्मक अथवा वित्तीय उल्लंघन पर अधिकतम पांच वर्ष तक के सश्रम कारावास का प्रावधान लागू है।
प्रस्तावित संशोधन विधेयक 2026 में इस अधिकतम दंड सीमा को पांच साल से घटाकर एक साल करने का प्रस्ताव रखा गया है। सरकार का तर्क है कि गैर-इरादतन प्रक्रियात्मक चूकों और तकनीकी उल्लंघनों के मामलों में अत्यधिक कठोर दंड के स्थान पर त्वरित न्यायिक निस्तारण और भारी वित्तीय जुर्माने को प्राथमिकता दी जानी चाहिए ताकि व्यापारिक और सामाजिक कार्यों का माहौल तनावमुक्त रहे। संयुक्त संसदीय समिति अब इस बिंदु पर विचार करेगी कि क्या इस कमी से कानून का निवारक प्रभाव (Deterrent Effect) कमजोर तो नहीं पड़ेगा या क्या गंभीर राष्ट्रीय सुरक्षा उल्लंघनों के लिए कड़े दंड की अलग श्रेणी बनाई जानी चाहिए।
भारत में विदेशी चंदे का बढ़ता पैमाना: 55,741 करोड़ रुपये और 22 हजार से अधिक रद्द लाइसेंस
गृह मंत्रालय (MHA) द्वारा जारी आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2019 से 2022 के बीच केवल तीन वित्तीय वर्षों में भारत के 13,520 पात्र संगठनों को कुल 55,741 करोड़ रुपये का विदेशी चंदा प्राप्त हुआ। यह विशाल आंकड़ा दर्शाता है कि देश के भीतर सामाजिक, शैक्षिक, स्वास्थ्य और शोध कार्यों में विदेशी पूंजी का कितना बड़ा हस्तक्षेप है।
विदेशी चंदे के नियमन में पारदर्शिता लाने के लिए चलाए गए जांच अभियानों के परिणामस्वरूप, एफसीआरए पोर्टल के ताजा आंकड़ों के अनुसार 15 जुलाई 2026 तक देश में 14,449 संगठनों के एफसीआरए प्रमाणपत्र ही सक्रिय बचे हैं। इसके विपरीत, वित्तीय अनियमितताओं, ऑडिट रिपोर्ट न देने और निर्धारित उद्देश्यों से इतर धन के इस्तेमाल के चलते 22,498 गैर-सरकारी संगठनों के लाइसेंस रद्द किए जा चुके हैं, जबकि 15,212 संगठनों के प्रमाणपत्रों की समयावधि नवीनीकरण न होने के कारण समाप्त हो चुकी है। इस पृष्ठभूमि में नया कानून विदेशी पूंजी के प्रवाह को राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के अनुकूल बनाने की दिशा में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
FCRA Amendment Bill 2026: संसदीय समिति के समक्ष प्रमुख चुनौतियां और आगे की विधिक प्रक्रिया
जेपीसी अध्यक्ष के रूप में डॉ. संजय जायसवाल के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती विभिन्न हितधारकों—जैसे सामाजिक कार्यकर्ता, कानूनी विशेषज्ञ, वित्तीय ऑडिटर और धार्मिक संगठनों के प्रतिनिधियों—को समिति के समक्ष बुलाकर उनकी चिंताओं को सुनना होगा। विपक्ष का मुख्य आक्षेप यह रहा है कि नामित प्राधिकरण को संपत्तियां अधिग्रहित करने का असीमित अधिकार मिलने से नागरिक समाज और गैर-सरकारी संगठनों की स्वायत्तता प्रभावित हो सकती है।
जेपीसी इन सभी आपत्तियों की बिंदुवार समीक्षा करने के बाद अपनी एक व्यापक रिपोर्ट तैयार करेगी। समिति के सुझावों के आधार पर गृह मंत्रालय संशोधन विधेयक के मूल मसौदे में आवश्यक फेरबदल कर सकता है, जिसके पश्चात इस परिष्कृत विधेयक को पुनः संसद के दोनों सदनों में पारित कराने के लिए प्रस्तुत किया जाएगा। तब तक विदेशी फंडिंग से जुड़े सभी नीतिगत बदलावों की दिशा जेपीसी के विचार-विमर्श और उसकी आगामी रिपोर्ट पर ही टिकी रहेगी।
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