Mehangai Dayan Song: ‘महंगाई डायन खाए जात है’, कैसे बुंदेलखंड की चौपाल से निकला यह गीत बन गया आम आदमी की आवाज
Mehangai Dayan Song: : बुंदेलखंड की चौपाल से पीपली लाइव तक कैसे पहुंचा यह कल्ट गीत?
Mehangai Dayan Song: भारत की मिट्टी में कला और संगीत की जो खुशबू बसी है, वह आपको बड़े शहरों की चकाचौंध में नहीं मिलेगी। हमारे देश का दिल गांवों की चौपालों पर धड़कता है, जहां गाए जाने वाले लोकगीतों में आम इंसान का सुख-दुख छिपा होता है। बुंदेलखंड की धरती से निकला एक ऐसा ही गीत है ‘महंगाई डायन खाए जात है’। यह गाना सिर्फ एक धुन नहीं, बल्कि उस हर घर की व्यथा है जो बढ़ती कीमतों की मार झेल रहा है। मध्य प्रदेश के एक छोटे से गांव से शुरू हुआ यह सफर आज देश के हर उस व्यक्ति की जुबान पर है जो संघर्ष की कहानी को बखूबी समझता है।
Mehangai Dayan Song: एक गुमनाम गांव की गलियों से बॉलीवुड के पर्दे तक
यह गीत मध्य प्रदेश के बड़वाई गांव की देन है। बहुत कम लोग जानते हैं कि इसे किसी बड़े फिल्मी गीतकार ने नहीं, बल्कि गांव के ही एक साधारण लोक कलाकार गयाप्रसाद प्रजापति ने रचा था। बरसों तक यह गीत गांव के आंगनों में, खेत-खलिहानों में और चौपालों पर बड़वाई विलेज मंडली द्वारा गाया जाता रहा। ग्रामीण अपनी दिनभर की थकान को मिटाने के लिए इस धुन का सहारा लेते थे। तब किसी ने सोचा भी नहीं था कि एक दिन यही क्षेत्रीय गीत पूरे देश के सिनेमाघरों में गूंजेगा और लोग इसे अपना दर्द मान लेंगे।
वर्ष 2010 में आई फिल्म ‘पीपली लाइव’ ने इस गीत को नई पहचान दिलाई। फिल्म के निर्देशकों ने इसकी असलियत को बनाए रखने के लिए किसी बड़े सिंगर के बजाय उसी ग्रामीण मंडली को चुना, जिसने इसे बरसों से गाया था। अभिनेता रघुबीर यादव ने जब इस मंडली के साथ अपनी आवाज मिलाई, तो यह गीत अमर हो गया। आज भी रघुबीर यादव के उस अंदाज को लोग याद करते हैं, जिसमें उन्होंने एक आम आदमी का दुख और सिस्टम पर करारा तंज बखूबी उतारा था।
महंगाई को ‘डायन’ कहने का गहरा अर्थ
इस गीत की सबसे बड़ी ताकत इसका सीधा और चुभने वाला संदेश है। इसमें महंगाई को महज एक आर्थिक शब्द न मानकर उसे ‘डायन’ की संज्ञा दी गई है। भारतीय लोक संस्कृति में ‘डायन’ एक ऐसी भयानक शक्ति मानी जाती है जो घर-परिवार को बर्बाद कर देती है। गीतकार ने महंगाई को उसी रूप में चित्रित किया है, जो मजदूर और कामकाजी वर्ग की खून-पसीने की कमाई को पल भर में निगल जाती है। यह डार्क ह्यूमर यानी कड़वा मजाक उस सामाजिक हकीकत को दर्शाता है, जिसे बोलने में अक्सर लोग डरते हैं।
Mehangai Dayan Song: देसी वाद्ययंत्र और बुंदेलखंडी बोली की सादगी
गाने की लोकप्रियता के पीछे का एक मुख्य कारण इसकी ठेठ बुंदेलखंडी बोली है। हारमोनियम की मीठी तान, ढोलक की लय और मंजीरे की छन-छन जब कानों में पड़ती है, तो वह आधुनिक संगीत की शोर-शराबे वाली धुन से कहीं अधिक सुकून देती है। इसकी बोली इतनी सरल और अपनी है कि इसे सुनते ही एक गहरा लगाव महसूस होता है। इसे आप सिर्फ एक गाना नहीं बल्कि एक ‘श्रम गीत’ कह सकते हैं, जो मेहनत करने वाले हर इंसान के संघर्ष का गवाह है।
आज जब भी बाजार में दाल, सब्जी या पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ती हैं, तो अनायास ही लोगों के जुबान पर ‘महंगाई डायन खाए जात है’ के बोल आ जाते हैं। यह इस बात का सबूत है कि भले ही समय बदल जाए, लेकिन आम आदमी की परेशानियां वही हैं। यह गीत कला की उस ताकत का प्रतीक है, जो बड़ी-बड़ी भाषणों से ज्यादा असरदार तरीके से समाज की कड़वी सच्चाई को बयां कर देता है। बुंदेलखंड के इस लोक संगीत ने साबित कर दिया है कि अगर गीत में सच्चाई और मिट्टी की महक हो, तो उसे दुनिया की कोई ताकत भुला नहीं सकती।
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