LPG to PNG: गैस सिलेंडर से मुक्ति क्यों देना चाहती है सरकार? जानें क्या है पीएनजी का पूरा गणित और इससे आपको क्या होगा फायदा

LPG to PNG: गैस सिलेंडर से मुक्ति क्यों देना चाहती है सरकार? जानें क्या है पीएनजी का पूरा गणित और इससे आपको क्या होगा फायदा

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LPG to PNG: देश के करोड़ों घरों में सुबह की शुरुआत चाय के साथ और रसोई में जलते हुए गैस चूल्हे की नीली लौ के साथ होती है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जिस एलपीजी सिलेंडर को आप बरसों से अपने किचन की शान मानते आए हैं, उससे सरकार धीरे-धीरे किनारा क्यों करना चाहती है? मामला कुछ इस तरह से है कि सरकार अब चाहती है कि जहां-जहां पाइप वाली गैस की सुविधा यानी पीएनजी पहुंच सकती है, वहां एलपीजी सिलेंडर पर निर्भरता को पूरी तरह से कम कर दिया जाए। इसके लिए गैस वितरण कंपनियों को मैदान में उतार दिया गया है और एक नया खाका तैयार किया गया है जो भविष्य की ऊर्जा जरूरतों को पूरी तरह बदल कर रख सकता है।
क्या आपके घर तक भी पाइप वाली गैस पहुंच चुकी है और आपने अब तक इसका कनेक्शन नहीं लिया है? अगर आपका जवाब हाँ है, तो यह खबर आपको एक बार गहराई से सोचने पर मजबूर कर सकती है। आखिर ऐसा क्या हो गया है कि सरकार देश के हर रसोईघर को पीएनजी यानी पाइप्ड नेचुरल गैस से जोडने के लिए इतनी बड़ी तैयारी कर रही है। आंकड़ों पर नजर डालें तो देश के आम आदमी के किचन तक ऊर्जा पहुँचाने का यह तरीका आने वाले दिनों में बहुत कुछ बदलने वाला है।

LPG to PNG: आयात पर निर्भरता घटाने की बड़ी रणनीति

सरकार के इस कदम के पीछे सबसे बड़ा कारण देश की विदेशी मुद्रा और आयात पर निर्भरता को कम करना है। जानकारी के मुताबिक, भारत अपनी जरूरत का करीब साठ प्रतिशत एलपीजी यानी लिक्विड पेट्रोलियम गैस विदेशों से मंगाता है। आंकड़ों के अनुसार, सिर्फ एक साल में देश ने भारी मात्रा में एलपीजी का आयात किया था जिस पर अरबों डॉलर की विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ी थी। जब देश का एक बड़ा हिस्सा ऊर्जा जरूरतों के लिए बाहर के देशों पर निर्भर रहता है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों के उतार-चढ़ाव का सीधा असर आम जनता की जेब पर पड़ता है।
यही कारण है कि सरकार अब घरेलू मोर्चे पर गैस वितरण नेटवर्क को मजबूत करने में जुटी है। पाइप वाली गैस के आने से न सिर्फ देश का खजाना बचेगा बल्कि ऊर्जा आपूर्ति भी ज्यादा सुचारू और सुरक्षित हो जाएगी। जानकारों का मानना है कि एलपीजी सिलेंडरों की ढुलाई और उनकी रीफिलिंग पर होने वाला भारी भरकम खर्च भी इससे काफी हद तक कम किया जा सकेगा।

कंपनियों को बढ़ावा और नए नियम

सरकार ने गैस वितरण करने वाली कंपनियों के लिए एक बिल्कुल नई व्यवस्था लागू कर दी है, जिससे पूरे सिस्टम में एक तेज रफ्तार देखने को मिल रही है। नई व्यवस्था के तहत यदि कोई कंपनी किसी नए घर को पीएनजी से जोड़ती है और वहां गैस का इस्तेमाल शुरू करवाती है, तो उसे सरकार की तरफ से अतिरिक्त घरेलू गैस रियायती दरों पर दी जाएगी। इसका मकसद सिर्फ नए पाइप बिछाना नहीं है, बल्कि उन हजारों बंद पड़े कनेक्शनों को भी चालू करवाना है जो घरों के बाहर लगे तो हैं लेकिन लोग उनका इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं।
डेटा के मुताबिक, देश में एलपीजी उपभोक्ताओं की संख्या जहां करोड़ों में है, वहीं घरेलू पीएनजी कनेक्शन लेने वालों का आंकड़ा अभी इसके मुकाबले काफी कम है। इस बहुत बड़े अंतर को पाटने के लिए ही सरकार ने कंपनियों को ऐसा आर्थिक माहौल दिया है जिससे वे तेजी से काम कर सकें। पहले जहां कंपनियों को बुनियादी ढांचा तैयार करने और पाइपलाइन बिछाने में अपनी लागत निकालने में लंबा समय लग जाता था, वहीं अब नई प्रोत्साहन योजनाओं के चलते वे इस निवेश की भरपाई बहुत कम समय में कर लेंगी।

क्या रसोई से हमेशा के लिए गायब हो जाएगा सिलेंडर?

अक्सर लोगों के मन में यह बड़ा सवाल और एक तरह का डर बना रहता है कि क्या आने वाले दिनों में उनके घर का गैस सिलेंडर पूरी तरह बंद कर दिया जाएगा? तो इस बात को लेकर किसी भी तरह की अफवाहों में पड़ने की जरूरत बिल्कुल नहीं है। सरकार अभी पूरे देश से एलपीजी सिलेंडर हटाने की किसी योजना पर काम नहीं कर रही है। पीएनजी की सुविधा केवल उन्हीं शहरी और अर्द्ध-शहरी इलाकों में मिल सकती है जहां इसके लिए जरूरी पाइपलाइन का मजबूत नेटवर्क बिछाया जा चुका है।
दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों और पर्वतीय क्षेत्रों में जहां पाइपलाइन पहुंचाना तकनीकी रूप से बेहद मुश्किल या असंभव है, वहां एलपीजी सिलेंडर ही खाना बनाने का मुख्य जरिया बना रहेगा। यानी फिलहाल सरकार का मकसद एलपीजी को अचानक खत्म करना बिल्कुल नहीं है, बल्कि उन इलाकों में लोगों को पाइप्ड गैस की तरफ ले जाना है जहां यह सुविधा आसानी से उपलब्ध कराई जा सकती है।

LPG to PNG: आम उपभोक्ता की जेब पर क्या होगा असर?

देखने पर लगता है कि आधुनिकता की इस दौड़ में आम आदमी को भी कई तरह की सहूलियतें मिलने वाली हैं। पीएनजी के इस्तेमाल से न तो भारी-भरकम सिलेंडर घर में ढोना पड़ता है और न ही गैस खत्म होने की टेंशन रहती है कि अचानक बीच खाने में चूल्हा बुझ जाएगा। यह मीटर के हिसाब से चलने वाली व्यवस्था है, यानी जितना इस्तेमाल करेंगे उतना ही भुगतान करना होगा। हालांकि, पाइपलाइन के शुरुआती कनेक्शन और मेंटेनेंस को लेकर लोगों के मन में कई तरह के सवाल जरूर रहते हैं, लेकिन लंबी अवधि में यह वित्तीय और सुरक्षा दोनों दृष्टियों से काफी किफायती साबित होता है।
ऊर्जा के मोर्चे पर देश आत्मनिर्भरता की ओर जितनी तेजी से कदम बढ़ा रहा है, उतनी ही हमारी जीवनशैली भी बदल रही है। आने वाले समय में रसोई गैस का यह नया विकल्प देश के हर उस कोने तक पहुँचने की तैयारी में है जहाँ इसकी गुंजाइश है। बदलाव की यह बयार कितनी असरदार साबित होती है, यह तो आने वाला वक्त ही तय करेगा। मामले की आगे की आधिकारिक और नीतिगत अपडेट्स अभी आनी बाकी हैं, जिन पर हर किसी की निगाहें टिकी हुई हैं।

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