Parliament Monsoon Session: सत्रावसान नहीं होने से परिसीमन विधेयक पर विशेष सत्र की संभावना तेज, सरकार जुटा रही राजनीतिक समर्थन
सत्रावसान नहीं होने से सरकार के पास परिसीमन विधेयक पर संसद बुलाने का विकल्प खुला
Parliament Monsoon Session: संसद का मानसून सत्र तकनीकी रूप से अभी समाप्त नहीं हुआ है। यद्यपि संसद के दोनों सदनों—लोकसभा और राज्यसभा—को 13 अगस्त को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित (Adjourned Sine Die) कर दिया गया था, परंतु अब तक राष्ट्रपति द्वारा दोनों सदनों का औपचारिक सत्रावसान (Prorogation) नहीं किया गया है। संवैधानिक नियमों के तहत सत्रावसान न होने की स्थिति में केंद्र सरकार के पास परिसीमन विधेयक (Delimitation Bill) पर संसद की बैठकें दोबारा बुलाने अथवा विशेष सत्र आहूत करने का विकल्प पूरी तरह खुला हुआ है। राजनीतिक गलियारों में इस बात को लेकर हलचल तेज हो गई है कि यदि परिसीमन पर दलों के बीच आवश्यक सहमति और राजनीतिक समर्थन बन जाता है, तो सरकार किसी भी समय संसद के दोनों सदनों की बैठकें फिर से बुला सकती है।
संसदीय परंपराओं में सदन के स्थगन और सत्रावसान के बीच एक बुनियादी और महत्वपूर्ण अंतर होता है। अनिश्चितकाल के लिए स्थगन का तात्पर्य केवल दैनिक बैठकों का रुकना होता है, जबकि सत्र औपचारिक रूप से जीवित रहता है। सत्रावसान की आधिकारिक अधिसूचना भारत के राष्ट्रपति द्वारा जारी की जाती है, जिसके बाद ही कोई सत्र आधिकारिक तौर पर समाप्त माना जाता है। जब तक राष्ट्रपति द्वारा सत्रावसान का आदेश जारी नहीं होता, तब तक पीठासीन अधिकारी—लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति—सरकार के परामर्श पर किसी भी समय दोनों सदनों की बैठकें दोबारा बुलाने के लिए अधिकृत रहते हैं।
Parliament Monsoon Session: परिसीमन विधेयक पर विशेष सत्र की संभावना और राजनीतिक समीकरण
संसदीय सूत्रों के अनुसार, सरकार परिसीमन विधेयक को लेकर राजनीतिक दलों के साथ अनौपचारिक संवाद और विचार-विमर्श की प्रक्रिया में जुटी हुई है। यदि इस महत्वपूर्ण संवैधानिक संशोधन विधेयक के लिए दोनों सदनों में आवश्यक दो-तिहाई विशेष बहुमत (Special Majority) का समर्थन सुनिश्चित हो जाता है, तो सरकार मानसून सत्र के विस्तारित चरण के रूप में तत्काल विशेष बैठकें बुला सकती है। यदि यह आकलन बनता है कि आवश्यक आम सहमति अभी नहीं बन पा रही है, तो सरकार राष्ट्रपति को सत्रावसान की सिफारिश भेज सकती है।
परिसीमन विधेयक सीधे तौर पर संविधान संशोधन से जुड़ा हुआ मामला है। इसके लिए संसद के दोनों सदनों में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई समर्थन के साथ-साथ सदन की कुल सदस्य संख्या के बहुमत की आवश्यकता होती है। इससे पूर्व बजट सत्र के दौरान भी इस विधेयक को लेकर आम सहमति बनाने के प्रयास हुए थे। इसके बाद बदलते राजनीतिक परिदृश्यों और विभिन्न दलों के रुख में आए लचीलेपन के आधार पर सरकार संख्याबल जुटाने की निरंतर कोशिश कर रही है।
सत्रावसान की प्रक्रिया, नया सत्र और अध्यादेश संबंधी संवैधानिक नियम
संविधान के तहत जब तक संसद का सत्रावसान नहीं हो जाता, तब तक सरकार किसी भी विषय पर अध्यादेश (Ordinance) जारी नहीं कर सकती। अनुच्छेद 123 के अनुसार, अध्यादेश केवल तभी प्रख्यापित किया जा सकता है जब संसद के दोनों में से कम से कम एक सदन सत्र में न हो और सत्रावसान प्रभावी हो चुका हो। हालांकि, परिसीमन जैसे गंभीर मामले में संविधान संशोधन की आवश्यकता होने के कारण अध्यादेश का मार्ग वैसे भी उपयुक्त नहीं माना जाता, क्योंकि संविधान में संशोधन केवल संसद द्वारा पारित विधेयक के जरिए ही संभव है।
यदि सरकार वर्तमान मानसून सत्र का सत्रावसान करने का निर्णय लेती है, तो आगामी शीतकालीन सत्र के आयोजन के लिए नई संवैधानिक प्रक्रिया अपनानी होगी। इसके लिए कैबिनेट की संसदीय मामलों की समिति (CCPA) की बैठक में नए सत्र की तिथियां तय की जाती हैं और राष्ट्रपति को सिफारिश भेजी जाती है, जिसके बाद सदस्यों को न्यूनतम 15 दिन पूर्व औपचारिक सूचना देकर नया सत्र आहूत किया जाता है। वर्तमान स्थिति में सत्रावसान न होने के कारण सरकार बिना लंबी औपचारिक प्रक्रिया के त्वरित गति से बैठकें शुरू करा सकती है।
परिसीमन विधेयक का स्वरूप और प्रमुख राजनीतिक चिंताएं
परिसीमन विधेयक देश में लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं के निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्निर्धारण से जुड़ा हुआ है। इसके साथ ही संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करने की प्रक्रिया की समय-सीमा भी परिसीमन की कार्यवाही से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ी हुई है। प्रस्तावित सुधारों में जनसंख्या के नवीनतम आंकड़ों के आधार पर सीटों के आवंटन और प्रतिनिधित्व को संतुलित करने का विचार शामिल रहा है।
हालांकि, दक्षिणी राज्यों और कुछ क्षेत्रीय दलों ने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों के प्रतिनिधित्व में संभावित कमी को लेकर अपनी चिंताएं व्यक्त की थीं। इन चिंताओं के समाधान के लिए सभी राज्यों में सीटों में समान आनुपातिक वृद्धि या विशेष सुरक्षात्मक प्रावधानों जैसे विभिन्न मॉडलों पर चर्चा चल रही है। सरकार का प्रयास है कि सभी प्रमुख पक्षों को विश्वास में लेकर इस ऐतिहासिक सुधार को आगे बढ़ाया जाए।
Parliament Monsoon Session: विशेष सत्र के समक्ष अवसर और भावी राजनीतिक परिदृश्य
वर्तमान में सत्रावसान को रोके रखना सरकार की विधायी और राजनीतिक रणनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है। यदि समर्थन के आंकड़े पक्ष में बैठते हैं, तो विशेष सत्र के जरिए विधेयक को संसद के पटल पर रखकर पारित कराने का मार्ग प्रशस्त हो सकता है। वहीं, यदि राजनीतिक सहमति में अधिक समय लगता है, तो सत्रावसान के बाद इस विषय को शीतकालीन सत्र के मुख्य एजेंडे में शामिल किया जा सकता है।
आने वाले दिनों में संसदीय मामलों के मंत्रालय और प्रमुख राजनीतिक दलों के बीच होने वाले विचार-विमर्श से यह पूरी तरह स्पष्ट हो जाएगा कि संसद के मानसून सत्र की बैठकें दोबारा शुरू होंगी या फिर औपचारिक सत्रावसान की अधिसूचना जारी कर दी जाएगी।
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