ऊर्जा आत्मनिर्भरता की ओर भारत का ऐतिहासिक कदम: केंद्रीय कैबिनेट ने 84,084 करोड़ रुपये की ‘समुद्र मंथन’ योजना को दी मंजूरी, तेल-गैस आयात बिल में होगी भारी बचत
84,084 करोड़ की योजना से तेल-गैस खोज तेज होगी, आयात बिल घटेगा और ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी।
India energy self-reliance: भारत की ऊर्जा सुरक्षा को अभूतपूर्व मजबूती देने और कच्चे तेल के भारी-भरकम आयात बिल को कम करने की दिशा में केंद्र सरकार ने एक युगांतरकारी निर्णय लिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में आयोजित केंद्रीय कैबिनेट की बैठक में राष्ट्रीय अपतटीय अन्वेषण योजना ‘समुद्र मंथन’ को औपचारिक मंजूरी दे दी गई है। वर्ष 2030-31 तक के लिए स्वीकृत इस महत्वाकांक्षी योजना पर कुल 84,084 करोड़ रुपये का निवेश किया जाएगा। पौराणिक समुद्र मंथन की अवधारणा से प्रेरित इस योजना का मुख्य ध्येय भारत के एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक जोन (EEZ) और गहरे समुद्री क्षेत्रों में छिपे कच्चे तेल तथा प्राकृतिक गैस के विशाल भंडारों की खोज करना, बुनियादी ढांचा विकसित करना और घरेलू उत्पादन को गति देना है। सरकार का आकलन है कि इस योजना की सफलता से भारत को प्रतिवर्ष लगभग 1 लाख करोड़ रुपये के आयात बिल की सीधी बचत होगी।
वैश्विक ऊर्जा संकट और ‘समुद्र मंथन’ की रणनीतिक आवश्यकता
भारत वर्तमान में दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल उपभोक्ता देश है, जो अपनी कुल आवश्यकता का लगभग 85 प्रतिशत हिस्सा विदेशों से आयात करता है। भारत हर साल लगभग 144 अरब डॉलर यानी करीब 13 लाख करोड़ रुपये कच्चे तेल के आयात पर खर्च करता है। हाल के वर्षों में वैश्विक भू-राजनीतिक तनावों, आपूर्ति श्रृंखला के व्यवधानों और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आए उतार-चढ़ाव ने यह साबित कर दिया है कि किसी भी उभरती हुई महाशक्ति के लिए ऊर्जा सुरक्षा सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए।
‘समुद्र मंथन’ योजना केवल समुद्री सर्वेक्षण तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि यह डेटा संग्रह, गहरे समुद्र में खोजी कुओं की ड्रिलिंग, साझा ऑफशोर इंफ्रास्ट्रक्चर हब के निर्माण और घरेलू विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने तक पूरी वैल्यू चेन को कवर करेगी। केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने इस निर्णय की जानकारी देते हुए इसे भारतीय ऊर्जा क्षेत्र का अब तक का सबसे बड़ा गेम-चेंजर कदम करार दिया है।
चार प्रमुख स्तंभों में विभाजित 84,084 करोड़ रुपये का निवेश खाका
समुद्र मंथन योजना को अत्यधिक पारदर्शी और परिणाम-उन्मुख बनाने के लिए चार प्रमुख चरणों या हिस्सों में विभाजित किया गया है। योजना के पहले चरण के तहत 28,534 करोड़ रुपये की लागत से उन्नत 2D और 3D सीस्मिक सर्वे तकनीक का उपयोग करके समुद्र की तलहटी का सटीक सीस्मिक डेटा जुटाया जाएगा, ताकि संभावित तेल व गैस बेसिन की सटीक मैपिंग की जा सके।
दूसरे चरण के अंतर्गत गहरे और अति-गहरे समुद्र में 60 खोजी कुएं (Deepwater Exploration Wells) खोदे जाएंगे, जिसके लिए 43,200 करोड़ रुपये का बजटीय प्रावधान रखा गया है। गहरे समुद्र में ड्रिलिंग के उच्च जोखिम को कम करने के लिए सरकार पात्र कंपनियों को कुल ड्रिलिंग लागत का 50 प्रतिशत या अधिकतम 675 करोड़ रुपये प्रति कुएं की वित्तीय सहायता प्रदान करेगी।
तीसरे चरण में 10,000 करोड़ रुपये के निवेश से कॉमन ऑफशोर इंफ्रास्ट्रक्चर हब विकसित किए जाएंगे, जहां विभिन्न अन्वेषण कंपनियों को रिग, जेट्टी, बंकरिंग और ड्रिलिंग से जुड़ी साझा सुविधाएं उपलब्ध होंगी। अंतिम व चौथे चरण में 2,000 करोड़ रुपये की लागत से ऑयल एंड गैस मैन्युफैक्चरिंग एंड सर्विसेज जोन स्थापित किए जाएंगे, जिनका मुख्य उद्देश्य ‘मेक इन इंडिया’ के तहत गहरे समुद्र में इस्तेमाल होने वाले आधुनिक उपकरणों का निर्माण भारत में ही करना होगा।
उत्पादन क्षमता में उछाल और अर्थव्यवस्था को मिलने वाले लाभ
केंद्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय के अनुमान के मुताबिक, समुद्र मंथन योजना के माध्यम से देश के अन्वेषण बेसिन में 600 मिलियन मीट्रिक टन ऑयल इक्विवेलेंट (MMTOE) से अधिक नए हाइड्रोकार्बन संसाधन जुड़ने की संभावना है। इसके सफल क्रियान्वयन से भारत का वर्तमान घरेलू तेल और गैस उत्पादन 62 MMTOE प्रतिवर्ष से बढ़कर 80 MMTOE प्रतिवर्ष के स्तर तक पहुंच सकता है।
उत्पादन में इस बढ़ोतरी से भारत के व्यापार घाटे में उल्लेखनीय कमी आएगी और विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव कम होगा। 1 लाख करोड़ रुपये प्रतिवर्ष की संभावित बचत से देश में अन्य बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को गति मिलेगी और भारतीय रुपया मजबूत होगा। इसके अतिरिक्त, ड्रिलिंग, विनिर्माण, लॉजिस्टिक्स और शिपिंग जैसे क्षेत्रों में हजारों उच्च-कुशल और तकनीकी रोजगार के अवसर पैदा होंगे।
India energy self-reliance: 2014 के बाद के नीतिगत सुधारों का तार्किक विस्तार
समुद्र मंथन योजना पिछले एक दशक में तेल और गैस क्षेत्र में किए गए व्यापक विनियामक सुधारों का ही अगला चरण है। वर्ष 2014 के बाद सरकार ने उन 99 प्रतिशत से अधिक समुद्री क्षेत्रों से ‘नो-गो’ प्रतिबंध हटा दिए थे, जो पहले रक्षा या अन्य कारणों से अन्वेषण के लिए बंद थे। इसके परिणामस्वरूप भारत के एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक जोन का 10 लाख वर्ग किलोमीटर से अधिक का नया क्षेत्र खोज के लिए खुला है।
इसके साथ ही, पुराने प्रोडक्शन शेयरिंग कॉन्ट्रैक्ट्स (PSC) को रेवेन्यू शेयरिंग कॉन्ट्रैक्ट्स (RSC) में बदला गया, जिससे निवेशकों को अधिक पारदर्शिता मिली। ऑयलफील्ड्स रेगुलेशन एंड डेवलपमेंट संशोधन अधिनियम 2025 और नए पेट्रोलियम नियमों ने ओएनजीसी (ONGC) और ऑयल इंडिया (Oil India) जैसी सार्वजनिक उपक्रमों के प्रदर्शन में क्रांतिकारी सुधार किया है। समुद्र मंथन इन सभी सुधारों को एक एकीकृत मिशन मोड में धरातल पर उतारेगी।
निष्कर्ष
समुद्र मंथन योजना भारत को ऊर्जा आयातक (India energy self-reliance) से ऊर्जा आत्मनिर्भर राष्ट्र बनाने की दिशा में एक ऐतिहासिक और रणनीतिक मील का पत्थर है। 84,084 करोड़ रुपये के इस विशाल सरकारी समर्थन से निजी और वैश्विक तेल कंपनियों का भारतीय समुद्री क्षेत्रों में निवेश और विश्वास बढ़ेगा। गहरे समुद्र की चुनौतीपूर्ण गहराई से भारत के अपने ऊर्जा खजाने को बाहर निकालना न केवल देश के आर्थिक विकास को नई गति देगा, बल्कि ‘आत्मनिर्भर भारत’ के संकल्प को वैश्विक मंच पर एक नई पहचान भी दिलाएगा।
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