India Growth Model: 7.8% GDP ग्रोथ के बीच भारत के विकास मॉडल पर तीखी बहस; RSS के विश्व विभाग से लेकर कॉरपोरेट एकाधिकार और ‘विश्वगुरु’ की छवि पर उठे बड़े सवाल

रोजगार, कॉरपोरेट एकाग्रता और असमानता को लेकर तेज विकास दर के बीच उठे गंभीर सवाल

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India Growth Model: वैश्विक अनिश्चितताओं, भू-राजनीतिक तनाव और आपूर्ति श्रृंखला के व्यवधानों के बीच भारत की अर्थव्यवस्था ने चालू वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में 7.8 प्रतिशत की वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर दर्ज कर दुनिया भर के अर्थशास्त्रियों को चौंका दिया है। आधिकारिक स्तर पर केंद्र सरकार इसे ‘विकसित भारत 2047’ के संकल्प की दिशा में एक ऐतिहासिक छलांग और देश के मजबूत आर्थिक बुनियादी ढांचे का प्रत्यक्ष प्रमाण बता रही है। किंतु इस तीव्र आर्थिक विकास के समानांतर, देश के भीतर और अंतरराष्ट्रीय बौद्धिक मंचों पर भारत के समग्र विकास मॉडल (Development Model) की संरचनात्मक खामियों, रोजगार सृजन की धीमी गति, कॉरपोरेट एकाधिकार और लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता को लेकर एक गंभीर और बहुआयामी बहस छिड़ गई है।
‘द वायर’ (The Wire) और अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी रॉयटर्स की हालिया समीक्षात्मक विश्लेषणों ने भारत की तेज आर्थिक विकास दर के विरोधाभासों को केंद्र में ला खड़ा किया है। जहां एक ओर सरकार इंफ्रास्ट्रक्चर में खरबों रुपये के सार्वजनिक पूंजीगत व्यय (कैपेक्स), डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर और मैन्युफैक्चरिंग क्रांति को अपनी प्रमुख सफलता के रूप में प्रस्तुत कर रही है, वहीं आलोचक और विपक्षी दल यह मूलभूत प्रश्न उठा रहे हैं कि यदि विकास दर इतनी तीव्र है, तो वह आम नागरिकों की क्रय शक्ति, संगठित क्षेत्र में गुणवत्तापूर्ण रोजगार और आय असमानता की खाई को पाटने में क्यों विफल साबित हो रही है। इस विमर्श में केवल आंकड़े ही शामिल नहीं हैं, बल्कि इसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के वैचारिक प्रभाव, अडानी समूह जैसे विशाल कॉरपोरेट घरानों के अभूतपूर्व विस्तार और वैश्विक मंच पर ‘विश्वगुरु’ के रूप में गढ़ी जा रही छवि की जमीनी हकीकत भी सवालों के घेरे में है।

India Growth Model: क्या भारत ‘जॉबलेस ग्रोथ’ के जाल में है?

राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) द्वारा जारी ताजा आंकड़ों के अनुसार, भारत ने लगातार 12वीं तिमाही में दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था का दर्जा बरकरार रखा है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इस प्रदर्शन को व्यापक आधार वाला और आर्थिक सुधारों का स्वाभाविक परिणाम बताया है। यद्यपि यह संख्या वैश्विक वित्तीय संस्थानों और रेटिंग एजेंसियों को आकर्षित करती है, किंतु घरेलू स्तर पर अर्थशास्त्रियों का एक बड़ा वर्ग इसे ‘के-शेप्ड’ (K-shaped) अथवा रोजगार-विहीन विकास (Jobless Growth) की संज्ञा दे रहा है।
समस्या की जड़ यह है कि जीडीपी का बड़ा हिस्सा पूंजी-सघन (Capital-Intensive) क्षेत्रों जैसे भारी विनिर्माण, खनन, डिजिटल सेवाओं और वित्तीय परिसंपत्तियों से आ रहा है, जहां भारी मशीनरी और सॉफ्टवेयर ऑटोमेशन के चलते मानव श्रम की आवश्यकता सीमित होती है। इसके विपरीत, भारत का विशाल असंगठित क्षेत्र, कृषि, वस्त्र उद्योग, एमएसएमई (MSME) और निर्माण जैसे श्रम-प्रधान (Labor-Intensive) क्षेत्र—जो देश की 80 प्रतिशत से अधिक कार्यशील आबादी को आजीविका प्रदान करते हैं—अपेक्षित गति से नहीं बढ़ पा रहे हैं। उच्च शिक्षा प्राप्त लाखों युवाओं का गिग इकॉनमी (डिलीवरी ब्वॉय अथवा कैब ड्राइवर) में काम करने पर मजबूर होना या कृषि क्षेत्र में छिपी हुई बेरोजगारी (Disguised Unemployment) का निरंतर बढ़ना इस विकास मॉडल की सबसे कमजोर कड़ी बनकर उभरा है।

नीतिगत फैसलों का ऐतिहासिक प्रभाव: नोटबंदी और जीएसटी की लंबी छाया

भारत के विकास मॉडल की समीक्षा में वर्ष 2016 की नोटबंदी और 2017 में लागू की गई वस्तु एवं सेवा कर (GST) प्रणाली के प्रभावों का विश्लेषण आज भी अपरिहार्य माना जाता है। विश्लेषकों का तर्क है कि इन दो ऐतिहासिक नीतिगत कदमों का प्राथमिक उद्देश्य अर्थव्यवस्था का औपचारिकीकरण (Formalization) करना था, किंतु इसका सबसे गहरा और विनाशकारी आघात देश के छोटे उद्यमियों, कुटीर उद्योगों और ग्रामीण बाजारों पर पड़ा।
यद्यपि जीएसटी संग्रह अब नियमित रूप से रिकॉर्ड स्तर को छू रहा है और सरकार इसे कर सुधारों की सफलता बताती है, किंतु छोटे व्यापारियों का आरोप है कि जटिल अनुपालन आवश्यकताओं (Compliance Burden) के कारण वे बड़े कॉरपोरेट दिग्गजों के सामने टिक नहीं पा रहे हैं। इस नीतिगत बदलाव ने बाजार की संपत्ति और कारोबार का एक बड़ा हिस्सा छोटे असंगठित उत्पादकों से छीनकर बड़े संगठित कॉरपोरेट घरानों की झोली में डाल दिया, जिससे जीडीपी में तो उछाल दिखा, किंतु लाखों स्थानीय आजीविकाएं हमेशा के लिए समाप्त हो गईं।

अडानी मॉडल और कॉरपोरेट एकाग्रता: इंफ्रास्ट्रक्चर का इंजन या क्रोनी कैपिटलिज्म?

भारत के वर्तमान आर्थिक मॉडल की सबसे मुखर आलोचना देश के रणनीतिक बुनियादी ढांचे में कुछ चुनिंदा कॉरपोरेट समूहों, विशेष रूप से गौतम अडानी के नेतृत्व वाले अडानी समूह के अभूतपूर्व एकाधिकार को लेकर की जा रही है। पिछले एक दशक में अडानी समूह ने देश के प्रमुख बंदरगाहों (सी-पोर्ट्स), अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों, थर्मल और सौर ऊर्जा उत्पादन, बिजली पारेषण (ट्रांसमिशन), सीमेंट निर्माण और राष्ट्रीय राजमार्गों के निर्माण में अपना व्यापक आधिपत्य स्थापित कर लिया है।
आलोचकों और विपक्षी दलों का आक्षेप है कि सरकार राष्ट्रीय प्राथमिकताओं को पूरा करने के नाम पर रणनीतिक संपत्तियों का नियंत्रण एक ही औद्योगिक समूह के हाथों में केंद्रित कर रही है, जिसे वे ‘क्रोनी कैपिटलिज्म’ का चरम स्वरूप मानते हैं। उनका तर्क है कि एक ही समूह पर अत्यधिक निर्भरता वित्तीय प्रणाली और बैंकिंग क्षेत्र के लिए भी प्रणालीगत जोखिम (Systemic Risk) उत्पन्न कर सकती है। इसके विपरीत, सरकार और अडानी समूह के समर्थक यह दलील देते हैं कि भारत जैसे विशाल देश में विश्वस्तरीय बुनियादी ढांचे के त्वरित निर्माण के लिए ऐसे बड़े औद्योगिक समूहों की आवश्यकता है, जिनके पास वैश्विक पूंजी जुटाने और समयबद्ध तरीके से मेगा-प्रोजेक्ट्स को क्रियान्वित करने का पैमाना और विशेषज्ञता हो।

आरएसएस का ‘विश्व विभाग’ और वैश्विक छवि प्रबंधन की रणनीति

‘द वायर’ की समीक्षा में एक अन्य संवेदनशील पहलू पर प्रकाश डाला गया है, जिसका संबंध राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के ‘विश्व विभाग’ और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के नैरेटिव निर्माण से है। आरएसएस का विश्व विभाग विदेशों में बसे प्रवासी भारतीयों (डायस्पोरा) के बीच सांस्कृतिक और वैचारिक संपर्क साधने का कार्य करता है। पिछले वर्षों में इस विंग ने पश्चिमी देशों, खाड़ी राष्ट्रों और दक्षिण-पूर्व एशिया में भारतीय प्रवासियों को संगठित करने और मोदी सरकार की नीतियों व उपलब्धियों का अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
विश्लेषण में यह रेखांकित किया गया है कि सरकार और उसके वैचारिक सहयोगी भारत को एक उभरती महाशक्ति और ‘विश्वगुरु’ के रूप में पेश करने के लिए विशाल विदेशी रैलियों और प्रवासी सम्मेलनों का उपयोग करते हैं। किंतु इस प्रचार तंत्र के समानांतर, वैश्विक थिंक टैंक्स, विदेशी मीडिया और मानवाधिकार संगठनों की रिपोर्टों में भारत की लोकतांत्रिक संस्थाओं—जैसे न्यायपालिका की स्वतंत्रता, निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता, स्वतंत्र मीडिया पर दबाव और अल्पसंख्यकों के नागरिक अधिकारों—को लेकर निरंतर चिंताएं व्यक्त की जा रही हैं। यह विरोधाभास अंतरराष्ट्रीय निवेशकों के मन में नीतिगत स्थिरता और विधि के शासन को लेकर संशय उत्पन्न करता है।

निजी पूंजीगत व्यय में सुधार के संकेत: क्या लौटेगा निवेशकों का भरोसा?

सरकार की आर्थिक नीतियों के पक्ष में सबसे मजबूत तर्क यह दिया जा रहा है कि देश अब केवल सरकारी खर्च के सहारे आगे नहीं बढ़ रहा है, बल्कि निजी क्षेत्र के निवेश (Private Capex) में भी उल्लेखनीय पुनरुद्धार देखा जा रहा है। रॉयटर्स के आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल-जून 2026 की तिमाही में निजी क्षेत्र के पूंजीगत व्यय में सालाना आधार पर 11.9 प्रतिशत की उत्साहजनक वृद्धि दर्ज की गई है, और सकल स्थिर पूंजी निर्माण (GFCF) में भी सुधार आया है।
भारतीय बैंकिंग क्षेत्र का गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (NPA) अनुपात पिछले कई दशकों के न्यूनतम स्तर पर है और कॉरपोरेट बैलेंस शीट अत्यंत स्वस्थ स्थिति में हैं। सरकार का दावा है कि भारी सार्वजनिक इंफ्रास्ट्रक्चर खर्च ने निजी निवेश को बाहर निकालने (Crowd In) का अपना उद्देश्य प्राप्त कर लिया है। इस्पात, सीमेंट, ऑटोमोबाइल और नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्रों में नई विनिर्माण इकाइयां स्थापित हो रही हैं। यदि निजी पूंजीगत व्यय की यह गति मध्यम अवधि में बनी रहती है, तो इससे उत्पादन क्षमता में वृद्धि होगी और आगामी वर्षों में रोजगार सृजन का दायरा भी स्वतः विस्तृत हो सकता है।

India Growth Model: ‘विश्वगुरु’ का सपना और समावेशी विकास की अंतिम परीक्षा

समग्र रूप से देखा जाए तो भारत का आर्थिक विकास मॉडल न तो पूरी तरह विफल है और न ही पूरी तरह दोषमुक्त। एक ओर जहां 7.8 प्रतिशत की विकास दर भारत को वैश्विक पटल पर एक अनिवार्य आर्थिक केंद्र बनाती है और डिजिटल क्रांति ने आम आदमी के जीवन को सुगम किया है, वहीं दूसरी ओर धन का संकेंद्रण, ग्रामीण खपत में सुस्ती और संगठित रोजगार का अभाव इस मॉडल की नैतिक और संरचनात्मक वैधता पर प्रश्नचिह्न लगा रहे हैं।
विदेशी पूंजी और संस्थागत निवेशक केवल चमकदार जीडीपी आंकड़ों के आधार पर किसी देश को दीर्घकालिक निवेश गंतव्य नहीं मानते; वे सामाजिक सौहार्द, संस्थागत पारदर्शिता और मजबूत घरेलू उपभोक्ता बाजार की निरंतरता की भी परख करते हैं। यदि भारत को वास्तव में 2047 तक एक विकसित और सम्मानित वैश्विक महाशक्ति बनना है, तो नीति निर्माताओं को केवल शीर्ष कॉरपोरेट्स के लाभ और इंफ्रास्ट्रक्चर के कंक्रीट पर ध्यान केंद्रित करने के स्थान पर मानव पूंजी—यानी गुणवत्तापूर्ण प्राथमिक शिक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य, कौशल विकास और श्रम-प्रधान उद्योगों—में व्यापक सार्वजनिक निवेश सुनिश्चित करना होगा। अंततः किसी भी राष्ट्र की वास्तविक महानता इस बात से नहीं आंकी जाती कि उसके अरबपतियों की संपत्ति कितनी तेजी से बढ़ी, बल्कि इस बात से तय होती है कि उसके सबसे कमजोर नागरिक के जीवन स्तर में कितना ठोस और टिकाऊ सुधार आया।

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