UP Politics: निषाद आरक्षण पर फिर गरमाई सियासत, BJP के सामने नई चुनौती
2027 चुनाव से पहले आरक्षण की मांग ने बढ़ाई हलचल, मुकेश सहनी की सक्रियता भी बनी चुनौती
UP Politics: उत्तर प्रदेश में वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव की रणनीतिक तैयारियां अभी से गति पकड़ने लगी हैं। इसी क्रम में राज्य के सबसे निर्णायक सामाजिक और चुनावी समीकरणों में से एक—निषाद एवं उससे जुड़ी उपजातियों को अनुसूचित जाति (SC) श्रेणी में शामिल करने की पुरानी मांग—एक बार फिर राज्य की राजनीति के केंद्र में आ गई है। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के प्रमुख घटक दल और निषाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष तथा उत्तर प्रदेश सरकार में मत्स्य पालन कैबिनेट मंत्री डॉ. संजय निषाद ने आरक्षण के मसले पर अपनी ही सहयोगी भारतीय जनता पार्टी पर खुला राजनीतिक दबाव बनाना शुरू कर दिया है।
हाल ही में पार्टी के स्थापना दिवस समारोह के मंच से डॉ. संजय निषाद ने स्पष्ट शब्दों में चेतावनी दी कि यदि समुदाय को अनुसूचित जाति का दर्जा देने के वादे पर शीघ्र ठोस संवैधानिक कदम नहीं उठाए गए, तो आगामी 2027 के विधानसभा चुनाव में सत्तारूढ़ दल को इसका भारी राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ सकता है। वहीं दूसरी ओर, बिहार से उत्तर प्रदेश की सीमा में पैठ बना रहे विकासशील इंसान पार्टी (VIP) के प्रमुख मुकेश सहनी भी ‘आरक्षण नहीं तो वोट नहीं’ के नारे के साथ पूर्वांचल में जनसंपर्क यात्राएं कर रहे हैं। इन परिस्थितियों ने 2027 से पहले निषाद वोट बैंक को लेकर एनडीए, समाजवादी पार्टी और अन्य क्षेत्रीय शक्तियों के बीच एक नए घमासान की नींव रख दी है।
UP Politics: दो दशक पुरानी मांग और पूर्वांचल के चुनावी गणित में निषाद समुदाय का रसूख
उत्तर प्रदेश में निषाद, मल्लाह, कश्यप, बिंद, केवट, धीवर और मझवार जैसी नदी-किनारे बसी जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल कराने की मांग लगभग दो दशकों से आंदोलनों और आश्वासनों का हिस्सा रही है। वर्तमान व्यवस्था के तहत इनमें से अधिकांश उपजातियां अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की सूची में दर्ज हैं। समुदाय का तर्क है कि आजादी से पूर्व और गजेटियरों में उनकी गिनती मझवार और पासी जैसी मूल जातियों के समान थी, किंतु प्रशासनिक विसंगतियों के कारण उन्हें ओबीसी वर्ग में डाल दिया गया, जहां उन्हें बड़ी जातियों के मुकाबले सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षण संस्थानों में अपेक्षित प्रतिनिधित्व नहीं मिल पा रहा है।
राजनीतिक दृष्टिकोण से उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल और मध्य यूपी के लगभग 120 से अधिक विधानसभा क्षेत्रों और डेढ़ दर्जन से अधिक लोकसभा सीटों पर निषाद समुदाय की आबादी 8 से 15 प्रतिशत के बीच है। गोरखपुर, संतकबीरनगर, प्रयागराज, जौनपुर, गाजीपुर, बलिया, वाराणसी, सुल्तानपुर, भदोही और मिर्जापुर जैसे जिलों में यह समुदाय किसी भी प्रत्याशी की जीत अथवा हार तय करने का सीधा सामर्थ्य रखता है। यही कारण है कि चुनावी साल करीब आते ही यह मांग केवल सामाजिक अधिकारों का विषय न रहकर सीधे तौर पर सत्ता की चाबी बन जाती है।
स्थापना दिवस मंच से डॉ. संजय निषाद की खुली चेतावनी
16 अगस्त को आयोजित निषाद पार्टी के राज्यस्तरीय स्थापना दिवस सम्मेलन में यह आक्रोश खुलकर सामने आया। कार्यकर्ताओं की भारी भीड़ के बीच डॉ. संजय निषाद ने मंच पर उपस्थित उत्तर प्रदेश सरकार के परिवहन मंत्री दयाशंकर सिंह को संबोधित करते हुए दो टूक कहा कि वे मुख्यमंत्री और शीर्ष भाजपा नेतृत्व तक समुदाय की पीड़ा और धैर्य की सीमा का संदेश पहुंचाएं।
संजय निषाद ने सार्वजनिक रूप से कहा कि समाज अब केवल खोखले वादों से संतुष्ट होने वाला नहीं है। यदि समय रहते केंद्र और राज्य सरकार ने मझवार आरक्षण की तकनीकी अड़चनों को दूर कर अधिसूचना जारी नहीं की, तो 2027 के चुनाव में कार्यकर्ताओं के आक्रोश को संभालना उनके वश में नहीं होगा। जानकारों का मानना है कि संजय निषाद का यह रुख केवल अपने समुदाय में अपनी गिरती साख को बचाने का प्रयास नहीं है, बल्कि आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा से अधिक सीटों पर दावेदारी ठोकने के लिए बनाया गया सुनियोजित राजनीतिक दबाव (Bargaining Power) भी है।
दिसंबर 2021 की वह रैली और कुर्सियां टूटने का कड़वा इतिहास
भाजपा और निषाद पार्टी के आरक्षण संबंधों को समझने के लिए वर्ष 2021 के घटनाक्रम को याद करना आवश्यक है। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले, दिसंबर 2021 में लखनऊ के रमाबाई अंबेडकर मैदान में भाजपा और निषाद पार्टी की एक संयुक्त महारैली आयोजित की गई थी, जिसे केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने संबोधित किया था। लाखों की संख्या में पहुंचे निषाद समाज के युवाओं को यह दृढ़ विश्वास था कि गृह मंत्री मंच से सीधे एससी आरक्षण की ऐतिहासिक घोषणा करेंगे।
किंतु जब अमित शाह के भाषण में निषाद समुदाय की चिंताओं को दूर करने और पार्टी के एजेंडे को पूरा करने का सामान्य आश्वासन ही मिला और आरक्षण की कोई स्पष्ट समयसीमा तय नहीं हुई, तो मैदान में मौजूद भीड़ उग्र हो गई थी। रैली समाप्त होते ही नाराज कार्यकर्ताओं ने मैदान में जमकर नारेबाजी की और सैकड़ों कुर्सियां तोड़ डाली थीं। उस असंतोष को शांत करने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने तत्काल भारत के महारजिस्ट्रार एवं जनगणना आयुक्त (RGI) को पत्र लिखकर मझवार जाति के संबंध में स्पष्ट दिशा-निर्देश और मार्गदर्शन मांगा था, किंतु यह विधिक प्रक्रिया अब तक किसी अंतिम मुकाम पर नहीं पहुंच सकी है।
2022 की सफलता, कैबिनेट मंत्री का पद और फिर थमी रफ्तार
वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने निषाद पार्टी के साथ औपचारिक गठबंधन किया। इस चुनाव में गैर-यादव ओबीसी गोलबंदी के तहत निषाद पार्टी ने अपनी ताकत दिखाते हुए 6 सीटों पर जीत दर्ज की। परिणाम आने के बाद डॉ. संजय निषाद को योगी मंत्रिमंडल में कैबिनेट मंत्री बनाया गया और उन्हें मत्स्य विभाग का महत्वपूर्ण दायित्व सौंपा गया। उनके सुपुत्र प्रवीण निषाद पहले से ही संतकबीरनगर से सांसद थे।
सरकार में साझीदार बनने के बाद समुदाय को लगा था कि अब डबल इंजन सरकार उनकी आरक्षण की मांग पर त्वरित मुहर लगा देगी। किंतु चार वर्षों का लंबा समय बीत जाने के बाद भी जब कोई ठोस प्रशासनिक आदेश नहीं निकला, तो जमीनी स्तर पर युवाओं और समुदाय के प्रबुद्ध वर्ग ने संजय निषाद की राजनीतिक स्थिति पर सवाल उठाने शुरू कर दिए। विपक्षी दलों ने यह प्रचार तेज कर दिया कि निषाद पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने आरक्षण के मूल मुद्दे को भुलाकर केवल व्यक्तिगत और पारिवारिक सत्ता सुख हासिल कर लिया है। इसी जनदबाव ने अब संजय निषाद को आक्रामक रुख अख्तियार करने पर विवश किया है।
मुकेश सहनी की ‘VIP’ सक्रियता ने बढ़ाई एनडीए खेमे की धड़कनें
भाजपा और संजय निषाद दोनों के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बिहार के पूर्व मंत्री और विकासशील इंसान पार्टी (VIP) के प्रमुख मुकेश सहनी की उत्तर प्रदेश में बढ़ती सक्रियता है। ‘सन ऑफ मल्लाह’ के नाम से चर्चित मुकेश सहनी पूर्वांचल के जिलों में लगातार सभाएं और संकल्प यात्राएं कर रहे हैं। कुशीनगर और गोरखपुर में आयोजित विशाल रैलियों में सहनी ने गंगाजल हाथ में लेकर समुदाय के लोगों को शपथ दिलाई कि जो दल उन्हें आरक्षण देगा, वे उसी को अपना समर्थन देंगे।
मुकेश सहनी सीधे तौर पर संजय निषाद को भाजपा की ‘बी-टीम’ और समुदाय के हितों का सौदागर बताकर घेर रहे हैं। सहनी का यह आक्रामक अभियान निषाद वोट बैंक में बिखराव का खतरा पैदा कर रहा है। यदि सहनी का यह आंदोलन पूर्वांचल के निषाद बहुल क्षेत्रों में मजबूत होता है, तो इसका सीधा नुकसान भाजपा-निषाद पार्टी गठबंधन को होगा, क्योंकि यह बिखराव विपक्षी गठबंधन के पक्ष में मतदान को प्रेरित कर सकता है।
संवैधानिक पेच: क्या राज्य सरकार के हाथ में है समाधान?
निषाद आरक्षण की मांग पूरी होने में सबसे बड़ा रोड़ा संविधान की जटिल प्रक्रिया है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 341 के तहत किसी भी नई जाति को अनुसूचित जाति (SC) की सूची में जोड़ने, हटाने या संशोधित करने का अनन्य अधिकार केवल देश की संसद के पास सुरक्षित है। राज्य सरकार केवल अपनी सिफारिश और नृवंशविज्ञान (Ethnographic) अध्ययन रिपोर्ट केंद्र सरकार को भेज सकती है।
इसके बाद यह प्रस्ताव भारत के महारजिस्ट्रार (RGI) और राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (NCSC) के पास जांच के लिए जाता है। यदि दोनों संस्थाएं सहमति देती हैं, तभी केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी के बाद संसद में संविधान संशोधन विधेयक पेश किया जाता है। चूंकि केंद्र और राज्य दोनों जगह भाजपा की सरकार है, इसलिए निषाद समुदाय का मानना है कि राजनीतिक इच्छाशक्ति होने पर संसद में कानून बनाकर इस विसंगति को दूर किया जा सकता है। कानूनी जानकारों का यह भी मानना है कि यदि एससी दर्जे में तकनीकी बाधाएं हैं, तो सरकार को ओबीसी आरक्षण के भीतर रोहिणी आयोग की तर्ज पर उप-वर्गीकरण (Sub-categorization) कर अत्यंत पिछड़ी जातियों के लिए अलग कोटा निर्धारित करना चाहिए।
2027 की बिसात: समाजवादी पार्टी की ‘PDA’ रणनीति और वीरांगना फूलन देवी का प्रतीक
आगामी 2027 के चुनाव को देखते हुए अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी ने अपने ‘पीडीए’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फार्मूले के तहत निषाद समाज पर डोरे डालने की सुनियोजित रणनीति बनाई है। सपा ने फूलन देवी की बहन रुक्मिणी देवी को अपनी महिला विंग में उच्च पद देकर यह संदेश देने का प्रयास किया है कि समाज के असली स्वाभिमान की रक्षा केवल समाजवादी पार्टी ही कर सकती है।
सपा के पिछड़े वर्ग के नेता लगातार यह आरोप लगा रहे हैं कि भाजपा ने निषाद, बिंद और कश्यप समाज के वोटों का इस्तेमाल सत्ता पाने के लिए किया, लेकिन जब उन्हें उनका हक देने की बारी आई तो तकनीकी और कानूनी बहाने बनाए जा रहे हैं। यदि सपा इस धारणा को ग्रामीण अंचलों तक पहुंचाने में सफल रहती है, तो 2027 में पूर्वांचल की दर्जनों सीटों पर भाजपा के सामाजिक समीकरणों को कड़ा झटका लग सकता है।
UP Politics: आगामी महीनों में क्या होगी भाजपा की रणनीति?
उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 की जंग जीतने के लिए भाजपा किसी भी कीमत पर अपने गैर-यादव ओबीसी जनाधार में दरार नहीं आने देना चाहेगी। पार्टी हाईकमान भली-भांति जानता है कि संजय निषाद की नाराजगी और मुकेश सहनी का प्रभाव यदि एक साथ सक्रिय रहा, तो यह पूर्वांचल के किले को हिला सकता है।
अब सबकी निगाहें मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और केंद्रीय नेतृत्व के अगले कदम पर टिकी हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि चुनाव से पूर्व भाजपा सरकार निषाद समाज के कल्याण के लिए बड़े आर्थिक पैकेज, मत्स्य नीति में ऐतिहासिक रियायतों अथवा मझवार प्रमाण पत्र जारी करने की प्रक्रिया को सरल बनाने के लिए कोई अंतरिम प्रशासनिक शासनादेश जारी कर सकती है। आने वाले महीनों में निषाद आरक्षण का यह मुद्दा उत्तर प्रदेश के राजनीतिक मंचों पर सत्ता और विपक्ष के बीच सबसे बड़ा चुनावी दांव बनने जा रहा है।
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