Caste Census 2027: OBC लिस्ट को लेकर सरकार के विभागों में मतभेद! जातीय जनगणना से पहले बदली बैठक की नोटिंग

ORGI और सामाजिक न्याय मंत्रालय के बीच OBC सूची को लेकर नोटिंग बदलने तक पहुंचा मतभेद

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Caste Census 2027:  देश में आगामी वर्ष 2027 में प्रस्तावित ऐतिहासिक जनगणना को लेकर प्रशासनिक स्तर पर एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। आजादी के बाद पहली बार सामान्य जनगणना के साथ सभी जातियों के विस्तृत आंकड़े जुटाने की केंद्र सरकार की योजना के बीच, डेटा संग्रहण की विधिक और तकनीकी रूपरेखा को लेकर सरकारी विभागों के बीच आंतरिक मतभेद खुलकर सतह पर आ गए हैं। विवाद का मुख्य केंद्र यह सवाल है कि क्या जातीय गणना के दौरान नागरिकों की जाति दर्ज करने के लिए केंद्र और राज्यों के पास पहले से मौजूद आधिकारिक अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) और अनुसूचित जाति (SC) सूचियों का सहारा लिया जाए या फिर प्रगणकों को लोगों द्वारा बताई गई जाति का नाम बिना किसी पूर्व-निर्धारित सूची के खुले तौर पर (Open-Ended Format) दर्ज करने की छूट दी जाए।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, भारत के महापंजीयक एवं जनगणना आयुक्त कार्यालय (ORGI) और केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय (MoSJE) के बीच इस संवेदनशील विषय पर वैचारिक मतभेद उत्पन्न हुए। इसके उपरांत सामाजिक न्याय मंत्रालय की कड़ी आपत्ति के बाद उच्चस्तरीय अंतर-मंत्रालयी बैठक के आधिकारिक मिनट्स यानी आधिकारिक नोटिंग में बड़ा संशोधन करना पड़ा। यह पूरा विवाद ऐसे समय में प्रकाश में आया है जब आगामी जातीय जनगणना के तौर-तरीकों, उप-वर्गीकरण और आंकड़ों के मानकीकरण (Data Standardization) को लेकर देश में पहले से ही तीव्र राजनीतिक और विधिक बहस छिड़ी हुई है।

Caste Census 2027: 1 जून की अंतर-मंत्रालयी बैठक और नोटिंग पर उपजा विवाद

इस पूरे प्रशासनिक विवाद की जड़ें 1 जून को आयोजित एक अत्यंत महत्वपूर्ण उच्चस्तरीय बैठक से जुड़ी हैं। भारत के महापंजीयक एवं जनगणना आयुक्त मृत्युंजय कुमार नारायण की अध्यक्षता में संपन्न हुई इस बैठक में सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों ने भाग लिया था। बैठक का मुख्य एजेंडा यह तय करना था कि आगामी जनगणना में जाति आधारित आंकड़ों के संकलन के लिए मौजूदा सरकारी डेटाबेस और विधिक सूचियों का उपयोग किस सीमा तक किया जा सकता है।

सूत्रों के अनुसार, बैठक के दौरान सामाजिक न्याय मंत्रालय के प्रतिनिधियों ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (NCBC) द्वारा तैयार और अद्यतन की गई केंद्रीय ओबीसी सूची पहले से उपलब्ध है, जिसका उपयोग केंद्र सरकार की नौकरियों और उच्च शिक्षण संस्थानों में आरक्षण प्रदान करने के लिए किया जाता है। इसके अतिरिक्त अनुसूचित जातियों की राष्ट्रपति द्वारा अधिसूचित सूची भी पूरी तरह अद्यतन स्थिति में मौजूद है। मंत्रालय ने यह डेटाबेस जनगणना संचालन के लिए उपलब्ध कराने की सहमति व्यक्त की थी।

प्रारंभिक नोटिंग में क्या लिखा गया और मंत्रालय ने क्यों जताई कड़ी आपत्ति?

विवाद उस समय गहरा गया जब 8 जून को महापंजीयक कार्यालय (ORGI) की ओर से बैठक की प्रारंभिक चार पैराग्राफ वाली नोटिंग जारी की गई। इस शुरुआती रिकॉर्ड में कथित तौर पर यह दर्ज कर दिया गया कि सामाजिक न्याय मंत्रालय के अनुसार, सरकार के लिए देश की सभी जातियों की एक सार्वभौमिक और व्यापक सूची बनाए रखना संवैधानिक रूप से अनिवार्य नहीं है, और इसी आधार पर सरकार के पास ऐसी कोई सर्वसमावेशी जाति सूची उपलब्ध नहीं है।

हालांकि, उसी नोटिंग में यह विरोधाभासी तथ्य भी दर्ज था कि मंत्रालय के पास अनुसूचित जातियों की 1,258 प्रविष्टियों वाली अधिसूचित सूची और 2,483 प्रविष्टियों वाली केंद्रीय ओबीसी सूची मौजूद है। सामाजिक न्याय मंत्रालय के शीर्ष अधिकारियों ने इस शुरुआती नोटिंग की भाषा पर तीखा ऐतराज जताया। मंत्रालय का मानना था कि नोटिंग के इस प्रारूप से ऐसा संदेश जा रहा था मानो जातियों की पूर्व-निर्धारित विधिक सूची का अभाव सामाजिक न्याय मंत्रालय की प्रशासनिक शिथिलता का परिणाम हो, जबकि मंत्रालय का कार्य केवल संवैधानिक रूप से मान्यता प्राप्त श्रेणियों का डेटाबेस बनाए रखना है, न कि संपूर्ण समाज की प्रत्येक जाति की सूची संकलित करना।

11 जून को भेजा गया संशोधित ड्राफ्ट, 30 जून को मिली अंतिम प्रशासनिक स्वीकृति

प्रारंभिक नोटिंग की शब्दावली से असंतुष्ट सामाजिक न्याय मंत्रालय ने 11 जून को एक संशोधित नोट तैयार कर औपचारिक रूप से महापंजीयक कार्यालय को प्रेषित किया। इस संशोधित विधिक रिकॉर्ड में स्पष्ट किया गया कि मंत्रालय संविधान के अनुच्छेदों के तहत केवल अनुसूचित जाति (SC) सूची और केंद्रीय अन्य पिछड़ा वर्ग (Central OBC) सूची के रखरखाव और अद्यतनीकरण के लिए उत्तरदायी है।

संशोधित नोट में यह भी रेखांकित किया गया कि इन आरक्षित और चिन्हित श्रेणियों के अलावा देश के सामान्य वर्ग अथवा अन्य सामाजिक समूहों की अलग से संपूर्ण जातिवार सूची संकलित करना मंत्रालय का संवैधानिक या प्रशासनिक अधिदेश नहीं है। महापंजीयक कार्यालय ने मंत्रालय के इस रुख को स्वीकार करते हुए 30 जून को आधिकारिक तौर पर संशोधित नोटिंग को अंतिम रिकॉर्ड के रूप में दर्ज कर लिया। इस संशोधन ने स्पष्ट कर दिया कि आगामी जातीय गणना केवल एक सामान्य गणना प्रक्रिया नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहन कानूनी और संवैधानिक बारीकियों का संतुलन साधना आवश्यक है।

ओपन-एंडेड फॉर्मेट बनाम ड्रॉप-डाउन लिस्ट: क्या है मुख्य तकनीकी पेच?

आगामी 2027 की जनगणना में जाति के आंकड़े दर्ज करने के लिए सरकार ने डिजिटल टैबलेट और मोबाइल ऐप में किसी पूर्व-निर्धारित ड्रॉप-डाउन मेनू के स्थान पर ‘ओपन-एंडेड फॉर्मेट’ अपनाने का सैद्धांतिक निर्णय लिया है। इसका अर्थ यह है कि नागरिक अपनी जाति का जो भी नाम बताएंगे, प्रगणक उसे बिना किसी छेड़छाड़ के हूबहू दर्ज करेंगे।

सरकार का तर्क है कि यदि फॉर्म में जातियों की कोई पूर्व-निर्धारित सूची पहले से तय कर दी जाए, तो इससे समाज में यह असंतोष फैल सकता है कि सरकार ने आधिकारिक रूप से कुछ ही जातियों को मान्यता दी है और कई स्थानीय समुदायों व उपजातियों को बाहर कर दिया है। दूसरी तरफ, डेटा वैज्ञानिकों और सांख्यिकी विशेषज्ञों का तर्क है कि खुली प्रविष्टि से एक ही जाति के उच्चारण, स्थानीय उपनाम, कुलनाम (गोत्र) और वर्तनी (स्पेलिंग) के आधार पर हजारों अलग-अलग नाम दर्ज हो जाएंगे, जिन्हें बाद में एक व्यवस्थित सामाजिक वर्ग में समेटना लगभग असंभव कार्य हो सकता है।

2011 का कड़वा अनुभव: 46.7 लाख जातियों के नाम से उलझा था सरकारी तंत्र

ओपन-एंडेड डेटा संकलन को लेकर सरकार और सांख्यिकीविदों की चिंता का सबसे बड़ा कारण वर्ष 2011 का सामाजिक-आर्थिक एवं जाति जनगणना (SECC) का अनुभव है। वर्ष 1931 की अंतिम जातिगत जनगणना में देश भर में कुल 4,147 प्रमुख जातियां दर्ज की गई थीं। इसके विपरीत, जब 2011 में खुला विकल्प दिया गया, तो लोगों द्वारा अपनी जातियों, उपजातियों, उपनामों और गोत्रों के रूप में लगभग 46 लाख 73 हजार से अधिक भिन्न-भिन्न नाम दर्ज कराए गए।

इस बेतरतीब और अत्यधिक विशाल डेटा को मानकीकृत (Standardize) करना तत्कालीन विशेषज्ञों के लिए अत्यंत जटिल पहेली बन गया था। इसी तकनीकी गड़बड़ी और आंकड़ों की अविश्वसनीयता के चलते केंद्र सरकार ने वर्ष 2021 में भारत के सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष औपचारिक हलफनामा दाखिल कर कहा था कि 2011 के जातिगत आंकड़े त्रुटिपूर्ण और उपयोग के अयोग्य हैं, जिसके कारण उन्हें कभी सार्वजनिक नहीं किया जा सका। बाद में इन आंकड़ों के वर्गीकरण के लिए नीति आयोग के तत्कालीन उपाध्यक्ष डॉ. अरविंद पनगढ़िया की अध्यक्षता में एक विशेषज्ञ समिति का गठन भी किया गया था, किंतु समस्या का समाधान नहीं निकल सका।

केंद्रीय और राज्य ओबीसी सूचियों का अंतर्विरोध

जातीय जनगणना में ओबीसी श्रेणी का वर्गीकरण सबसे जटिल पहलू माना जा रहा है। इसका मुख्य कारण यह है कि भारत में केंद्र सरकार और विभिन्न राज्य सरकारों की ओबीसी सूचियों में भारी भिन्नता पाई जाती है। कई ऐसी जातियां हैं जो राज्य स्तर पर ओबीसी वर्ग में शामिल हैं, किंतु केंद्र की केंद्रीय ओबीसी सूची में उन्हें यह दर्जा प्राप्त नहीं है।

यदि जनगणना के दौरान केवल केंद्र की 2,483 प्रविष्टियों वाली सूची को आधार बनाया जाता है, तो राज्यों की कल्याणकारी नीतियों के लिए आवश्यक डेटा अधूरा रह जाएगा। वहीं दूसरी ओर, यदि हर राज्य की भिन्न-भिन्न सूचियों को समाहित करने का प्रयास किया जाए, तो राष्ट्रीय स्तर पर आंकड़ों का अखिल भारतीय संकलन अत्यंत विरोधाभासी हो सकता है। सामाजिक न्याय मंत्रालय और महापंजीयक कार्यालय के बीच का यह संवाद इसी अंतर्विरोध को सुलझाने की दिशा में चल रही प्रशासनिक कवायद का हिस्सा है।

30 अप्रैल 2025 का ऐतिहासिक निर्णय और राजनीतिक परिप्रेक्ष्य

स्वतंत्र भारत के इतिहास में नियमित जनगणना के दौरान केवल अनुसूचित जातियों (SC) और अनुसूचित जनजातियों (ST) की ही जातिवार गणना की जाती रही है, जबकि अन्य सभी समुदायों को सामान्य जनसंख्या के रूप में गिना जाता था। इस नीति में युगांतरकारी बदलाव तब आया जब 30 अप्रैल 2025 को प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में आयोजित राजनीतिक मामलों की कैबिनेट समिति (CCPA) ने आगामी जनगणना में व्यापक जातीय गणना कराने के प्रस्ताव को औपचारिक स्वीकृति प्रदान की।

यह निर्णय देश के सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य के लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया। विपक्षी दल—विशेषकर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी—लगातार यह मांग उठाते रहे हैं कि सामाजिक न्याय की नीतियों, आरक्षण के 50 प्रतिशत के दायरे की समीक्षा और सरकारी संसाधनों के समानुपातिक वितरण के लिए विश्वसनीय जातिगत आंकड़े अपरिहार्य हैं। हालांकि, विपक्ष का यह भी आग्रह रहा है कि डेटा जुटाने की पद्धति पूरी तरह वैज्ञानिक और पारदर्शी होनी चाहिए ताकि आंकड़ों की प्रामाणिकता पर कोई संदेह न रहे।

Caste Census 2027: प्रशासनिक तंत्र के सामने साख की परीक्षा

निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार, देश के सामान्य क्षेत्रों में जनगणना और जातीय गणना का मुख्य चरण फरवरी 2027 में संचालित किया जाना है, जबकि देश के सुदूरवर्ती बर्फीले और दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों में मौसम की अनुकूलता को देखते हुए यह प्रक्रिया पूर्व में ही प्रारंभ की जाएगी। इस राष्ट्रव्यापी अभियान में लाखों सरकारी शिक्षक और कर्मचारी डिजिटल माध्यमों से देश के 140 करोड़ से अधिक नागरिकों का डेटाबेस तैयार करेंगे।

सरकारी विभागों के बीच नोटिंग में हुआ यह त्वरित संशोधन दर्शाता है कि सरकार इस बार 2011 जैसी तकनीकी विफलता को दोहराना नहीं चाहती। आगामी महीनों में केंद्र सरकार डेटा वर्गीकरण के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और मशीन लर्निंग टूल्स के उपयोग, राज्य स्तरीय विशेषज्ञ समितियों की भागीदारी और दावों व आपत्तियों के निस्तारण के लिए एक मजबूत मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) जारी कर सकती है। आगामी वर्षों की आरक्षण नीतियों, कल्याणकारी बजट और परिसीमन के भविष्य को तय करने में 2027 की इस जातीय जनगणना के परिणाम सबसे निर्णायक दस्तावेज साबित होंगे।

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