Gender Selection in IVF: क्या आईवीएफ तकनीक से बच्चे का लिंग चुनना संभव है? जानिए भारत में इसे लेकर क्या हैं कड़े कानून

Gender Selection in IVF: IVF तकनीक से जेंडर सिलेक्शन भारत में अपराध, कानून

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Gender Selection in IVF: आधुनिक जीवनशैली और बढ़ते तनाव के कारण हाल के वर्षों में बांझपन (इनफर्टिलिटी) की समस्या तेजी से बढ़ी है। ऐसे दौर में इनविट्रो फर्टिलाइजेशन यानी आईवीएफ (IVF) तकनीक उन निसंतान दंपतियों के लिए एक वरदान साबित हुई है जो माता-पिता बनने का सुख पाना चाहते हैं। देश के छोटे-बड़े शहरों में आईवीएफ सेंटर्स की संख्या लगातार बढ़ रही है। इस बीच, समाज में इस तकनीक को लेकर कई तरह की बातें और अफवाहें भी तैर रही हैं। बहुत से लोगों का मानना है कि आईवीएफ की मदद से होने वाले बच्चे का लिंग यानी जेंडर भी निर्धारित किया जा सकता है, यानी पहले से यह चुना जा सकता है कि लड़का पैदा होगा या लड़की। इस संवेदनशील विषय पर चिकित्सा जगत के डॉक्टरों और कानूनी विशेषज्ञों ने स्थिति पूरी तरह साफ कर दी है कि तकनीकी रूप से यह भले ही संभव हो, लेकिन भारत में ऐसा करना एक गंभीर और गैरजमानती अपराध है।

Gender Selection in IVF: क्या होती है आईवीएफ प्रक्रिया और इसकी जरूरत कब पड़ती है?

चिकित्सा विज्ञान के अनुसार, आईवीएफ एक ऐसी सहायक प्रजनन तकनीक है जिसमें महिला के शरीर से अंडे और पुरुष के स्पर्म को निकालकर लैब में एक नियंत्रित माहौल में आपस में मिलाया जाता है। जब लैब में फर्टिलाइजेशन की प्रक्रिया पूरी हो जाती है और भ्रूण (एम्ब्रियो) तैयार हो जाता है, तो उसे वापस महिला के गर्भाशय (यूट्रस) में सुरक्षित डाल दिया जाता है।

आमतौर पर इस जटिल प्रक्रिया की जरूरत तब पड़ती है जब सालों की कोशिशों और सामान्य इलाजों के बाद भी कोई महिला गर्भधारण नहीं कर पाती। इसके मुख्य कारणों में महिलाओं की फेलोपियन ट्यूब का ब्लॉक होना, बढ़ती उम्र की वजह से अंडों की गुणवत्ता में कमी आना, या पुरुषों में स्पर्म काउंट का बेहद कम होना शामिल है। जब डॉक्टर बांझपन के अन्य सभी पारंपरिक तरीके आजमाकर हार जाते हैं, तब अंतिम विकल्प के रूप में आईवीएफ कराने की लिखित सलाह देते हैं।

क्या वाकई आईवीएफ के दौरान बच्चे का जेंडर पता चल सकता है?

Gender Selection in IVF
Gender Selection in IVF

तकनीकी पहलू की बात करें तो आईवीएफ प्रक्रिया के दौरान जब भ्रूण लैब में तैयार हो रहा होता है, तब उसकी आनुवंशिक जांच (जेनेटिक टेस्टिंग) की जा सकती है।  महिला रोग विशेषज्ञ के अनुसार, इस जेनेटिक टेस्ट का मुख्य उद्देश्य यह पता लगाना होता है कि कहीं बच्चे में माता-पिता के जरिए कोई गंभीर खानदानी या आनुवंशिक बीमारी तो ट्रांसफर नहीं हो रही है।

इसी जेनेटिक कोडिंग की जांच के दौरान भ्रूण के जेंडर का भी पता आसानी से लग जाता है। लेकिन चिकित्सा विशेषज्ञ यह साफ करते हैं कि भारत में इस टेस्ट का उपयोग केवल और केवल बीमारियों को रोकने के लिए करने की अनुमति है। अगर कोई भी डॉक्टर या क्लिनिक इस टेस्ट के जरिए बच्चे का लिंग पता करने या माता-पिता को उसकी जानकारी देने की कोशिश करता है, तो उसे कानूनन पूरी तरह प्रतिबंधित किया गया है।

भारत में लिंग चयन पर क्यों लगी है पाबंदी? जानिए सख्त कानून

भारत में सामाजिक ताने-बाने और पुरानी रूढ़िवादी सोच के कारण लंबे समय तक बेटियों के मुकाबले बेटों को प्राथमिकता दी जाती रही है। अतीत में इस खराब मानसिकता की वजह से देश के कई राज्यों में लिंगानुपात (पुरुष और महिला का अनुपात) बेहद खतरनाक स्तर तक गिर गया था। इसी सामाजिक असमानता और कन्या भ्रूण हत्या जैसी कुरीतियों को रोकने के लिए भारत सरकार ने साल 1994 में पीसीपीएनडीटी एक्ट (PCPNDT Act – प्री-कंसेप्शन एंड प्री-नेटल डायग्नोस्टिक टेक्निक्स एक्ट) लागू किया था।

इस कड़े कानून के तहत गर्भधारण से पहले या बाद में किसी भी तकनीक से बच्चे के लिंग की जांच करना, उसका चयन करना या इससे जुड़ा विज्ञापन करना पूरी तरह गैरकानूनी है। आईवीएफ क्लीनिक भी इसी कानून के दायरे में आते हैं। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यदि कोई डॉक्टर या अस्पताल आईवीएफ के नाम पर जेंडर सिलेक्शन की सुविधा देता पकड़ा जाता है, तो उसका लाइसेंस तुरंत रद्द करने के साथ-साथ भारी जुर्माने और जेल की सजा का सख्त प्रावधान है। इसके अलावा जांच कराने वाले माता-पिता को भी अपराधी मानकर कार्रवाई की जाती है।

Gender Selection in IVF: केवल बीमारी से बचाव के लिए होता है तकनीक का इस्तेमाल

वरिष्ठ डॉक्टरों का मानना है कि आईवीएफ जैसी आधुनिक और बेहतरीन चिकित्सा तकनीक का इस्तेमाल सिर्फ उन दंपतियों के घर में खुशियां लाने के लिए होना चाहिए जो बांझपन के दर्द से जूझ रहे हैं। समाज में इस बात को लेकर पूरी जागरूकता होनी चाहिए कि विज्ञान ने यह तकनीक किसी एक जेंडर को बढ़ावा देने के लिए नहीं, बल्कि मानव कल्याण और स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतों को दूर करने के लिए बनाई है। सरकारी एजेंसियां भी देश भर के आईवीएफ सेंटर्स पर सीसीटीवी कैमरों और रिकॉर्ड्स के जरिए पैनी नजर रखती हैं ताकि इस लाइफ-सेविंग तकनीक का कोई गलत इस्तेमाल न हो सके।

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