FPI Outflow India: भारतीय शेयर बाजार से 18 महीनों में FPI ने निकाले 4.58 लाख करोड़ रुपये, जुलाई में लौटे निवेश के संकेत, जानें पूरा आंकड़ा
विदेशी निवेशकों की भारी बिकवाली के बीच DIIs ने संभाला बाजार, जुलाई में लौटे निवेश के संकेत
FPI Outflow India: भारतीय पूंजी बाजार में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) की निरंतर बिकवाली ने बाजार के जानकारों और नीति निर्माताओं की चिंता बढ़ा दी है। सरकार द्वारा जारी हालिया आंकड़ों के अनुसार, अक्टूबर 2024 से अप्रैल 2026 के बीच 18 महीनों की अवधि में FPIs ने भारतीय इक्विटी बाजार से शुद्ध रूप से 4.58 लाख करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि निकाली है। यह आंकड़ा ऐसे समय में सामने आया है जब वैश्विक अनिश्चितता, भू-राजनीतिक तनाव और मुद्रा बाजार में उतार-चढ़ाव का सीधा असर सभी उभरते बाजारों पर पड़ रहा है। हालांकि, इस कठिन दौर में घरेलू संस्थागत निवेशकों ने बाजार को संभाले रखा और बड़े हादसों से बचाया।
वित्त मंत्रालय द्वारा संसद में प्रस्तुत की गई जानकारी के अनुसार, अकेले साल 2026 में अब तक FPIs ने लगभग 2.60 लाख करोड़ रुपये की इक्विटी निकासी की है। हालांकि, हाल के दिनों में कुछ सकारात्मक संकेत भी देखने को मिले हैं, जहाँ जुलाई महीने में FPIs फिर से भारतीय बाजार में शुद्ध खरीददार बनते दिख रहे हैं। आइए विस्तार से समझते हैं इस बिकवाली के कारण, घरेलू बाजार पर इसके प्रभाव और आगे की राह।
FPIs की निकासी के पीछे वैश्विक और घरेलू कारण
विदेशी निवेशकों की इस भारी बिकवाली के पीछे कई जटिल वैश्विक और घरेलू कारक जिम्मेदार रहे हैं। मध्य पूर्व में अमेरिका-ईरान तनाव और वैश्विक व्यापार टैरिफ को लेकर बनी अनिश्चितता ने अंतरराष्ट्रीय निवेशकों को सतर्क रुख अपनाने पर मजबूर किया। इसके अलावा अमेरिका और यूरोप के केंद्रीय बैंकों द्वारा ब्याज दरों को लंबे समय तक उच्च स्तर पर बनाए रखने के कारण विदेशी निवेशकों के लिए सुरक्षित माने जाने वाले बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी हुई।
दूसरी ओर, अमेरिकी डॉलर के मजबूत होने से उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं में गिरावट दर्ज की गई, जिससे विदेशी निवेशकों का रिटर्न प्रभावित हुआ। अन्य उभरते बाजारों की तुलना में भारतीय शेयरों का वैल्यूएशन काफी ऊंचा था, जिस वजह से कई विदेशी फंडों ने अपने पोर्टफोलियो को रीबैलेंस करते हुए पैसा अन्य सस्ते बाजारों में शिफ्ट कर दिया। सरकार का कहना है कि पूंजी की यह निकासी केवल भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि दक्षिण कोरिया और ताइवान जैसे अधिकांश उभरते बाजारों में भी इसी प्रकार का आउटफ्लो देखा गया है।
कर्ज (डेट) बाजार में FPIs का भरोसा बरकरार
इक्विटी बाजार से रिकॉर्ड निकासी के बावजूद विदेशी निवेशकों का भरोसा भारतीय कर्ज (डेट) बाजार में कायम रहा। इसी 18 महीने की अवधि के दौरान FPIs ने भारतीय बॉन्ड और डेट मार्केट में 72,701 करोड़ रुपये का शुद्ध निवेश दर्ज किया।
यह रुझान स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि विदेशी निवेशक भारतीय अर्थव्यवस्था से पूरी तरह बाहर नहीं निकल रहे हैं, बल्कि इक्विटी के जोखिम को कम करके सुरक्षित और स्थिर रिटर्न देने वाले एसेट्स की ओर रुख कर रहे हैं। भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीतियों, वैश्विक बॉन्ड इंडेक्स में भारत के शामिल होने और टैक्स सुधारों ने डेट सेगमेंट को विदेशी निवेशकों के लिए बेहद आकर्षक बनाया है।
जुलाई में वापसी के संकेत: 25 हजार करोड़ से ज्यादा का निवेश
चालू वित्त वर्ष 2026-27 के जुलाई महीने में स्थिति सुधरती हुई नजर आ रही है। आंकड़ों और बाजार रिपोर्टों के अनुसार, 13 जुलाई 2026 तक FPIs ने भारतीय इक्विटी बाजार में 25,807 करोड़ रुपये का शुद्ध निवेश किया है। इसके अतिरिक्त, डेट मार्केट में भी इसी अवधि के दौरान 56,694 करोड़ रुपये का रिकॉर्ड इनफ्लो दर्ज किया गया है।
यह सकारात्मक बदलाव वैश्विक स्तर पर रिस्क सेंटिमेंट में सुधार, रुपये में आई स्थिरता और भारत के मजबूत तिमाही कॉरपोरेट नतीजों के कारण आया है। यदि तुलनात्मक रूप से देखें तो जहां अक्टूबर 2024 से अप्रैल 2026 के बीच इक्विटी से 4.58 लाख करोड़ रुपये निकले थे और डेट में 72,701 करोड़ आए थे, वहीं अकेले जुलाई 2026 के शुरुआती दो हफ्तों में ही दोनों सेगमेंट मिलाकर 82 हजार करोड़ रुपये से अधिक का नया इनफ्लो आ चुका है।
घरेलू निवेशकों (DIIs) ने संभाला बाजार का मोर्चा
विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली के बावजूद भारतीय शेयर बाजार ताश के पत्तों की तरह नहीं ढहा। इसका मुख्य श्रेय हमारे घरेलू संस्थागत निवेशकों (DIIs), म्यूचुअल फंड्स, बीमा कंपनियों और खुदरा निवेशकों को जाता है।
जून 2021 में भारतीय म्यूचुअल फंड उद्योग का कुल AUM (Assets Under Management) 33.67 लाख करोड़ रुपये था, जो जून 2026 तक तीन गुने के करीब बढ़कर 82.22 लाख करोड़ रुपये के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुँच गया। व्यवस्थित निवेश योजनाओं (SIP) के जरिए हर महीने आने वाले रिकॉर्ड इनफ्लो ने भारतीय बाजारों को एक मजबूत सुरक्षा कवच प्रदान किया है। जब-जब FPIs ने बिकवाली की, तब-तब DIIs और खुदरा निवेशकों ने खरीदारी करके बाजार में लिक्विडिटी बनाए रखी।
FPI आउटफ्लो का अर्थव्यवस्था पर असर और सरकारी कदम
FPIs की निकासी से अल्पावधि में बाजार में वोलेटिलिटी (उतार-चढ़ाव) जरूर बढ़ी है, लेकिन दीर्घकालिक दृष्टि से देश की समष्टि आर्थिक (Macroeconomic) बुनियाद पूरी तरह से मजबूत बनी हुई है।
सरकार और आरबीआई ने विदेशी पूंजी को आकर्षित करने के लिए कई ठोस कदम उठाए हैं, जिनमें FCNR(B) डिपॉजिट स्कीमों को सुगम बनाना, टैक्स प्रक्रियाओं का सरलीकरण और विनिर्माण क्षेत्र को गति देना शामिल है। मजबूत GDP ग्रोथ दर, रिकॉर्ड प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) और डिजिटल इकोनॉमी की रफ्तार ने विदेशी आउटफ्लो के नकारात्मक प्रभाव को काफी हद तक बेअसर कर दिया है।
FPI Outflow India: आगे क्या? विशेषज्ञों की राय और आउटलुक
बाजार विशेषज्ञों और अर्थशास्त्रियों का मानना है कि जुलाई में FPIs का सकारात्मक रुख एक शुभ संकेत है। यदि वैश्विक स्तर पर तनाव कम होता है और अमेरिकी फेडरल रिजर्व दरों में कटौती की दिशा में आगे बढ़ता है, तो भारत जैसे मजबूत फंडामेंटल वाले बाजार में FPI फ्लो और तेजी से लौटेगा।
दीर्घकालिक दृष्टिकोण से भारत की विकास दर दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेज बनी रहेगी। ऐसे में निवेशकों के लिए सलाह यही है कि वे अल्पावधि के बाजार उतार-चढ़ाव से घबराने के बजाय डाइवर्सिफाइड पोर्टफोलियो और SIP के जरिए अनुशासित निवेश जारी रखें, क्योंकि यही लंबी अवधि में वेल्थ क्रिएशन की असली कुंजी है।
निष्कर्ष
18 महीनों में 4.58 लाख करोड़ रुपये की FPI निकासी निसंदेह एक बड़ा आंकड़ा है, लेकिन भारतीय पूंजी बाजार की परिपक्वता और घरेलू निवेशकों की अभूतपूर्व भागीदारी ने यह साबित कर दिया है कि भारतीय बाजार अब केवल विदेशी पैसों पर निर्भर नहीं है। जुलाई 2026 में विदेशी निवेशकों की वापसी इस बात का प्रमाण है कि भारत दुनिया के सबसे पसंदीदा निवेश स्थलों में शीर्ष पर बना हुआ है।
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