Dussehra 2026: यूपी में दशहरे पर क्यों देखा जाता है दही-मछली? लखनऊ-कानपुर की अनोखी परंपरा का जानें धार्मिक महत्व
लखनऊ और कानपुर में विजयादशमी पर दही, मछली और चांदी के सिक्के के दर्शन की लोक-मान्यता जानें
Dussehra 2026: सनातन संस्कृति में विजयादशमी का पावन पर्व असत्य पर सत्य, अंधकार पर प्रकाश और अधर्म पर धर्म की शाश्वत विजय का प्रतीक माना जाता है। इस दिन देशभर में रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों का दहन कर बुराई के अंत का उत्सव मनाया जाता है, जबकि कई अंचलों में मां दुर्गा की प्रतिमाओं का विसर्जन कर उन्हें भावभीनी विदाई दी जाती है। इन व्यापक आयोजनों के बीच उत्तर प्रदेश के अवध और बुंदेलखंड अंचल के प्रमुख शहरों में दशहरे की भोर एक अत्यंत विशिष्ट, अनूठी और पारंपरिक लोक-रीति के साथ शुरू होती है। प्रांतीय राजधानी लखनऊ, औद्योगिक नगरी कानपुर, ऐतिहासिक झांसी, उन्नाव और रामपुर समेत कई क्षेत्रों में विजयादशमी की सुबह जीवित मछली, ताजा दही और चांदी के सिक्के के दर्शन करने की पुरातन परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी निभाई जा रही है। स्थानीय लोक-आस्था के अनुसार, विजय पर्व पर इन तीन मांगलिक प्रतीकों का दर्शन करने से वर्षभर कार्यों में निर्बाध सफलता, व्यापारिक उन्नति और पारिवारिक सुख-समृद्धि बनी रहती है।
Dussehra 2026: अवध और कानपुर की गलियों में दशहरे की सुबह का सजीव दृश्य
विजयादशमी के दिन सूर्योदय के साथ ही लखनऊ के चौक, यहियागंज, अमीनाबाद और कानपुर के नयागंज, बिरहाना रोड व सीसामऊ जैसे पारंपरिक मोहल्लों में एक अनूठा दृश्य देखने को मिलता है। स्थानीय मछुआरे और पारंपरिक विक्रेता बड़े पीतल या कांसे के परातों और जलपात्रों में छोटी जीवित मछलियां लेकर घरों के द्वारों पर पहुंचते हैं। गृहणियां और परिवार के मुखिया एक थाल में ताजा दही, अक्षत, रोली और पूर्वजों के समय से सहेज कर रखे गए चांदी के सिक्के सजाकर मुख्य द्वार पर आते हैं।
थाल में सजी सामग्री के साथ जल में तैरती हुई मछली का दर्शन किया जाता है और इसके पश्चात मछुआरे को अपनी सामर्थ्य के अनुसार दक्षिणा, अनाज या वस्त्र देकर विदा किया जाता है। कई समृद्ध और पारंपरिक परिवारों में चांदी के सिक्के को दही के पात्र में रखकर उसके ऊपर अक्षत छिड़कने और फिर पूरे परिवार द्वारा उसके सम्मुख हाथ जोड़कर वर्षभर के कल्याण की प्रार्थना करने का विधान है। यह केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि अवध की उस गंगा-जमुनी और लोक-संस्कृति का जीवंत हिस्सा है, जो उत्सवों को सीधे प्रकृति और आजीविका से जोड़ती है।
मछली के दर्शन का धार्मिक और आध्यात्मिक रहस्य: मत्स्य अवतार से संबंध
सनातन धर्म के पौराणिक आख्यानों में मीन यानी मछली को अत्यंत पवित्र और सृष्टि-संरक्षक जीव का दर्जा प्राप्त है। भागवत महापुराण और मत्स्य पुराण के अनुसार, जब प्रलय काल में संपूर्ण पृथ्वी जलमग्न हो गई थी और चारों ओर अंधकार छा गया था, तब भगवान विष्णु ने अपने प्रथम अवतार के रूप में ‘मत्स्य अवतार’ धारण किया था। इसी रूप में उन्होंने वेदों की रक्षा की थी और राजा सत्यव्रत (वैवस्वत मनु) की नौका को सुरक्षित किनारे लगाकर मानव जीवन, औषधियों और समस्त बीज संपदा का संरक्षण किया था।
दशहरे के दिन मछली का दर्शन करना इसी बात का आध्यात्मिक स्मरण कराता है कि जीवन में कितनी भी विपरीत परिस्थितियां या संकट रूपी प्रलय आ जाए, परमात्मा का संरक्षण सदा धर्म के साथ बना रहता है। जल में मछली की निरंतर गतिशीलता और स्वच्छंदता व्यक्ति को जीवन में कभी न ठहरने और आगे बढ़ते रहने की प्रेरणा देती है। इसके अतिरिक्त, शकुन शास्त्र में भी किसी भी शुभ यात्रा या नए अभियान पर निकलने से ठीक पहले जल में तैरती मछली का दर्शन होना सर्वोत्तम शकुन माना गया है।
दही और शर्करा: मांगलिक शुरुआत और शीतल सात्विकता का प्रतीक
भारतीय जनजीवन और वैदिक कर्मकांडों में दही को पंचामृत के प्रमुख घटक के रूप में सर्वोच्च स्थान दिया गया है। आयुर्वेद और धार्मिक दृष्टिकोण दोनों में ही दही को सौम्यता, शीतलता और सकारात्मक ऊर्जा का वाहक माना जाता है। पुरातन काल से ही यह मान्यता चली आ रही है कि जब भी कोई व्यक्ति किसी निर्णायक कार्य, युद्ध, राज्याभिषेक या दूरस्थ यात्रा के लिए प्रस्थान करता था, तो उसे दही का तिलक लगाकर या दही-चीनी खिलाकर विदा किया जाता था ताकि उसका मन शांत रहे और बुद्धि स्थिर बनी रहे।
विजयादशमी को ‘अबूझ मुहूर्त’ माना जाता है, जिस दिन किसी भी नए उद्योग, विद्यारंभ, शस्त्र पूजन अथवा व्यापारिक बहीखातों की शुरुआत की जाती है। ऐसे विजय दिवस पर दही का दर्शन करना इस बात का प्रतीक है कि आरंभ होने वाला प्रत्येक कार्य शांति, मधुरता और स्थायित्व के साथ संपन्न होगा। दही का श्वेत रंग अंतःकरण की शुद्धता और सात्विक विचारों का भी प्रतिनिधित्व करता है।
चांदी के सिक्के का दर्शन: मां लक्ष्मी और आर्थिक समृद्धि की कामना
दही और मछली के साथ चांदी के सिक्के का समावेश इस लोक-परंपरा को आर्थिक संपन्नता और धातु-शुद्धता से जोड़ता है। ज्योतिष और वास्तु शास्त्र के सिद्धांतों के अनुसार, चांदी का सीधा संबंध चंद्र देव और शुक्र ग्रह से माना गया है, जो क्रमशः मानसिक शांति और भौतिक वैभव के नियंत्रक ग्रह हैं। इसके साथ ही चांदी को देवी महालक्ष्मी का प्रिय धातु माना गया है।
विजयादशमी के दिन चांदी के सिक्के का दर्शन करने का तात्पर्य घर में वर्षभर धन, धान्य और ऐश्वर्य का अक्षुण्ण प्रवाह बनाए रखना है। व्यापारी वर्ग इस दिन अपने नए व्यापारिक वर्ष की रूपरेखा तैयार करते समय इस सिक्के को अपनी तिजोरी या गल्ले से स्पर्श कराकर पुनः सुरक्षित रख देते हैं। यह मान्यता है कि विजय पर्व पर किया गया यह छोटा सा कृत्य वर्षभर व्यवसाय में अनावश्यक आर्थिक नुकसान से रक्षा करता है।
श्रीराम की विजय यात्रा और क्षत्रिय परंपरा का ऐतिहासिक संदर्भ
इस परंपरा का एक ऐतिहासिक और पौराणिक संदर्भ मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम की लंका विजय की प्रस्थान यात्रा से भी जोड़ा जाता है। जनश्रुतियों के अनुसार, जब भगवान श्रीराम ने रावण से युद्ध के लिए किष्किंधा से प्रस्थान किया था, तब आश्विन शुक्ल दशमी के दिन उन्हें मार्ग में नीलकंठ पक्षी, जल में मीन और शुभ मंगल कलश के दर्शन हुए थे, जिसे देखकर ऋषियों ने उनकी विजय की अग्रिम घोषणा कर दी थी।
मध्यकाल में अवध, बुंदेलखंड और रीवा रियासतों के राजा-महाराजा विजयादशमी के दिन ‘सीमोल्लंघन’ (अपनी राज्य की सीमाओं को पार कर विजय अभियान) करने से पूर्व राजदरबार में दही, मछली और स्वर्ण-रजत मुद्राओं का दर्शन कर अपनी सेना का निरीक्षण करते थे। समय के साथ यह राजसी परंपरा जनसामान्य के घरों तक पहुंच गई और लोक-उत्सव का अभिन्न अंग बन गई।
Dussehra 2026: लोक-संस्कृति, प्रकृति प्रेम और आधुनिक जीवन में इसका संदेश
दशहरे पर दही-मछली देखने की यह परंपरा आधुनिक युग में भी हमें प्रकृति और जीव-जगत के प्रति संवेदनशील बने रहने का गहरा संदेश देती है। इस परंपरा में मछली की हत्या या उसे क्षति पहुंचाने का कोई स्थान नहीं है; बल्कि जलपात्र में सुरक्षित मछली का दर्शन कर उसे पुनः स्वच्छ जलाशय या नदी में मुक्त कर दिया जाता है। यह विधान जल संरक्षण और जलीय जीवों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का एक अनुपम सांस्कृतिक माध्यम है।
यद्यपि किसी भी लोक-मान्यता या धार्मिक रीति को केवल अंधविश्वास के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए, किंतु यह परंपरा समाज को जोड़ने, प्राचीन संस्कारों को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा के संचार का एक सुंदर माध्यम अवश्य है। दशहरे का वास्तविक मर्म केवल प्रतीकों के दर्शन तक सीमित नहीं है, बल्कि अपने भीतर के दुर्गुणों, ईर्ष्या और अहंकार रूपी रावण का दहन कर सत्य और सदाचार के पथ पर अग्रसर होना ही विजयादशमी का सच्चा संकल्प है।
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