CSE Report: विश्व पर्यावरण दिवस (5 जून) के ठीक एक दिन पहले भारत में पर्यावरण की बदहाली को लेकर एक बेहद चौंकाने वाली और डराने वाली रिपोर्ट सामने आई है। नई दिल्ली स्थित संस्था ‘सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट’ (CSE) और ‘डाउन टू अर्थ’ पत्रिका ने गुरुवार (4 जून 2026) को अपनी सालाना सांख्यिकीय रिपोर्ट ‘स्टेट ऑफ इंडियाज एनवायरनमेंट 2026 इन फिगर्स’ जारी की है। सरकारी आंकड़ों पर आधारित यह रिपोर्ट बताती है कि देश में हवा, पानी, जंगल और मौसम का मिजाज बहुत तेजी से बिगड़ रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, साल 2025 में भारत को भीषण मौसमी आपदाओं का सामना करना पड़ा, जिसकी वजह से देश भर में 4,421 लोगों की दर्दनाक मौत हो गई और करोड़ों हेक्टेयर फसल तबाह हो गई। सीएसई की महानिदेशक सुनीता नारायण ने कहा कि देश में बदलाव लाने के लिए इन आंकड़ों को गंभीरता से समझना और नापना सबसे जरूरी है।
CSE Report: 99% दिनों में चरम मौसम की मार, फरवरी में गायब रही शीत लहर
सीएसई की प्रोग्राम डायरेक्टर किरण पांडे के मुताबिक, साल 2025 के दौरान देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को असामान्य और भयानक मौसम की मार झेलनी पड़ी। साल के लगभग 99 प्रतिशत दिनों में देश के किसी न किसी हिस्से में भारी बारिश, तूफान, बाढ़ या भयंकर सूखा दर्ज किया गया। इन प्राकृतिक आपदाओं के कारण 17.41 मिलियन हेक्टेयर में खड़ी फसल पूरी तरह बर्बाद हो गई, जिससे किसानों की कमर टूट गई है।
रिपोर्ट में सबसे डरावनी बात यह सामने आई कि अब मार्च और अप्रैल के महीने किसानों के लिए सबसे ज्यादा काल साबित हो रहे हैं। सर्दियों के मौसम में भी गर्मी लगातार बढ़ रही है। इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ कि फरवरी 2026 में देश में एक भी शीत लहर (कोल्ड वेव) दर्ज नहीं की गई। इसके ठीक उलट, मार्च 2026 की शुरुआत होते ही हिमाचल प्रदेश जैसे ठंडे पहाड़ी राज्य को भी भीषण लू (हीटवेव) का सामना करना पड़ा।
CSE Report: वायु प्रदूषण बना जानलेवा, PM2.5 के कारण मौतों में 61% की भारी बढ़ोतरी
भारत में जहरीली हवा और वायु प्रदूषण का कहर लगातार लोगों की जान ले रहा है। दुनिया भर में प्रदूषण के कारण होने वाली कुल मौतों में भारत की हिस्सेदारी साल 2014 के 23.76 प्रतिशत से बढ़कर साल 2023 में 25.34 प्रतिशत पर पहुंच गई है। वैश्विक स्तर पर प्रदूषण से होने वाली मौतों का औसत जहां प्रति 1,00,000 लोगों पर 114 है, वहीं भारत में यह चिंताजनक आंकड़ा 186 है।
पिछले एक दशक के आंकड़ों को देखें तो बाहरी हवा में घुले खतरनाक PM2.5 बारीक कणों के कारण होने वाली मौतों में 61 प्रतिशत का भारी इजाफा हुआ है। हालांकि, इस रिपोर्ट में एक राहत की बात भी दिखी है। घरों के भीतर होने वाले प्रदूषण (जैसे चूल्हे और लकड़ी के धुएं) से होने वाली मौतों में 22 प्रतिशत की गिरावट आई है, जो देश में साफ ईंधन यानी एलपीजी सिलेंडरों के बढ़ते इस्तेमाल का अच्छा असर दिखाता है।
‘ग्लोबल वॉटर बैंकरप्सी’: पंजाब, राजस्थान और हरियाणा में सूख रहा है भूजल
संयुक्त राष्ट्र की संस्था (UNU-INWEH) ने एक बड़ी चेतावनी देते हुए कहा है कि पूरी दुनिया अब ‘वैश्विक जल दिवालियापन’ (Global Water Bankruptcy) के बेहद खतरनाक दौर में कदम रख चुकी है। इसका सीधा मतलब यह है कि हमारी नदियां और जमीन के अंदर का पानी (भूजल) इस हद तक दूषित और खत्म हो चुके हैं कि उन्हें दोबारा पहले जैसा ठीक करना अब नामुमकिन सा लग रहा है।
भारत की बात करें तो देश के प्रमुख नदी डेल्टा अत्यधिक भूजल निकालने की वजह से धीरे-धीरे जमीन के अंदर धंस रहे हैं। पंजाब, राजस्थान और हरियाणा जैसे प्रमुख कृषि प्रधान राज्य अपनी जरूरत से कहीं ज्यादा तेजी से जमीन के अंदर का पानी बाहर खींच रहे हैं, जबकि बारिश या अन्य माध्यमों से जमीन के अंदर पानी वापस रिचार्ज बहुत कम हो पा रहा है।
कम उम्र के युवाओं को शिकार बना रही दिल की बीमारियां, खुदकुशी के आंकड़े डरावने
नेशनल स्टैटिस्टिकल ऑफिस (NSO) द्वारा अप्रैल 2026 में जारी किए गए ताजा आंकड़ों के हवाले से रिपोर्ट में बताया गया है कि इस समय लगभग 13 प्रतिशत भारतीय नागरिक किसी न किसी गंभीर बीमारी से पीड़ित हैं। पिछले तीन दशकों (30 साल) में देश के अंदर बीमार पड़ने वाले लोगों की संख्या बढ़कर दोगुनी हो गई है।
स्वास्थ्य के मोर्चे पर सबसे ज्यादा परेशान करने वाली बात यह है कि दिल की बीमारियां (हार्ट अटैक और कार्डियक अरेस्ट) अब बुजुर्गों को ही नहीं, बल्कि युवाओं को बहुत कम उम्र में अपना शिकार बना रही हैं। अस्पताल में 15 से 29 साल के युवाओं में दर्ज होने वाली कुल बीमारियों में 2 प्रतिशत हिस्सेदारी अकेले दिल की बीमारियों की है। इसके अलावा, देश में गंभीर और लंबी बीमारी से परेशान होकर 30,600 से अधिक लोगों ने खुदकुशी जैसा खौफनाक कदम उठाया है।
CSE Report: उद्योग के लिए काटे गए 97,000 हेक्टेयर जंगल, कोर्ट में फंसे मामले
पर्यावरण मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, साल 2020-21 से लेकर 2024-25 के बीच सरकार ने सड़कों, फैक्ट्रियों और अन्य विकास कार्यों (गैर-वानिकी कार्यों) के लिए लगभग 97,000 हेक्टेयर में फैले घने जंगलों को काटने की मंजूरी दी। जंगलों के इस तरह लगातार घटने से इंसानों और जंगली जानवरों के बीच का टकराव (मैन-एनिमल कॉन्फ्लिक्ट) बहुत ज्यादा बढ़ गया है।
हालत यह है कि साल 2025 के शुरुआती 6 महीनों में ही बाघों के हमले में 40 आम लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी। दूसरी तरफ, देश में पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले अपराधियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की रफ्तार बहुत धीमी है। साल के अंत तक देश की अलग-अलग अदालतों में पर्यावरण और प्रदूषण से जुड़े 99,000 से अधिक मामले लंबित (पेंडिंग) पड़े हुए थे। यह रिपोर्ट साफ इशारा करती है कि अगर हम अब भी नहीं संभले, तो प्रकृति का यह गुस्सा आने वाले दिनों में और भी ज्यादा भारी पड़ेगा।
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