Crude Oil Price: सस्ता नहीं अब महंगा ही होगा पेट्रोल-डीजल! कच्चे तेल की कीमतों में आए भूचाल से बढ़ी चिंता, समझें पूरा गणित
Crude Oil Price: सस्ता नहीं अब महंगा ही होगा पेट्रोल-डीजल! कच्चे तेल की कीमतों में आए भूचाल से बढ़ी चिंता, समझें पूरा गणित
क्या आपके मन में भी यह सवाल उठ रहा है कि आखिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि दुनिया भर में तेल के दाम इस कदर बेकाबू होने लगे हैं? वैश्विक अर्थव्यवस्था और भू-राजनीतिक हालात जिस तेजी से बदल रहे हैं, उससे संकेत साफ हैं कि ऊर्जा बाजार में उथल-पुथल का दौर शुरू हो चुका है। सरकार और तेल विपणन कंपनियों की नजरें लगातार बदलती हुई इन परिस्थितियों पर टिकी हुई हैं, ताकि घरेलू बाजार में पड़ने वाले झटकों को कम किया जा सके।
Crude Oil Price: क्यों महंगा हो रहा है कच्चा तेल?
कच्चे तेल की कीमतों में आई इस अचानक तेजी के पीछे सबसे बड़ा कारण अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता हुआ भू-राजनीतिक तनाव माना जा रहा है। अमेरिकी प्रशासन द्वारा ईरान का समर्थन करने वाले देशों के खिलाफ कड़े आर्थिक कदम उठाने की चेतावनी ने वैश्विक बाजार में दहशत का माहौल पैदा कर दिया है। इसके अलावा, अमेरिका की तरफ से ईरान पर प्रतिबंधों को और अधिक सख्त करने की बात भी कही जा रही है, जिससे तेल की वैश्विक सप्लाई बाधित होने की आशंकाएं काफी बढ़ गई हैं।
तेल बाजार के जानकारों के अनुसार, सबसे बड़ी चिंता का विषय हॉर्मुज जलडमरूमध्य का इलाका बना हुआ है। संघर्ष और तनाव के चलते इस अहम समुद्री मार्ग से होने वाली तेल की आवाजाही पर पहले ही असर पड़ चुका है। युद्ध जैसे हालात बनने से पहले दुनिया भर की कुल तेल खपत का एक बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से होकर गुजरता था। यदि इस मार्ग से होने वाली आपूर्ति में और अधिक बाधा आती है, तो कच्चे तेल की कीमतों को और ऊंचे स्तर पर जाने से रोकना मुश्किल हो जाएगा।
भारत पर क्या होगा इसका सीधा असर?
भारत अपनी कुल ऊर्जा और ईंधन की जरूरतों का एक बहुत बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल का महंगा होना देश के लिए हमेशा से एक बड़ी चुनौती रहा है। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल के दाम बढ़ने का यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि भारत में पेट्रोल और डीजल के खुदरा दाम रातों-रात बढ़ा दिए जाएंगे। देश में ईंधन की कीमतें तय करने में सरकारी नीतियां, केंद्र और राज्य सरकारों के टैक्स, तेल कंपनियों के मार्जिन और वैश्विक औसत की बड़ी भूमिका होती है।
इसके बावजूद, यदि कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक उच्च स्तर पर बनी रहती हैं, तो सरकारी तेल कंपनियों के लिए पुरानी दरों पर पेट्रोल और डीजल बेचना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं रह पाएगा। आयात का बढ़ता बिल देश के वित्तीय संतुलन को भी प्रभावित करता है, जिससे घरेलू स्तर पर कीमतों में संशोधन का दबाव स्वतः बन जाता है। आम उपभोक्ता के लिए यह स्थिति आने वाले दिनों में जेब पर भारी बोझ साबित हो सकती है।
Crude Oil Price: भू-राजनीतिक तनाव और सप्लाई का संकट
वर्तमान परिस्थितियों को देखने पर साफ पता चलता है कि इस बार कीमतों में तेजी का मुख्य कारण मांग से ज्यादा आपूर्ति का संकट है। मिडिल ईस्ट में जारी तनाव ने वैश्विक ऊर्जा बाजार के निवेशकों और कारोबारियों को पसोपेश में डाल दिया है। ब्रेंट क्रूड और अमेरिकी डब्ल्यूटीआई क्रूड के दामों में दर्ज की गई दो प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी इसी डर का नतीजा है कि आने वाले दिनों में बाजार में तेल की कमी हो सकती है।
ऐसी आशंकाएं भी जताई जा रही हैं कि यदि कूटनीतिक स्तर पर इस तनाव को जल्द शांत नहीं किया गया, तो क्रूड ऑयल के दाम और ऊपर जा सकते हैं। उपभोक्ताओं के लिए इसका सीधा अर्थ यह है कि फिलहाल ईंधन के सस्ते होने की उम्मीद छोड़कर महंगाई के एक नए दौर के लिए खुद को तैयार रखना होगा। बाजार के विश्लेषक इस बात पर एकमत हैं कि आने वाले कुछ हफ्ते ऊर्जा बाजार की दिशा तय करने में निर्णायक साबित होंगे।
Read More Here:-