CJI Surya Kant ने NALSAR दीक्षांत समारोह का निमंत्रण ठुकराया, कहा- मैंने कभी स्वीकार नहीं किया, इसलिए शामिल होने का सवाल ही नहीं
छात्रों के विरोध के बीच CJI सूर्यकांत ने साफ किया कि उन्होंने समारोह का निमंत्रण स्वीकार नहीं किया था
CJI Surya Kant: भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने हैदराबाद स्थित प्रतिष्ठित ‘नेशनल एकेडमी ऑफ लीगल स्टडीज एंड रिसर्च’ (NALSAR) यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के आगामी दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होने के निमंत्रण को स्पष्ट रूप से अस्वीकार कर दिया है। सीजेआई ने इस बात पर जोर दिया कि उन्होंने विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा भेजे गए निमंत्रण को कभी स्वीकार ही नहीं किया था, इसलिए कार्यक्रम में शामिल होने या न होने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। सीजेआई सूर्यकांत का यह आधिकारिक बयान ऐसे समय में आया है जब पिछले कुछ दिनों से एनएएलएसएआर के छात्रों के एक वर्ग द्वारा उनकी उपस्थिति को लेकर विरोध जताया जा रहा था और यह मामला कानूनी व अकादमिक हलकों में काफी चर्चित हो गया था।
जोधपुर में देश के सभी राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालयों (NLUs) के कुलपतियों के सम्मेलन को संबोधित करने के बाद सीजेआई ने मीडिया से बातचीत में यह जानकारी दी। उन्होंने स्पष्ट किया कि एनएएलएसएआर प्रशासन की ओर से निमंत्रण पत्र अवश्य मिला था, परंतु उन्होंने अपनी ओर से कभी इस कार्यक्रम में उपस्थित होने के लिए कोई सहमति नहीं दी थी। सीजेआई के इस बयान ने उन सभी अटकलों पर विराम लगा दिया है, जिनमें यह दावा किया जा रहा था कि वे छात्रों के विरोध प्रदर्शन के बीच समारोह का हिस्सा बन सकते हैं।
CJI Surya Kant: एनएएलएसएआर दीक्षांत समारोह और छात्रों के विरोध की वजह
एनएएलएसएआर यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ में प्रतिवर्ष अगस्त के अंतिम सप्ताह या सितंबर की शुरुआत में वार्षिक दीक्षांत समारोह आयोजित किया जाता है। पूर्व परंपराओं का पालन करते हुए विश्वविद्यालय प्रशासन ने इस वर्ष भी सीजेआई सूर्यकांत को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया था और कुछ दिन पहले इसकी पुष्टि भी की थी। हालांकि, विश्वविद्यालय के कुल 1400 पंजीकृत छात्रों में से लगभग 400 से अधिक छात्रों ने सीजेआई को मुख्य अतिथि बनाए जाने पर कड़ी आपत्ति दर्ज कराई थी।
विरोध दर्ज कराने वाले छात्रों का तर्क था कि वे हाल ही में जुलाई के महीने में देश में हुए कुछ सामाजिक-राजनीतिक घटनाक्रमों और उनसे संबंधित मामलों की अदालती सुनवाई के दौरान सीजेआई की मौखिक टिप्पणियों से सहमत नहीं हैं। छात्रों ने विश्वविद्यालय के कुलपति और प्रशासन को एक औपचारिक पत्र सौंपकर कहा था कि दीक्षांत समारोह संस्थान के नैतिक मूल्यों और विचारधारा का प्रतीक होता है, इसलिए मुख्य अतिथि के चयन में छात्रों की भावनाओं और संवैधानिक मूल्यों का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन मामलों से जुड़ा है विवाद
छात्रों के विरोध की मुख्य वजह सुप्रीम कोर्ट में लंबित वे याचिकाएं हैं, जिनकी सुनवाई सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ कर रही है। इन याचिकाओं में संसद मार्च के दौरान प्रदर्शनकारी छात्रों पर पुलिस द्वारा किए गए कथित बल प्रयोग, पैलेट गन्स के उपयोग तथा प्रदर्शनकारियों की पहचान के लिए ‘फेशियल रिकग्निशन टेक्नोलॉजी’ (FRT) के इस्तेमाल की स्वतंत्र जांच कराने की मांग शामिल है।
दूसरी ओर, सीजेआई की बेंच ने उन घायल पुलिसकर्मियों के परिजनों की याचिकाओं को भी सुनवाई के लिए स्वीकार किया है, जिनमें आंदोलन के दौरान कथित हिंसा में शामिल असामाजिक तत्वों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की गई है। छात्रों के असंतोष का एक अन्य कारण यह भी था कि शुरुआती चरण में एक अधिवक्ता द्वारा बिना औपचारिक याचिका दाखिल किए मामले का स्वतः संज्ञान लेने के अनुरोध को सीजेआई ने खारिज कर दिया था। हालांकि, बाद में जब विधिवत याचिकाएं दायर की गईं, तो शीर्ष अदालत ने उन्हें स्वीकार करते हुए पुलिस को निर्देश दिया कि छात्रों के विरुद्ध कोई दंडात्मक कार्रवाई न की जाए और घटना से जुड़े सभी सीसीटीवी फुटेज सुरक्षित रखे जाएं।
बार काउंसिल ऑफ इंडिया की भूमिका और बीसीआई का यू-टर्न
यह विवाद उस समय अत्यंत जटिल हो गया जब बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा ने एनएएलएसएआर के कुलपति को एक पत्र जारी कर दिया। इस पत्र में सीजेआई का विरोध करने वाले छात्रों की पहचान करने, उनके खिलाफ अनुशासनात्मक जांच बिठाने और भविष्य में अधिवक्ता के रूप में उनके राज्य बार कौंसिलों में पंजीकरण को रोकने तक की सख्त चेतावनी दी गई थी।
बीसीआई के इस कठोर पत्र की देशभर के वरिष्ठ वकीलों, पूर्व जजों और कानूनी विशेषज्ञों द्वारा तीखी आलोचना की गई। इस निर्णय को छात्रों की स्वतंत्र अभिव्यक्ति के संवैधानिक अधिकार का हनन माना गया। मामला जब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा, तो शीर्ष अदालत ने भी बीसीआई के अनावश्यक हस्तक्षेप पर सवाल उठाए और कहा कि यह मामला सीजेआई और कानून के छात्रों के बीच का है। बढ़ते दबाव और अदालत की रुख को देखते हुए बीसीआई को अपना विवादित आदेश वापस लेना पड़ा।
CJI Surya Kant: सीजेआई के स्पष्टीकरण के बाद आगे की राह
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत द्वारा निमंत्रण स्वीकार न करने की बात सार्वजनिक किए जाने के बाद एनएएलएसएआर प्रशासन के समक्ष दीक्षांत समारोह के लिए नए मुख्य अतिथि का चुनाव करने की चुनौती पैदा हो गई है। सीजेआई के बयान से यह भी स्पष्ट होता है कि वे न्यायपालिका की गरिमा को किसी भी अनावश्यक विवाद से दूर रखना चाहते हैं।
राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालयों में छात्रों को मिलने वाली वैचारिक स्वतंत्रता और संस्थागत परंपराओं के बीच संतुलन को लेकर यह घटनाक्रम कानूनी शिक्षा जगत में एक महत्वपूर्ण नजीर बन गया है। फिलहाल विश्वविद्यालय प्रशासन दीक्षांत समारोह की नई तिथियों और मुख्य अतिथि के नाम की घोषणा करने के लिए आंतरिक बैठकों में व्यस्त है, जबकि सुप्रीम कोर्ट में संबंधित पुलिस कार्रवाई और छात्र आंदोलनों से जुड़ी याचिकाओं पर कानूनी प्रक्रिया अपने तय समय से आगे बढ़ रही है।
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