CHAPLE Syndrome: 3 साल बाद जेनेटिक टेस्ट से खुला बीमारी का राज

5 साल के बच्चे में CD55 जीन म्यूटेशन मिला, टार्गेटेड थेरेपी के बाद 10 दिनों में सुधार

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CHAPLE Syndrome: चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र से एक अत्यंत प्रेरणादायक और ऐतिहासिक मामला सामने आया है, जिसने दुर्लभ आनुवंशिक बीमारियों (Rare Genetic Diseases) के सटीक निदान और आधुनिक प्रिसिजन मेडिसिन की अहमियत को दुनिया के सामने उजागर किया है। पश्चिम बंगाल का एक पांच वर्षीय बच्चा पिछले तीन वर्षों से लगातार गंभीर दस्त, पूरे शरीर में असामान्य सूजन (एडिमा) और कुपोषण की मार झेल रहा था। कई बड़े अस्पतालों और विशेषज्ञ चिकित्सकों के चक्कर काटने, अनगिनत जांचों और भारी स्टेरॉयड उपचार के बावजूद बीमारी की सही जड़ पकड़ में नहीं आ रही थी।

अंततः एक उन्नत जेनेटिक टेस्ट ने इस रहस्यमयी स्थिति का पर्दाफाश करते हुए पुष्टि की कि बच्चा ‘चैपल सिंड्रोम’ (CHAPLE Syndrome) नामक अत्यंत दुर्लभ आनुवंशिक विकार से ग्रस्त है। सटीक पहचान होते ही चिकित्सकों ने अंतरराष्ट्रीय प्रोटोकॉल के तहत टार्गेटेड थेरेपी ‘पॉजेलिमैब’ (Pozelimab) से उपचार प्रारंभ किया, जिसके बाद मात्र दस दिनों के भीतर बच्चे के स्वास्थ्य में चमत्कारिक सुधार दर्ज किया गया और उसे एक नया जीवन मिला।

CHAPLE Syndrome: सामान्य लक्षणों के पीछे छिपी थी दुर्लभ बीमारी

पीड़ित बच्चे का स्वास्थ्य संकट लगभग दो वर्ष की आयु से शुरू हुआ था। उसे लगातार पेट में ऐंठन, गंभीर दस्त और चेहरे व हाथ-पैरों में तरल पदार्थ जमा होने से भारी सूजन की समस्या रहने लगी थी। शरीर में पोषक तत्वों का अवशोषण पूरी तरह ठप हो जाने के कारण बच्चे का सामान्य शारीरिक और मानसिक विकास भी बाधित हो रहा था।

चिकित्सकों ने प्रारंभिक दौर में इसे बच्चों में होने वाली आम गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल समस्याएं, नेफ्रोटिक सिंड्रोम, सीलिएक रोग अथवा क्रोहन डिजीज जैसी इंफ्लेमेटरी बाउल डिजीज (IBD) समझकर उपचार किया। बच्चे को लंबे समय तक उच्च खुराक वाले स्टेरॉयड और एंटीबायोटिक्स दिए गए, किंतु दवाएं बंद होते ही लक्षण और अधिक उग्र रूप में लौट आते थे। इस अनिश्चितता ने परिवार को घोर मानसिक और आर्थिक संकट में धकेल दिया था।

प्रोटीन-लूजिंग एंटरोपैथी: शरीर से लगातार बह रहा था जीवन रक्षक एल्ब्यूमिन

गहन रक्त परीक्षणों में यह तथ्य उभरकर सामने आया कि बच्चा ‘प्रोटीन-लूजिंग एंटरोपैथी’ (Protein-Losing Enteropathy) से पीड़ित था। इस चिकित्सीय स्थिति में मरीज की आंतों की दीवारें और लसीका वाहिकाएं (लिम्फैटिक्स) क्षतिग्रस्त हो जाती हैं, जिससे रक्त में मौजूद आवश्यक प्लाज्मा प्रोटीन, विशेषकर एल्ब्यूमिन और रोग-प्रतिरोधक इम्युनोग्लोबुलिन (एंटीबॉडीज), आंतों के जरिए अनियंत्रित रूप से बाहर बह जाते हैं।

रक्त में एल्ब्यूमिन का स्तर अत्यधिक गिर जाने से नसों का द्रव ऊतकों में रिसने लगा, जिससे बच्चे के फेफड़ों, पेट और त्वचा के नीचे पानी भरने लगा। संक्रमण से लड़ने वाली एंटीबॉडीज के नगण्य हो जाने के कारण बच्चा लगातार जानलेवा संक्रमणों के जोखिम में था। स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी थी कि बच्चे को जीवित रखने के लिए प्रत्येक दो सप्ताह में नसों के माध्यम से बाहरी एल्ब्यूमिन और इंट्रावेनस इम्युनोग्लोबुलिन (IVIG) के महंगे इन्फ्यूजन देने पड़ रहे थे, जो केवल एक अस्थायी सहारा साबित हो रहे थे।

जेनेटिक टेस्ट ने सुलझाई गुत्थी: CD55 जीन म्यूटेशन का हुआ खुलासा

पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों के निष्प्रभावी होने पर वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञों और जेनेटिसिस्टों ने संपूर्ण एक्सोम सीक्वेंसिंग (Whole Exome Sequencing) कराने का निर्णय लिया। इस अत्याधुनिक डीएनए परीक्षण के नतीजों ने मेडिकल टीम को स्तब्ध कर दिया। जांच में बच्चे के CD55 जीन में दोनों प्रतियों पर गंभीर उत्परिवर्तन (बाय-एलीलिक म्यूटेशन) पाया गया।

इस आनुवंशिक विसंगति ने पुष्टि की कि बच्चा औपचारिक रूप से ‘चैपल सिंड्रोम’ से पीड़ित था। वैज्ञानिक रूप से इसे CD55 Deficiency with Hyperactivation of Complement, Angiopathic Thrombosis and Severe Protein-Losing Enteropathy के नाम से जाना जाता है। सामान्य मानव शरीर में CD55 प्रोटीन हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली के ‘कॉम्प्लीमेंट सिस्टम’ को अत्यधिक सक्रिय होने और शरीर की अपनी ही स्वस्थ कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाने से रोकता है। CD55 की अनुपस्थिति के कारण बच्चे का कॉम्प्लीमेंट सिस्टम अनियंत्रित होकर स्वयं उसकी आंतों की रक्त वाहिकाओं को नष्ट कर रहा था।

दुनिया भर में मात्र 100 मामले: क्यों इतना दुर्लभ है यह सिंड्रोम

चैपल सिंड्रोम चिकित्सा जगत की सबसे दुर्लभ आनुवंशिक बीमारियों में से एक है। अंतरराष्ट्रीय मेडिकल अभिलेखों के अनुसार विश्व भर में अब तक इस बीमारी के केवल लगभग 100 पुष्ट मामले ही दर्ज किए गए हैं।

इतने दुर्लभ होने और इसके लक्षण आम पाचन विकारों से काफी मिलते-जुलते होने के कारण अधिकांश चिकित्सक अपने नियमित करियर में इस बीमारी को पहचान नहीं पाते। यदि समय पर आनुवंशिक अनुक्रमण (Genetic Sequencing) न किया जाए, तो सही निदान के अभाव में अधिकांश पीड़ित बच्चे बचपन में ही गंभीर थ्रोम्बोसिस (रक्त के थक्के जमना), कुपोषण या बहु-अंग विफलता के कारण दम तोड़ देते हैं।

पॉजेलिमैब टार्गेटेड थेरेपी: 10 दिनों में दिखा जादुई असर

बीमारी के मूल जैविक कारण की पहचान होने के उपरांत मेडिकल टीम ने बिना समय गंवाए प्रिसिजन मेडिसिन का मार्ग चुना। अमेरिकी खाद्य एवं औषधि प्रशासन (US FDA) द्वारा अनुमोदित मोनोक्लोनल एंटीबॉडी पॉजेलिमैब (Pozelimab) का चयन किया गया। यह लक्षित दवा सीधे तौर पर कॉम्प्लीमेंट प्रोटीन C5 को अवरुद्ध कर देती है, जिससे CD55 की कमी के बावजूद आंतों की कोशिकाओं पर होने वाला विनाशकारी ऑटो-इम्यून हमला तुरंत रुक जाता है।

दवा का पहला डोज दिए जाने के मात्र 10 दिनों के भीतर बच्चे के चेहरे, उदर और पैरों की जिद्दी सूजन तेजी से घटने लगी। बच्चे की आंतों ने पोषक तत्वों को अवशोषित करना शुरू किया और मल के जरिए प्रोटीन का रिसाव पूरी तरह बंद हो गया। प्रयोगशाला जांचों में बच्चे के सीरम एल्ब्यूमिन और प्राकृतिक इम्युनोग्लोबुलिन का स्तर सामान्य सीमा में लौट आया। सबसे बड़ी राहत की बात यह रही कि बच्चे को हर पखवाड़े दिए जाने वाले दर्दनाक और खर्चीले IVIG व एल्ब्यूमिन इन्फ्यूजन की आवश्यकता हमेशा के लिए समाप्त हो गई।

CHAPLE Syndrome: दुर्लभ बीमारियों में प्रिसिजन मेडिसिन और जेनेटिक्स का भविष्य

पश्चिम बंगाल के इस मासूम की मेडिकल यात्रा भारत में रेयर डिजीज डायग्नोस्टिक्स के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर है। यह मामला स्पष्ट संदेश देता है कि जब बच्चों में दीर्घकालिक और अस्पष्टीकृत लक्षण पारंपरिक दवाओं से ठीक न हो रहे हों, तो बिना विलंब किए आनुवंशिक परीक्षणों का सहारा लेना चाहिए। जीनोमिक मेडिसिन और टार्गेटेड थेरेपी ने यह साबित कर दिया है कि यदि बीमारी के आनुवंशिक कोड की सही पहचान समय पर हो जाए, तो लाइलाज मानी जाने वाली दुर्लभ बीमारियों पर भी विजय प्राप्त कर किसी भी मासूम को सामान्य और स्वस्थ जीवन लौटाया जा सकता है।

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