Cancer Treatment: कैंसर के इलाज में बड़ी क्रांति, अब डीएनए रिपोर्ट तय करेगी दवा, अंदाजे से इलाज का दौर खत्म
CancerTreatment: कैंसर के इलाज में बड़ी क्रांति, अब डीएनए रिपोर्ट तय करेगी दवा, अंदाजे से इलाज का दौर खत्म
Cancer Treatment: भारत में कैंसर के बढ़ते मामलों और इससे जुड़ी जटिलताओं के बीच चिकित्सा जगत से एक ऐसी उम्मीद की किरण जगी है, जो मरीजों के लिए जीवन रक्षक साबित हो सकती है। अब तक कैंसर का इलाज काफी हद तक एक जैसे प्रोटोकॉल, सामान्य कीमोथेरेपी और डॉक्टरों के अनुभव पर आधारित होता था। लेकिन अब कैंसर के इलाज का तरीका पूरी तरह बदलने जा रहा है। मेडिकल साइंस में आई नई तकनीक ‘नेक्स्ट जेनरेशन सीक्वेंसिंग’ (NGS) के जरिए अब मरीज के शरीर में मौजूद डीएनए के बदलावों को पढ़कर बिल्कुल सटीक दवा का चुनाव किया जा सकेगा।
यह तकनीक कैंसर से जूझ रहे मरीजों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। अब डॉक्टर इस बात का इंतजार नहीं करेंगे कि कोई खास दवा शरीर पर असर करती है या नहीं। इसके बजाय, इलाज की शुरुआत ही उस दवा से होगी जो मरीज के डीएनए प्रोफाइल के हिसाब से सबसे प्रभावी होगी। यह बदलाव मरीजों को बेवजह के साइड इफेक्ट्स से बचाने के साथ-साथ उनके कीमती समय और संसाधनों की भी बचत करेगा। भारत में कैंसर के मरीजों की बढ़ती संख्या को देखते हुए, यह तकनीक चिकित्सा क्षेत्र में एक बड़ा मील का पत्थर साबित हो रही है।
Cancer Treatment: कैसे काम करती है नेक्स्ट जेनरेशन सीक्वेंसिंग
कैंसर की इस आधुनिक जांच तकनीक को सरल शब्दों में समझें तो यह मरीज के जीनोम का एक डिजिटल मैप तैयार करती है। इसमें मरीज के खून, लार या प्रभावित हिस्से के ऊतकों (टिश्यू) का सैंपल लिया जाता है। इसके बाद अत्याधुनिक मशीनों की मदद से डीएनए की पूरी कोडिंग का विश्लेषण किया जाता है। इस प्रक्रिया में कैंसर पैदा करने वाले जीन में हुए छोटे से छोटे बदलाव को भी आसानी से पकड़ा जा सकता है।
इस जीनोमिक टेस्टिंग का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह कैंसर के जेनेटिक कारणों की गहराई तक पहुंचती है। उदाहरण के तौर पर, अगर दो मरीजों को एक ही तरह का कैंसर है, तो हो सकता है कि उनके शरीर में होने वाले जीन बदलाव एक-दूसरे से पूरी तरह अलग हों। ऐसे में, पुरानी पद्धति के तहत दोनों को एक ही दवा दी जाती थी, लेकिन अब एनजीएस की मदद से दोनों के लिए अलग और सटीक दवाओं का चुनाव किया जा सकता है। इसे चिकित्सा की भाषा में ‘प्रिसिजन मेडिसिन’ या ‘पर्सनलाइज्ड ट्रीटमेंट’ कहा जाता है।
भारत के लिए क्यों जरूरी है यह बदलाव
भारत में कैंसर के मामलों के आंकड़े काफी चिंताजनक हैं। देश में कैंसर के मरीजों की संख्या दुनिया में तीसरे स्थान पर है, जो चिकित्सा तंत्र पर भारी दबाव डालती है। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि भारत में लगभग 80 प्रतिशत से ज्यादा मामलों की पहचान तब होती है जब कैंसर अपनी आखिरी स्टेज पर पहुंच चुका होता है। देरी से पहचान होने के कारण मरीजों की जान बचाना बेहद कठिन हो जाता है।
इसके अलावा, भारतीय आबादी का जेनेटिक ढांचा पश्चिमी देशों से काफी भिन्न है। शोध से पता चलता है कि फेफड़ों के कैंसर के लिए जिम्मेदार एक खास जीन म्यूटेशन पश्चिमी देशों में 25 प्रतिशत मरीजों में मिलता है, जबकि भारत में यह केवल 10 प्रतिशत लोगों में ही पाया जाता है। वहीं, एक अन्य जीन गड़बड़ी जो भारत में 35 प्रतिशत कैंसर मरीजों में दिखती है, वह पश्चिमी देशों में सिर्फ 10 से 15 प्रतिशत लोगों तक सीमित है। ऐसे में, विदेशी दवाओं और इलाज के तरीकों को आंख मूंदकर भारत में लागू करना हमेशा प्रभावी नहीं होता। इसलिए, भारत को अपने खुद के डेटा और जेनेटिक मैपिंग की सख्त जरूरत थी।
Cancer Treatment: इलाज की लागत और चुनौतियां
हालांकि यह तकनीक क्रांतिकारी है, लेकिन इसके सामने सबसे बड़ी बाधा इसकी उच्च लागत है। फिलहाल एनजीएस जांच की कीमत 20 हजार से लेकर 4 लाख रुपये तक हो सकती है, जो एक आम भारतीय मरीज के लिए बड़ी चुनौती है। जांच के अलावा, कैंसर की दवाओं का खर्च भी आसमान छू रहा है। कई आधुनिक इंजेक्शन की एक शीशी की कीमत ही एक लाख रुपये से अधिक होती है, जो मध्यमवर्गीय परिवारों की कमर तोड़ देने के लिए काफी है।
भविष्य की बात करें तो विशेषज्ञों का मानना है कि साल 2030 तक भारत में जेनेटिक टेस्टिंग का बाजार 27 प्रतिशत की वार्षिक दर से बढ़कर 14 हजार करोड़ रुपये के पार पहुंच जाएगा। जैसे-जैसे इस तकनीक का इस्तेमाल बढ़ेगा, उम्मीद की जानी चाहिए कि इसके खर्च में भी कमी आएगी। सरकार और निजी अस्पतालों को मिलकर एक ऐसा तंत्र बनाने की जरूरत है जिससे गरीब से गरीब मरीज तक यह अत्याधुनिक सुविधा पहुंच सके।
Cancer Treatment: मरीजों के लिए एक नई उम्मीद की शुरुआत
कैंसर से जंग जीतने के लिए सही समय पर सही इलाज का होना अनिवार्य है। एनजीएस जैसी तकनीक के आने से इलाज में लगने वाला ‘ट्रायल एंड एरर’ यानी तुक्केबाजी वाला दौर अब खत्म होने की कगार पर है। जब मरीज को पता होगा कि उसकी बीमारी का वास्तविक कारण कौन सा जीन है, तो वह और उसका परिवार मानसिक रूप से भी ज्यादा मजबूत महसूस करेगा।
आने वाले समय में जब हम ‘प्रिसिजन मेडिसिन’ की ओर बढ़ेंगे, तो कैंसर को भी एक पुरानी लाइलाज बीमारी के बजाय एक मैनेज करने योग्य स्थिति के रूप में देखा जाएगा। डॉक्टरों के लिए यह तकनीक एक दिशा सूचक यंत्र की तरह है, जो उन्हें कैंसर की जटिल भूलभुलैया में सही रास्ता दिखा रही है। यह महज एक नई जांच नहीं है, बल्कि उन लाखों लोगों के लिए जीवन की एक नई उम्मीद है, जो इस गंभीर बीमारी को मात देकर एक बेहतर कल की तलाश में हैं। भारत में इलाज के इस नए युग की शुरुआत निश्चित रूप से स्वास्थ्य सेवाओं के लिए एक उज्ज्वल भविष्य का संकेत है।
Read More Here:-
- UP schools heat action plan: यूपी स्कूलों में गर्मी से बच्चों की सुरक्षा के लिए ‘हीट एक्शन प्लान’ लागू, टीचरों को करना होगा ये खास काम, अभिभावकों को भी सतर्क रहने की सलाह
- Basmati Rice Deal: बासमती चावल के बाजार में भारत की बड़ी चाल, अफगानिस्तान के साथ डील से पाकिस्तान को तगड़ा झटका
- IRCTC Tour Package: तीर्थयात्रा का सपना अब हुआ आसान, 25 हजार से कम में करें अयोध्या, काशी और पुरी की यात्रा
- Darling song 7 Khoon Maaf: 166 साल पुराने रूसी लोकगीत से इंस्पायर्ड वो गाना, फिल्म में एक्टिंग करने वाले थे करण जोहर-इम्तियाज अली, ऊषा उत्थुप की आवाज ने बनाया सुपरहिट