Europe heat deaths 40 degree: यूरोप में 40 डिग्री तापमान में ही क्यों होने लगीं सैकड़ों मौतें, गर्मी न झेल पाने की वजह क्या है, जलवायु परिवर्तन का बढ़ता खतरा
40 डिग्री तापमान में सैकड़ों मौतें, जलवायु परिवर्तन और इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी का खतरा
Europe heat deaths 40 degree: वैश्विक जलवायु परिवर्तन (Climate Change) और बढ़ते तापमान का असर अब पूरी दुनिया में बेहद भयावह रूप में दिखने लगा है। इस समय पूरा यूरोपीय महाद्वीप एक अभूतपूर्व और भीषण गर्मी की लहर (हीटवेव) की चपेट में है। चौंकाने वाली बात यह है कि यूरोप के कई देशों में तापमान जैसे ही 40 डिग्री सेल्सियस के आंकड़े को छू रहा है, वैसे ही वहां सैकड़ों लोगों की मौत की बेहद दुखद खबरें सामने आने लगी हैं। भारत, पाकिस्तान और मध्य पूर्व के देशों के दृष्टिकोण से देखा जाए, तो 40 डिग्री का यह तापमान एक बेहद सामान्य और सहन करने योग्य आंकड़ा माना जाता है, जहां गर्मियों में पारा अक्सर 48 से 50 डिग्री तक पहुंच जाता है। ऐसे में यह बड़ा यक्ष प्रश्न खड़ा होता है कि आखिर यूरोपीय देशों के नागरिक इस 40 डिग्री की गर्मी को क्यों नहीं झेल पा रहे हैं और इसके पीछे का वास्तविक वैज्ञानिक, शारीरिक और इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ा कारण क्या है।
जलवायु विज्ञानियों और अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, इस सामूहिक मौतों के पीछे मुख्य कारण यूरोप की पारंपरिक ठंडी जलवायु, वहां के नागरिकों के शरीर की जैविक अनुकूलता (बायोलॉजिकल एडाप्टेशन) और वहां के घरों का स्थापत्य डिजाइन है, जो पूरी तरह से गर्मी को सोखने के लिए बनाया गया है। जलवायु परिवर्तन के इस कड़क दौर में यूरोप का तापमान सामान्य से कई गुना अधिक तेजी से बढ़ रहा है, जिससे निपटने के लिए वहां का पूरा सिस्टम तैयार नहीं था। आइए आज के इस विस्तृत और विशेष वैज्ञानिक व पर्यावरणीय विश्लेषण के माध्यम से गहराई से समझने का प्रयास करते हैं कि आखिर यूरोप में इस 40 डिग्री तापमान के जानलेवा बनने के पीछे के मुख्य कारण क्या हैं, और यह वैश्विक संकट हमारे भविष्य के लिए क्या बड़ी चेतावनी दे रहा है।
शारीरिक अनुकूलन की कमी और यूरोप की भौगोलिक बनावट का विज्ञान
यूरोप में 40 डिग्री तापमान पर होने वाली मौतों के पीछे का सबसे पहला और मुख्य कारण इंसानी शरीर का ‘होमोस्टैसिस’ और तापमान अनुकूलन का सिद्धांत है। यूरोप के अधिकांश देशों, जैसे ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी और स्कैंडिनेवियाई देशों में साल के अधिकांश महीनों में कड़ाके की ठंड पड़ती है और वहां का औसत ग्रीष्मकालीन तापमान मात्र 20 से 25 डिग्री सेल्सियस के आसपास ही रहता है। इसके चलते पीढ़ियों से वहां रहने वाले लोगों का शरीर और उनकी नसें अत्यधिक ठंड को सहने के लिए पूरी तरह से अनुकूलित (इवोल्व) हो चुकी हैं, जिसे जैविक भाषा में ‘कोल्ड एडाप्टेशन’ कहा जाता है।
जब ऐसे वातावरण में अचानक पारा 40 डिग्री के पार चला जाता है, तो यूरोपीय नागरिकों का शरीर इस अप्रत्याशित और कड़क गर्मी के झटके (थर्मल शॉक) को बर्दाश्त नहीं कर पाता है। भारतीय उपमहाद्वीप के लोगों के विपरीत, उनके शरीर में अत्यधिक पसीना बहाकर खुद को ठंडा रखने की ग्रंथियां उतनी सक्रिय नहीं होती हैं। इसके परिणामस्वरूप, उनका आंतरिक शारीरिक तापमान बहुत तेजी से बढ़ने लगता है, जिससे रक्त गाढ़ा होने लगता है और अचानक ब्लड प्रेशर (रक्तचाप) गिरने से दिल का दौरा (हार्ट अटैक), ऑर्गन फेलियर और ब्रेन स्ट्रोक जैसी जानलेवा बीमारियां बहुत ही कम समय में इंसान को मौत के मुंह में धकेल देती हैं।
इंफ्रास्ट्रक्चर का जाल: गर्मी रोकने में पूरी तरह असमर्थ यूरोपीय इमारतें
शारीरिक कारणों के अलावा, यूरोप का स्थापत्य कला और वहां के घरों का निर्माण ढांचा (इंफ्रास्ट्रक्चर) इस भीषण गर्मी में सबसे बड़ा विलेन साबित हो रहा है। सदियों से यूरोप में घरों और बहुमंजिला इमारतों का निर्माण इस कड़क नियम के तहत किया जाता रहा है कि वे बाहर की कड़ाके की ठंड और बर्फीली हवाओं को घर के भीतर आने से रोकें और घर के अंदर की गर्मी (हीटिंग) को बाहर न जाने दें। इसके लिए वहां की दीवारों में इंसुलेशन की मोटी परतें लगाई जाती हैं और खिड़कियों को डबल-ग्लेज्ड (कांच की दोहरी परत) बनाया जाता है ताकि सूरज की थोड़ी सी भी रोशनी घर के भीतर पूरी तरह कैद हो जाए।
ठंड के दिनों में वरदान साबित होने वाला यही आर्किटेक्चर आज की इस भीषण गर्मी में एक जानलेवा ‘ग्रीनहाउस’ में तब्दील हो चुका है। जब बाहर 40 डिग्री तापमान होता है, तो ये इमारतें दिनभर की गर्मी को अपने भीतर पूरी तरह सोख लेती हैं, और रात के समय जब बाहर का मौसम थोड़ा ठंडा भी होता है, तब भी इन बंद कमरों के अंदर का तापमान 35 डिग्री से नीचे नहीं गिर पाता है। इसके साथ ही, यूरोप के 90 प्रतिशत से अधिक आवासीय घरों में एयर कंडीशनर (AC) लगाने की कोई व्यवस्था या परंपरा नहीं रही है; ऐसे में बिना वेंटिलेशन और बिना एसी के इन बंद और गर्म कमरों के भीतर रहना वहां के नागरिकों, विशेषकर बुजुर्गों और बीमार लोगों के लिए एक बहुत बड़ा और दम घोंटू यातना गृह बन जाता है, जो उनकी मृत्यु का सबसे बड़ा कारण बन रहा है।
बुजुर्ग आबादी पर सबसे ज्यादा मार और भारत से इसकी कड़क तुलना
इस पूरे हीटवेव संकट की सांख्यिकीय समीक्षा करने पर यह दुखद तथ्य सामने आता है कि मारे गए लोगों में 70 प्रतिशत से अधिक संख्या उन बुजुर्गों और वरिष्ठ नागरिकों की है जो अकेले रहते हैं या पहले से ही सांस और दिल की पुरानी बीमारियों से पीड़ित हैं। ढलती उम्र के कारण वैसे ही शरीर की तापमान को नियंत्रित करने की क्षमता कमजोर हो जाती है, और जब कमरे के भीतर की उमस असहनीय हो जाती है, तो इन बुजुर्गों को समय रहते चिकित्सा सहायता भी नहीं मिल पाती है, जिससे यह संकट एक बहुत बड़े मानवीय त्रासद का रूप ले लेता है।
यदि इसकी तुलना भारत जैसे विकासशील देशों से करें, तो भारत की भौगोलिक स्थिति भूमध्य रेखा के नजदीक होने के कारण यहाँ के लोगों का जीन और शरीर बचपन से ही कड़क धूप, लू और 45 डिग्री से अधिक के तापमान को सहने के लिए पूरी तरह अभ्यस्त होता है। भारतीय घरों की बनावट भी हवादार (क्रॉस-वेंटिलेशन) होती है, जहाँ छतों पर पंखे, कूलर और खिड़कियों का प्रचुर उपयोग किया जाता है। इसके विपरीत, यूरोप के ठंडे देशों में उमस (ह्यूमिडिटी) का स्तर बहुत ज्यादा ऊंचा होता है; 40 डिग्री के सूखे तापमान को तो फिर भी झेला जा सकता है, लेकिन जब उच्च उमस के कारण पसीना आना पूरी तरह बंद हो जाता है, तो वह स्थिति इंसानी वेंटिलेशन सिस्टम को पूरी तरह चोक कर देती है, जिससे मौत का जोखिम कई गुना अधिक बढ़ जाता है।
निष्कर्ष: पर्यावरण संरक्षण का अंतिम संदेश और कड़क कूटनीति की आवश्यकता
यूरोप के कोने-कोने से आ रही ये दर्दनाक और डरावनी खबरें वास्तव में पूरी मानव जाति और वैश्विक महाशक्तियों के लिए एक बहुत बड़ी और अंतिम चेतावनी हैं कि ‘ग्लोबल वार्मिंग’ (Europe heat deaths 40 degree) अब कोई भविष्य की दूरगामी थ्योरी नहीं, बल्कि हमारे वर्तमान को तबाह करने वाला एक कड़क और क्रूर सच बन चुका है। संयुक्त राष्ट्र और विश्व मौसम संगठन (WMO) ने बार-बार यह कड़ा नियम दोहराया है कि यदि दुनिया के सभी देशों ने कार्बन उत्सर्जन में कटौती करने, पेरिस जलवायु समझौते के नियमों को कड़ाई से लागू करने और जीवाश्म ईंधनों (कोयला-पेट्रोल) पर अपनी निर्भरता को तुरंत कम करने के मोर्चे पर ठोस कदम नहीं उठाए, तो आने वाले सालों में मौसम का यह जानलेवा और अप्रत्याशित चक्र और ज्यादा विनाशकारी रूप अख्तियार कर लेगा।
यूरोपीय सरकारों ने अब युद्धस्तर पर अपने इंफ्रास्ट्रक्चर को बदलने, शहरों के बीच बड़े पैमाने पर कूलिंग सेंटर्स खोलने और हीटवेव एक्शन प्लान तैयार करने की तैयारियां शुरू कर दी हैं। प्रकृति के इन कड़े थपेड़ों से सीख लेकर हर देश को अपने शहरी नियोजन में बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण, ग्रीन कवर बढ़ाने और नवीकरणीय ऊर्जा (सोलर व विंड पावर) को अपनी जीवनशैली का अनिवार्य हिस्सा बनाना होगा। प्रकृति के नियमों का सम्मान करना और धरती के तापमान को नियंत्रित रखना ही संपूर्ण मानव सभ्यता, हमारी आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य और इस खूबसूरत ग्रह की खुशियों को हमेशा के लिए सुरक्षित, शीतल, हरा-भरा और खुशहाल बनाए रखने का एकमात्र व सबसे अचूक रास्ता साबित होगा।
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