Protest to Politics: आंदोलन से निकली राजनीतिक पार्टियां कितनी सफल होती हैं? इतिहास के उदाहरणों के बीच CJP के भविष्य पर चर्चा
AAP, TRS और वैश्विक उदाहरणों के बीच आंदोलन आधारित राजनीति की चुनौतियों और संभावनाओं पर नजर
Protest to Politics: देश की राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर हाल ही में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेतृत्व में चले व्यापक छात्र आंदोलन ने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा सुनिश्चित करके एक बड़ी सफलता हासिल की है। प्रदर्शन भले ही फिलहाल समाप्त हो गया हो, लेकिन राजनीतिक गलियारों और रणनीतिकारों के बीच अब सबसे बड़ा सवाल यही तैर रहा है कि क्या यह छात्र आंदोलन आगे चलकर देश की मुख्यधारा की राजनीति में एक पूर्ण राजनीतिक दल का रूप ले सकता है। भारत सहित वैश्विक स्तर पर लोकतांत्रिक इतिहास इस बात का साक्षी रहा है कि कई बड़े राजनीतिक और सामाजिक बदलाव विशाल जन-आंदोलनों की कोख से ही निकले हैं। इनमें से कई प्रयोग ऐतिहासिक रूप से सफल साबित हुए, तो कई संगठन शुरुआती जनआक्रोश शांत होते ही समय की धूल में खो गए।
आंदोलन की सड़क से निकलकर चुनावी राजनीति के मैदान में उतरने का यह पूरा सफर बेहद जटिल, संवेदनशील और अनिश्चितताओं से भरा होता है। सड़क पर उमड़े जनआक्रोश, युवाओं के गुस्से और भावनात्मक उबाल को एक अनुशासित, संगठित और दीर्घकालिक संस्थागत शक्ति में बदलना किसी भी नेतृत्व के लिए सबसे कठिन परीक्षा मानी जाती है। इसके लिए केवल जनसमर्थन ही काफी नहीं होता, बल्कि मजबूत सांगठनिक ढांचा, स्पष्ट विचारधारा और लंबे समय तक जनता से जुड़ाव बनाए रखने की रणनीति की जरूरत होती है।
आम आदमी पार्टी: भारतीय राजनीति में आंदोलन का सबसे सफल प्रयोग
स्वतंत्र भारत के इतिहास में किसी नागरिक आंदोलन से निकलकर एक राष्ट्रीय राजनीतिक दल बनने का सबसे नया और सफलतम उदाहरण ‘आम आदमी पार्टी’ (AAP) को माना जाता है। वर्ष 2011 में वयोवृद्ध समाजसेवी अन्ना हजारे के नेतृत्व में दिल्ली के जंतर-मंतर से शुरू हुए ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ (भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन) ने पूरे देश के युवाओं और मध्यम वर्ग को झकझोर कर रख दिया था। उस आंदोलन की मुख्य धारा से जुड़े अरविंद केजरीवाल और उनके सहयोगियों ने अंततः राजनीतिक रास्ता चुनने का साहसिक निर्णय लिया।
नवंबर 2012 में आम आदमी पार्टी का औपचारिक गठन हुआ और वर्ष 2013 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में ही पार्टी ने 28 सीटें जीतकर पारंपरिक राजनीति को हिलाकर रख दिया। इसके बाद 2015 में 67 सीटें और 2020 में 62 सीटें जीतकर पार्टी ने हैट्रिक लगाई और दिल्ली में लगभग एक दशक से अधिक समय तक एकछत्र शासन किया। बाद में पंजाब में प्रचंड बहुमत से सरकार बनाना और राष्ट्रीय दल का दर्जा हासिल करना यह साबित करता है कि यदि आंदोलन के एजेंडे को सुशासन, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे बुनियादी मुद्दों से जोड़ दिया जाए, तो वह एक दीर्घकालिक राजनीतिक ताकत बन सकता है।
क्षेत्रीय अस्मिता और लंबे संघर्ष से उपजी तेलंगाना राष्ट्र समिति
भारत में दूसरा बड़ा उदाहरण दक्षिण भारत से आता है, जहाँ ‘तेलंगाना राष्ट्र समिति’ (TRS, अब भारत राष्ट्र समिति – BRS) का जन्म एक दशक लंबे जन-आंदोलन की कोख से हुआ था। के. चंद्रशेखर राव (KCR) ने अलग तेलंगाना राज्य की मांग को लेकर वर्ष 2001 में तेलुगु देशम पार्टी (TDP) से अलग होकर इस दल की स्थापना की थी। वर्ष 2009 में उनके आमरण अनशन और उसके बाद आंध्र प्रदेश तथा तेलंगाना क्षेत्र में सड़कों पर उतरे लाखों छात्रों और कर्मचारियों के उग्र प्रदर्शनों ने केंद्र सरकार को झुकने पर मजबूर कर दिया था।
आंदोलन की इस जमीन पर टीआरएस ने अपनी राजनीतिक जड़ें इस कदर मजबूत कीं कि वर्ष 2014 में जब अलग तेलंगाना राज्य का निर्माण हुआ, तो जनता ने केसीआर को राज्य का पहला मुख्यमंत्री चुना। इसके बाद केसीआर लगातार दो बार पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में रहे। यह उदाहरण स्पष्ट दिखाता है कि जब कोई आंदोलन किसी भौगोलिक, सांस्कृतिक या क्षेत्रीय पहचान से गहराई से जुड़ा होता है, तो वह लंबी राजनीतिक सफलता की गारंटी बन सकता है।
दक्षिण अफ्रीका की एएनसी और ब्राजील की वर्कर्स पार्टी के वैश्विक उदाहरण
वैश्विक पटल पर देखें तो आंदोलनों से निकली पार्टियों का इतिहास और भी अधिक प्रेरणादायक नजर आता है। दक्षिण अफ्रीका की ‘अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस’ (ANC) इसका सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय उदाहरण है, जो दशकों लंबे रंगभेद विरोधी हिंसक और अहिंसक संघर्षों के बीच से उभरी। नेल्सन मंडेला के 27 वर्षों के लंबे कारावास और पार्टी कार्यकर्ताओं के बलिदान के बाद वर्ष 1994 में जब देश में पहली बार सर्वसमावेशी चुनाव हुए, तो एएनसी ने ऐतिहासिक जीत हासिल की और मंडेला देश के राष्ट्रपति बने।
इसी प्रकार लैटिन अमेरिकी देश ब्राजील में ‘वर्कर्स पार्टी’ (PT) का गठन 1980 के दशक में तानाशाही के खिलाफ संघर्ष कर रहे मजदूर यूनियनों, भूमिहीन किसानों और वामपंथी बुद्धिजीवियों के साझा आंदोलन से हुआ था। इस आंदोलन से निकले धातु मजदूर नेता लुइज इनासियो लूला दा सिल्वा ने अपनी पार्टी को मजबूत किया और वर्ष 2003 में पहली बार राष्ट्रपति पद की शपथ ली। ये दोनों ही अंतरराष्ट्रीय केस स्टडीज दर्शाती हैं कि जब आंदोलन में त्याग, अनुशासन और विशाल जमीनी नेटवर्क होता है, तो वे पार्टियां विश्व स्तर पर सत्ता का स्थायी केंद्र बन जाती हैं।
ऑक्युपाई वॉल स्ट्रीट और पाइरेट पार्टी जैसे असफल प्रयोग
हालांकि, हर बड़ा आंदोलन राजनीतिक दल में परिवर्तित होकर सत्ता तक नहीं पहुँच पाता या लंबी पारी नहीं खेल पाता। इंटरनेट की स्वतंत्रता, गोपनीयता और कॉपीराइट कानूनों में सुधार के नाम पर यूरोप में उभरी ‘पाइरेट पार्टी’ (Pirate Party) को शुरुआत में स्वीडन और जर्मनी के युवाओं का भारी समर्थन मिला था, लेकिन स्पष्ट आर्थिक और सामाजिक नीतियों के अभाव में यह पार्टी कुछ ही वर्षों में अप्रासंगिक हो गई और चुनावी राजनीति से लगभग बाहर हो गई।
इसी तरह वर्ष 2011 में अमेरिका में पूंजीवाद, कॉरपोरेट लालच और आर्थिक असमानता के खिलाफ उभरे विशाल ‘ऑक्युपाई वॉल स्ट्रीट’ (Occupy Wall Street) आंदोलन ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा था। लेकिन इस आंदोलन के नेताओं ने एक औपचारिक राजनीतिक ढांचा या दल बनाने से साफ इनकार कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप इतना बड़ा आंदोलन बिना किसी ठोस राजनीतिक बदलाव के धीरे-धीरे शांत हो गया। इटली की ‘फाइव स्टार मूवमेंट’ ने भी आंदोलन से निकलकर सत्ता में साझेदारी तो हासिल की, लेकिन आंतरिक गुटबाजी के कारण वह अपनी शुरुआती साख कायम नहीं रख सकी।
सड़क के आंदोलन को चुनावी राजनीतिक ताकत में बदलने की बुनियादी शर्तें
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि किसी भी जन-आंदोलन या छात्र आंदोलन को एक सफल राजनीतिक दल के रूप में स्थापित होने के लिए कुछ बेहद कड़े मापदंडों से गुजरना पड़ता है। सबसे पहली शर्त है कि पार्टी के पास केवल एक तात्कालिक मुद्दे या किसी व्यक्ति विशेष के विरोध के बजाय एक स्पष्ट, सर्वसमावेशी और दीर्घकालिक विचारधारा होनी चाहिए। आंदोलनकारी अक्सर एक तात्कालिक मांग पूरी होते ही बिखर जाते हैं, इसलिए समर्थकों को जोड़े रखने के लिए एक विजन डॉक्यूमेंट आवश्यक होता है।
दूसरी सबसे बड़ी चुनौती चुनावी बूथ प्रबंधन, कोष जुटाने की पारदर्शी प्रणाली और पूरे राज्य या देश में कैडर संरचना का निर्माण करना है। सड़क पर नारे लगाना आसान होता है, लेकिन चुनाव लड़ने के लिए टिकट बंटवारे के संतुलन, वित्तीय संसाधनों के प्रबंधन और मीडिया स्ट्रैटेजी की जरूरत होती है। जब कोई आंदोलनकारी पार्टी सत्ता में आती है, तो जनता की उम्मीदें आसमान पर होती हैं, ऐसे में प्रशासनिक अनुभव की कमी के कारण यदि वादे पूरे नहीं होते, तो जनता बहुत जल्द उस दल को नकार भी देती है।
सीजेपी की चुनौतियां और भविष्य का राजनीतिक खाका
वर्तमान संदर्भ में देखा जाए तो कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के रणनीतिकारों ने फिलहाल खुद को एक पूर्ण राजनीतिक दल के रूप में पेश करने का कोई औपचारिक दावा नहीं किया है। कानूनी रूप से देखा जाए तो निर्वाचन आयोग में राजनीतिक दल के पंजीकरण, प्रतीक चिह्न आवंटन और सांगठनिक नियमों की एक लंबी प्रक्रिया होती है। यद्यपि इस समूह ने जंतर-मंतर पर हजारों छात्रों को एकजुट करके और शिक्षा मंत्री का इस्तीफा करवाकर अपनी अभूतपूर्व ताकत का प्रदर्शन जरूर कर दिया है, लेकिन इस सफलता को वोट बैंक में तब्दील करना बिल्कुल अलग खेल है।
यदि सीजेपी भविष्य में चुनाव मैदान में उतरने का फैसला करती है, तो उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती छात्रों और युवाओं की इस भीड़ को एक स्थायी वोटर बेस में बदलना होगा। यदि यह आंदोलन अपने वर्तमान उभार को एक ठोस सांगठनिक ढांचे में नहीं ढाल पाता है, तो इतिहास गवाह है कि समय के साथ नेताओं के आपसी मतभेदों और संसाधनों की कमी के कारण आंदोलन की यह तेज ऊर्जा बहुत जल्द शांत हो सकती है।
Protest to Politics: भारतीय राजनीति में जन-जी (Gen-Z) और नई लहर की संभावनाएं
मौजूदा समय में भारतीय लोकतंत्र एक बहुत ही दिलचस्प दौर से गुजर रहा है। देश का एक बड़ा युवा वर्ग (Gen-Z) और मध्यम वर्ग पारंपरिक जातिगत या धर्म-आधारित राजनीति से हटकर रोजगार, शिक्षा, पारदर्शिता और जवाबदेही से जुड़े मुद्दों पर नई आवाजों की तलाश में है। सोशल मीडिया के इस दौर में किसी भी मुद्दे पर रातों-रात लाखों युवाओं को जोड़ना और आंदोलन को गति देना पहले की तुलना में काफी आसान हो गया है।
ऐसे में सीजेपी जैसे छात्र-युवा समूहों के लिए राजनीतिक क्षितिज पर नई संभावनाएं जरूर नजर आती हैं। लेकिन सफलता केवल डिजिटल ट्रेंड्स या जंतर-मंतर के जमावड़े से तय नहीं होगी। इसके लिए नेताओं को लंबी दूरी की दौड़ का धैर्य रखना होगा। भारत में आम आदमी पार्टी और तेलंगाना राष्ट्र समिति जैसी मिसालें जहाँ युवाओं को प्रेरणा देती हैं, वहीं ऑक्युपाई वॉल स्ट्रीट जैसे कई असफल प्रयास एक सबक और चेतावनी भी पेश करते हैं।
निष्कर्ष और भारतीय लोकतंत्र का संदेश
आंदोलनों से जन्म लेने वाले राजनीतिक दल अक्सर पुरानी और ढर्रे पर चल रही स्थापित व्यवस्था को सीधी चुनौती देते हैं और आम नागरिक में एक नई उम्मीद जगाते हैं। लेकिन भारतीय लोकतंत्र का इतिहास बहुत ही कड़वा और स्पष्ट संदेश देता है कि सरकार से अपनी बात मनवाना या किसी मंत्री का इस्तीफा लेना एक बात है, और खुद चुनाव जीतकर सरकार चलाना पूरी तरह से अलग खेल है।
सीजेपी और उसके युवा नेताओं (Protest to Politics) के लिए संदेश बिल्कुल साफ है कि बिना मजबूत संगठन, वित्तीय अनुशासन, सर्वसम्मत नेतृत्व और व्यापक सामाजिक आधार के कोई भी आंदोलन ज्यादा दिनों तक नहीं टिक सकता। अब यह समय और सीजेपी के शीर्ष नेतृत्व की रणनीतिक सोच तय करेगी कि वे इतिहास के सफल पृष्ठों में जगह बनाते हैं या केवल एक तात्कालिक जन-आक्रोश बनकर रह जाते हैं।
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