Brajesh Pathak E-Rickshaw Statement: ‘नौकरी के चक्कर में मत पड़ो, ई-रिक्शा चलाओ’ बयान पर विवाद
भारत टैक्सी लॉन्च कार्यक्रम में ड्राइवरों को स्वरोजगार के संदर्भ में दिया था बयान
Brajesh Pathak E-Rickshaw Statement: उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक का ई-रिक्शा और रोजगार से जुड़ा एक संक्षिप्त वीडियो इन दिनों सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर तेजी से वायरल हो रहा है। एक्स (पूर्व में ट्विटर), फेसबुक और इंस्टाग्राम पर प्रसारित इस वीडियो क्लिप में डिप्टी सीएम को यह कहते हुए सुना जा सकता है कि “नौकरी के चक्कर में मत पड़ो, ई-रिक्शा चलाओ और सम्मान से पैसा कमाओ।” इस 20 से 30 सेकंड की क्लिप के सामने आते ही डिजिटल गलियारों में युवाओं और विपक्षी दलों के बीच तीखी बहस छिड़ गई। खासकर उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे युवाओं और सरकारी भर्ती परीक्षाओं की तैयारी में जुटे अभ्यर्थियों ने इसे लेकर नाराजगी जताई कि सरकार रोजगार देने के स्थान पर शिक्षित युवाओं को ई-रिक्शा चलाने की सलाह दे रही है।
हालांकि, किसी भी वायरल सामग्री की भांति इस बयान की जमीनी पड़ताल और संपूर्ण संदर्भ को समझना आवश्यक है। प्रमुख समाचार माध्यमों और फैक्ट-चेकर्स द्वारा की गई विस्तृत पड़ताल में यह तथ्य पुष्ट हुआ है कि वीडियो पूरी तरह प्रामाणिक है, लेकिन सोशल मीडिया पर इसे इसके मूल संदर्भ से काटकर प्रसारित किया जा रहा है। वास्तव में यह संबोधन किसी छात्र सम्मेलन या रोजगार मेले का नहीं, बल्कि लखनऊ में आयोजित ‘भारत टैक्सी’ योजना के आधिकारिक शुभारंभ का था, जहां उपस्थित जनसमूह में मुख्य रूप से टैक्सी चालक, ऑटो चालक और परिवहन क्षेत्र से जुड़े स्वरोजगारी शामिल थे।
Brajesh Pathak E-Rickshaw Statement: ‘भारत टैक्सी’ के मंच से क्या बोले थे डिप्टी सीएम?
यह पूरा घटनाक्रम लखनऊ में आयोजित ‘भारत टैक्सी’ ऐप और योजना के लोकार्पण कार्यक्रम से जुड़ा हुआ है। इस राजकीय कार्यक्रम में प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित थे, जबकि दोनों उपमुख्यमंत्री और परिवहन विभाग के शीर्ष अधिकारी मंच पर आसीन थे। सभागार में भारी संख्या में वे चालक मौजूद थे जो इस नई सहकारी टैक्सी सेवा से जुड़कर अपना वाहन चलाने की योजना बना रहे थे।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने परिवहन क्षेत्र में कार्यरत चालकों के संघर्ष और उनकी दिनचर्या पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि अक्सर लोग दूसरों की गाड़ियों पर ड्राइवर की नौकरी करते हैं, जिसमें 12 से 14 घंटे मालिक की शर्तों, डांट और सीमित पगार पर निर्भर रहना पड़ता है। इसके विपरीत, यदि कोई व्यक्ति सरकारी योजनाओं, ऋण सहायता और सब्सिडी का लाभ उठाकर स्वयं का ई-रिक्शा या ऑटो खरीदता है, तो वह किसी का ‘नौकर’ बनने के बजाय स्वयं का ‘मालिक’ बनता है।
‘समय की स्वतंत्रता’ और स्वरोजगार के संदर्भ में दिया गया था तर्क
डिप्टी सीएम ने अपने भाषण में स्वरोजगार के व्यावहारिक लाभों को समझाते हुए उदाहरण दिया था। उन्होंने उपस्थित चालकों से कहा कि यदि आपके पास अपना वाहन है, तो आप अपने काम के घंटे स्वयं निर्धारित कर सकते हैं। दोपहर में भोजन करने के लिए घर आ सकते हैं, परिवार की आकस्मिक आवश्यकता पर समय दे सकते हैं और अपनी सुविधानुसार क्षेत्र चुनकर संचालन कर सकते हैं।
इसी तर्क को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने चालकों को प्रेरित करने वाले लहजे में कहा था कि दूसरों की नौकरी करने की पराधीनता में उलझने से कहीं बेहतर है कि अपनी कमाई का साधन खुद खड़ा किया जाए। सोशल मीडिया पर प्रसारित क्लिप में केवल उस हिस्से को निकाल लिया गया जिसमें वे नौकरी न करने और ई-रिक्शा चलाने की बात कह रहे हैं, जबकि उसके आगे और पीछे का वह हिस्सा गायब कर दिया गया जिसमें वे ड्राइवरों की कार्यशैली और समय की स्वायत्तता का विश्लेषण कर रहे थे।
युवाओं और राजनीतिक हल्कों में क्यों भड़का असंतोष?
वीडियो के संदर्भ से कट जाने के कारण इसका जो संदेश बाहर गया, उसने प्रदेश के बेरोजगार युवाओं की संवेदनशील नसों को छू लिया। उत्तर प्रदेश में हर वर्ष लाखों युवा यूपीपीएससी (UPPSC), यूपीएसएसएससी (UPSSSC), पुलिस भर्ती, शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) और रेलवे जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं में सम्मिलित होते हैं। कई वर्षों तक कोचिंग और तैयारी करने वाले छात्रों ने इस वीडियो को इस रूप में लिया मानो शासन उनकी शैक्षणिक योग्यताओं को दरकिनार कर उन्हें ई-रिक्शा चलाने की नसीहत दे रहा हो।
विपक्षी दलों ने भी इस मौके को हाथ से जाने नहीं दिया और राज्य सरकार की रोजगार नीतियों पर सवाल खड़े करने शुरू कर दिए। विपक्ष का आरोप था कि रिक्त पदों को भरने और नई नौकरियां सृजित करने के बजाय सत्तारूढ़ दल के शीर्ष नेता युवाओं को अनौपचारिक और श्रम-प्रधान कार्यों की ओर धकेल रहे हैं। इस राजनीतिक बयानबाजी ने सोशल मीडिया पर इस मुद्दे को घंटों तक ट्रेंडिंग विषय बनाए रखा।
ई-रिक्शा और शहरी अर्थव्यवस्था: स्वरोजगार का एक प्रमुख स्तंभ
यदि आर्थिक दृष्टिकोण से देखा जाए, तो भारत के टियर-2 और टियर-3 शहरों में ई-रिक्शा पर्यावरण-अनुकूल अंतिम छोर की कनेक्टिविटी (लास्ट-माइल कनेक्टिविटी) का सबसे बड़ा साधन बनकर उभरा है। केंद्र सरकार की पीएम मुद्रा योजना और राज्य सरकार की विभिन्न सब्सिडी योजनाओं के माध्यम से लाखों गैर-कुशल और अर्ध-कुशल व्यक्तियों को इससे दैनिक आजीविका प्राप्त हुई है।
कम लागत, न्यूनतम मेंटेनेंस और शून्य ईंधन खर्च (पेट्रोल-डीजल की तुलना में) के चलते एक सामान्य ई-रिक्शा चालक प्रतिदिन ₹800 से ₹1,200 तक की शुद्ध आय अर्जित कर लेता है। सरकारी मंचों से अक्सर इस मॉडल को असंगठित क्षेत्र के कामगारों के सशक्तिकरण के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। ब्रजेश पाठक का भाषण भी इसी आर्थिक सशक्तिकरण की भावना से प्रेरित था, किंतु शब्दों के चयन और क्लिप के संपादन ने इसे विवाद का विषय बना दिया।
Brajesh Pathak E-Rickshaw Statement: संदर्भ के साथ ही समझी जा सकती है किसी बयान की वास्तविकता
डिजिटल सूचना और सोशल मीडिया रील्स के वर्तमान युग में यह घटनाक्रम इस बात का जीवंत उदाहरण है कि कैसे किसी प्रामाणिक वीडियो के 15 सेकंड का चयन पूरे विमर्श की दिशा बदल सकता है। डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक का बयान ड्राइवरों के एक विशिष्ट कार्यक्रम में स्वरोजगार को दूसरों की मातहती में नौकरी करने से श्रेष्ठ बताने के उद्देश्य से दिया गया था।
इसे प्रदेश के सभी डिग्रीधारी युवाओं या सिविल सेवा की तैयारी कर रहे छात्रों के लिए सामान्य नीतिगत संदेश के रूप में व्याख्यायित करना वस्तुपरक और तथ्यात्मक रूप से अनुचित होगा। यद्यपि सार्वजनिक पदों पर बैठे जनप्रतिनिधियों से भी यह अपेक्षा की जाती है कि वे रोजगार जैसे अत्यधिक संवेदनशील विषय पर मंच और शब्दों का चयन करते समय अतिरिक्त सावधानी बरतें, ताकि उनके वक्तव्यों का गलत अर्थ निकालकर युवाओं में भ्रम न फैलाया जा सके।
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