Vijay Mallya SBI Dispute: विजय माल्या-SBI विवाद पर बॉम्बे हाईकोर्ट की बड़ी टिप्पणी, कहा- अब आगे बढ़ने का समय, अर्थव्यवस्था पर न पड़े असर

बॉम्बे हाईकोर्ट ने ईडी से संपत्तियों और जांच की स्थिति पर अपडेटेड रिपोर्ट मांगी है

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Vijay Mallya SBI Dispute: भगोड़े कारोबारी विजय माल्या और भारतीय स्टेट बैंक (SBI) की अगुवाई वाले बैंकों के कंसोर्टियम के बीच सालों से चल रहे संपत्ति विवाद पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने साफ शब्दों में कहा है कि इस तरह के व्यावसायिक विवादों को अब समाप्त कर आगे बढ़ना चाहिए, वरना देश की अर्थव्यवस्था और व्यापारिक संबंधों पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। न्यायमूर्ति मिलिंद जाधव की एकल पीठ ने इस मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ED) से जांच की वर्तमान स्थिति और कुर्क की गई संपत्तियों पर एक विस्तृत रिपोर्ट मांगी है।

माल्या द्वारा 2020 में दायर की गई याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने यह रुख अपनाया। याचिका में विशेष अदालत के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें ईडी द्वारा कुर्क की गई संपत्तियों को कर्ज वसूली के लिए बैंकों को सौंपने की अनुमति दी गई थी। अदालत ने जोर देकर कहा कि लगभग एक दशक से लंबित इस नागरिक विवाद को अब किसी तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाना बेहद जरूरी है।

Vijay Mallya SBI Dispute: कोर्ट की सख्त टिप्पणी, अर्थव्यवस्था के हित में विवाद सुलझाना जरूरी

न्यायमूर्ति मिलिंद जाधव ने कहा कि व्यावसायिक विवादों का समाधान अक्सर उसी विवाद के भीतर मौजूद होता है और संबंधित पक्षों को व्यावहारिक रुख अपनाते हुए आगे बढ़ना चाहिए। अदालत ने रेखांकित किया कि यदि पक्षकार व्यावसायिक विवादों को सुलझाने के बजाय उन्हें लंबे समय तक खींचते रहेंगे, तो इसका सीधा और नकारात्मक असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।

अदालत ने ईडी के उप निदेशक को निर्देश दिया कि वे माल्या के खिलाफ चल रही जांच और कुर्क की गई सभी संपत्तियों के ब्यौरे के साथ अद्यतन (updated) रिपोर्ट पेश करें। इसके साथ ही पीठ ने स्पष्ट किया कि नागरिक या व्यावसायिक विवाद के खत्म होने से आपराधिक कार्यवाही पर कोई असर नहीं पड़ेगा। मनी लॉन्ड्रिंग और धोखाधड़ी जैसे आपराधिक मामलों को उनके तार्किक अंत तक ले जाना कानून के तहत अनिवार्य है।

यह टिप्पणी तब आई जब माल्या के वकील ने अदालत को सूचित किया कि 2020 की याचिका अब अप्रासंगिक (redundant) हो चुकी है, क्योंकि अधिकांश संपत्तियों को पहले ही अटैच कर उनका निपटारा किया जा चुका है। अदालत ने ईडी से यह भी स्पष्ट करने को कहा है कि क्या बैंकों के साथ वसूली या समझौते की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है।

माल्या के वकील का दावा: मूल कर्ज से अधिक 15,000 करोड़ रुपये की हो चुकी है वसूली

माल्या की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता अमित देसाई ने अदालत में तर्क दिया कि यह याचिका उस समय दायर की गई थी जब समझौते की बातचीत चल रही थी और कुछ विशिष्ट संपत्तियों को सुरक्षा देने की मांग की गई थी। पिछले छह वर्षों में स्थितियां पूरी तरह बदल चुकी हैं और अधिकांश संपत्तियों का इस्तेमाल बैंकों द्वारा किया जा चुका है।

देसाई ने दावा किया कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने माल्या से लगभग 15,000 करोड़ रुपये की वसूली कर ली है, जबकि मूल दावा 6,203.35 करोड़ रुपये का था (जिसमें बाद में ब्याज जोड़ा गया था)। आरबीआई (RBI) की ऑडिट रिपोर्ट का हवाला देते हुए उन्होंने दलील दी कि यह मामला विशुद्ध रूप से एक एयरलाइन का ‘बिजनेस फेलियर’ था। बैंकों द्वारा मूल राशि से कहीं अधिक वसूल किए जाने के बाद इस मामले को अदालतों में लंबित रखना उचित नहीं है।

विवाद की पृष्ठभूमि और कानूनी सफर

विजय माल्या और उनकी बंद हो चुकी कंपनी ‘किंगफिशर एयरलाइंस’ से जुड़े इस मामले की जड़ें काफी पुरानी हैं। कंपनी के डूबने के बाद एसबीआई के नेतृत्व में कई बैंकों ने कर्ज वसूली की कानूनी कार्यवाही शुरू की। माल्या पर व्यक्तिगत गारंटी देने का भी आरोप था।

मार्च 2016 में माल्या भारत छोड़कर ब्रिटेन चले गए, जिसके बाद भारतीय अदालतों ने उन्हें ‘भगोड़ा आर्थिक अपराधी’ घोषित कर दिया। इसके बाद प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने उनकी भारत स्थित अरबों रुपये की संपत्तियों को कुर्क करना शुरू किया। विशेष अदालत ने कुर्क संपत्तियों को बैंकों के कंसोर्टियम को सौंपने की इजाजत दी ताकि वे इसे नीलाम कर अपना बकाया वसूल सकें। माल्या ने इसी आदेश को 2020 में बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

ईडी की भूमिका और आगे की कानूनी दिशा

हाईकोर्ट द्वारा जारी नोटिस के बाद अब प्रवर्तन निदेशालय की रिपोर्ट इस पूरे मामले में निर्णायक भूमिका निभाएगी। अदालत यह देखना चाहती है कि क्या बैंकों का पूरा बकाया वसूल हो चुका है और क्या इस नागरिक याचिका को बंद किया जा सकता है।

तथापि, कोर्ट ने यह पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है कि प्रत्यर्पण (extradition) और मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े आपराधिक मामले अपनी गति से चलते रहेंगे। आपराधिक जवाबदेही को नागरिक देनदारियों के निपटारे से अलग रखा जाएगा।

व्यावसायिक विवादों का अर्थव्यवस्था पर असर

बॉम्बे हाईकोर्ट की यह टिप्पणी केवल विजय माल्या के मामले तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश के बैंकिंग और कॉरपोरेट सेक्टर के लिए एक बड़ा संदेश है। लंबे समय तक चलने वाले व्यावसायिक मुकदमों के कारण बैंकों के संसाधन और पूंजी सालों तक फंसी रहती है, जिससे बाजार में नए कर्ज देने की क्षमता प्रभावित होती है। इसके अलावा कानूनी प्रक्रियाओं में लगने वाला समय व खर्च दोनों पक्षों पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ डालता है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश के व्यापारिक माहौल (Ease of Doing Business) को लेकर भी नकारात्मक संदेश जाता है।

Vijay Mallya SBI Dispute: निष्कर्ष और आगे की राह

बॉम्बे हाईकोर्ट की इस पहल से यह संकेत मिलता है कि न्यायपालिका अब लंबे समय से लंबित व्यावसायिक विवादों को जल्द से जल्द समाप्त करने के पक्ष में है ताकि अर्थव्यवस्था पर अनावश्यक दबाव न पड़े।

मामले की अगली सुनवाई ईडी की विस्तृत रिपोर्ट आने के बाद होगी। यदि ईडी यह पुष्टि करता है कि बैंकों की वसूली प्रक्रिया पूरी हो चुकी है, तो हाईकोर्ट माल्या की इस याचिका को समाप्त कर सकता है। इससे जहां बैंकों को अपने कानूनी मामलों को समेटने में मदद मिलेगी, वहीं आपराधिक जांच एजेंसियां अपना पूरा ध्यान माल्या के प्रत्यर्पण और आपराधिक मुकदमों पर केंद्रित कर सकेंगी।

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