Basmati Rice GI Tag: बासमती चावल के GI टैग को लेकर बढ़ा विवाद, नई कानूनी टीम पर एक्सपोर्टर्स ने खड़े किए सवाल
Basmati Rice GI Tag: बासमती चावल के GI टैग को लेकर बढ़ा विवाद, नई कानूनी टीम पर एक्सपोर्टर्स ने खड़े किए सवाल
Basmati Rice GI Tag: भारत की शान ‘बासमती चावल’ की वैश्विक पहचान पर अब कानूनी संकट के बादल मंडराते दिख रहे हैं। हाल ही में एपेडा (APEDA) द्वारा जीआई (GI) और बौद्धिक संपदा अधिकारों से जुड़े मामलों को संभालने के लिए एक नई लॉ फर्म की नियुक्ति की गई है, जिस पर चावल निर्यातकों ने तीखे सवाल खड़े कर दिए हैं। निर्यातकों का कहना है कि इस फैसले से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का पक्ष कमजोर पड़ सकता है और इसका सीधा लाभ पड़ोसी देश पाकिस्तान को मिल सकता है। वाणिज्य मंत्रालय तक पहुंची इस शिकायत ने सरकारी विभागों और उद्योग जगत के बीच एक नया विवाद छेड़ दिया है।
देश के दो बड़े राइस एक्सपोर्टर संगठनों, ऑल इंडिया राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन (AIREA) और द बासमती राइस मिलर्स एंड एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन (पंजाब), ने वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल और एपेडा चेयरमैन अभिषेक देव को पत्र लिखकर अपनी नाराजगी जाहिर की है। निर्यातकों की मुख्य चिंता यह है कि लॉ फर्म का चुनाव बिना किसी उचित सलाह-मशविरे के किया गया है, और इससे हितों के टकराव जैसी गंभीर स्थिति पैदा हो रही है। अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या यह कानूनी पेंच वाकई भारत की बासमती के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़ी मुसीबत बन सकता है?
Basmati Rice GI Tag: क्या है हितों के टकराव का पूरा मामला?
निर्यातकों का आरोप है कि जिस लॉ फर्म को बासमती के हितों की रक्षा के लिए चुना गया है, उसका अतीत में रुख संदिग्ध रहा है। दरअसल, मध्य प्रदेश के कुछ क्षेत्रों को बासमती जीआई क्षेत्र में शामिल करने को लेकर लंबे समय से विवाद चल रहा है। एपेडा और भारत सरकार का आधिकारिक रुख हमेशा से यही रहा है कि बासमती केवल इंडो-गंगेटिक मैदानों में ही पैदा होता है। लेकिन, आरोप है कि जिस लॉ फर्म को अब नियुक्त किया गया है, उसने पूर्व में उन याचिकाकर्ताओं का प्रतिनिधित्व किया था जो मध्य प्रदेश को भी बासमती क्षेत्र में जोड़ने की मांग कर रहे थे।
निर्यातकों का तर्क है कि यदि सरकार का पक्ष रखने वाली फर्म ही सरकार के स्थापित स्टैंड के खिलाफ रही है, तो अंतरराष्ट्रीय अदालतों या यूरोपीय संघ में भारत का दावा कैसे मजबूत रह पाएगा? लॉ फर्म का यह तर्क कि जीआई निर्धारण में ऐतिहासिक पहचान के बजाय कृषि जलवायु कारकों को देखा जाना चाहिए, भारत के उस तर्क के विपरीत है जो सदियों से गंगा के मैदानी इलाकों के महत्व पर आधारित है।
पाकिस्तान को कैसे मिल सकता है फायदा?
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बासमती जीआई आवेदन को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच मुकाबला काफी पुराना है। यूरोपीय संघ में पाकिस्तान लगातार भारत के आवेदन का विरोध करता आया है। निर्यातकों को डर है कि यदि भारत अपनी ही भौगोलिक सीमाओं और बासमती की परिभाषा को लेकर अलग-अलग बातें करता दिखेगा, तो पाकिस्तान इसे एक ढाल की तरह इस्तेमाल करेगा।
पाकिस्तान अपनी दलीलों में यह कह सकता है कि भारत खुद यह सुनिश्चित नहीं है कि बासमती कहां पैदा होता है और कहां नहीं। विशेषज्ञों का मानना है कि बासमती की अंतरराष्ट्रीय साख उसकी विशिष्ट भौगोलिक पहचान से जुड़ी है। यदि कानूनी स्तर पर इस पहचान को कमजोर किया गया, तो आने वाले समय में वैश्विक बाजार में बासमती चावल की कीमत और मांग दोनों पर असर पड़ सकता है, जिससे पाकिस्तान को अपनी निर्यात क्षमता बढ़ाने का मौका मिल जाएगा।
Basmati Rice GI Tag: एपेडा और बोर्ड के नियमों पर उठे सवाल
इस नियुक्ति को लेकर केवल लॉ फर्म ही नहीं, बल्कि एपेडा की चयन प्रक्रिया पर भी उंगलियां उठ रही हैं। राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन ने बासमती एक्सपोर्ट डेवलपमेंट फाउंडेशन (BEDF) के नियमों का हवाला दिया है। उनका कहना है कि नियम 19.2.21 के तहत बोर्ड को सलाहकारों और कंसल्टेंट्स की नियुक्ति का अधिकार है। चूंकि यह फर्म एक रणनीतिक सलाहकार की भूमिका निभाएगी, इसलिए चयन प्रक्रिया में बोर्ड की भागीदारी अनिवार्य होनी चाहिए थी, जिसे कथित तौर पर नजरअंदाज किया गया है।
एपेडा के सूत्रों का हालांकि यही कहना है कि लॉ फर्म का चयन एक विशेषज्ञ समिति द्वारा पूरी तरह से टेंडर प्रक्रिया का पालन करते हुए किया गया है। लेकिन निर्यातकों का मानना है कि यह मामला सामान्य कानूनी लड़ाई से कहीं बड़ा है। यह देश की एक बड़ी कृषि-सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण का मामला है, जिसमें किसी भी स्तर पर चूक की गुंजाइश नहीं होनी चाहिए।
Basmati Rice GI Tag: अब आगे क्या होगा?
निर्यातकों ने साफ तौर पर कहा है कि वे किसी विशेष फर्म के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन उन्हें संस्थान के प्रशासन और शेयरहोल्डर्स के भरोसे की चिंता है। अब गेंद वाणिज्य मंत्रालय के पाले में है। मंत्रालय को यह तय करना होगा कि वह निर्यातकों की इन चिंताओं को कितनी गंभीरता से लेता है। यदि सरकार इस मुद्दे पर अपनी रणनीति को पारदर्शी नहीं बनाती, तो अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं।
बासमती चावल भारत का गौरव है। यह न केवल लाखों किसानों की आजीविका का साधन है, बल्कि विदेशी मुद्रा का एक बड़ा स्रोत भी है। ऐसे में कानूनी और प्रशासनिक स्तर पर किसी भी तरह की विसंगति देश के इस बड़े निर्यात उद्योग को नुकसान पहुंचा सकती है। फिलहाल, सभी की निगाहें सरकार के अगले कदम पर टिकी हैं कि क्या वह इस नियुक्ति की समीक्षा करेगी या फिर इसी फर्म के साथ आगे बढ़ने का फैसला बरकरार रखेगी।
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