Baba Bageshwar Rath Yatra 2026: बाबा बागेश्वर की 11 अक्टूबर से रथ यात्रा, 500 KM के सफर का दावा
बागेश्वर धाम की आधिकारिक साइट पर 11 से 19 अक्टूबर तक रथ यात्रा का कार्यक्रम दर्ज है
Baba Bageshwar Rath Yatra 2026: मध्य प्रदेश के सुप्रसिद्ध धार्मिक तीर्थ बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने सनातन जागरण और भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने के अपने संकल्प को गति देने के लिए एक बड़ी घोषणा की है। उन्होंने आगामी पावन शारदीय नवरात्रि के दौरान पांच दिवसीय व्यापक रथ यात्रा निकालने का निर्णय लिया है। यह ऐतिहासिक रथ यात्रा 11 अक्टूबर से प्रारंभ होकर निरंतर पांच दिनों तक संचालित होगी, जिसके अंतर्गत बुंदेलखंड अंचल के पांच प्रमुख जनपदों में लगभग 500 किलोमीटर का विशाल मार्ग तय किया जाएगा।
बाबा बागेश्वर लंबे समय से देश-विदेश में अपनी रामकथाओं और दिव्य दरबारों के माध्यम से जातिगत भेदभाव को मिटाकर सनातन संस्कृति के संरक्षण और हिंदू राष्ट्र की अवधारणा पर बल देते रहे हैं। नवरात्रि के शक्ति-पर्व पर आयोजित होने वाली इस रथ यात्रा का मुख्य उद्देश्य जन-जन में राष्ट्रभक्ति, सामाजिक समरसता और धार्मिक चेतना का संचार करना है। इस यात्रा में देश के विभिन्न अखाड़ों, मठों और पीठों से जुड़े सैकड़ों पूज्य साधु-संत भी सम्मिलित होंगे, जिससे आयोजन को व्यापक आध्यात्मिक और सामाजिक संबल प्राप्त होगा।
Baba Bageshwar Rath Yatra 2026: पांच जिलों से होकर गुजरेगी 500 किलोमीटर की यात्रा
यह पांच दिवसीय रथ यात्रा मध्य प्रदेश के पांच प्रमुख जिलों—पन्ना, छतरपुर, सागर, दमोह और टीकमगढ़—के विभिन्न नगरों व कस्बों से होकर गुजरेगी। यात्रा का औपचारिक शुभारंभ छतरपुर जनपद अंतर्गत स्थित तीर्थ स्थल गढ़ा से होगा। गढ़ा से प्रस्थान कर यह यात्रा पन्ना जिले के ऐतिहासिक अजयगढ़ पहुंचेगी। इसके उपरांत पन्ना शहर, अमानगंज और पवई होते हुए काफिला सागर जिले की सीमाओं में प्रवेश करेगा।
सागर में जनसंवाद और दर्शन के पश्चात यात्रा दमोह पहुंचेगी, जहां हटा तहसील से गुजरते हुए यह टीकमगढ़ की ओर अग्रसर होगी। टीकमगढ़ के विभिन्न ग्रामीण व शहरी क्षेत्रों से संपर्क स्थापित करते हुए रथ यात्रा पुनः अपने उद्गम स्थल गढ़ा में संपन्न होगी। संपूर्ण यात्रा विशेष रूप से सुसज्जित बसों और वाहनों के काफिले के रूप में निकाली जाएगी, ताकि निर्धारित समय सीमा में अधिकतम जनपदों के दूरदराज क्षेत्रों तक सनातन एकता का संदेश पहुंचाया जा सके।
रात्रि विश्राम पर होगी स्थानीय समस्याओं की सुनवाई, हवन और हिंदू राष्ट्र की शपथ
रथ यात्रा केवल सड़क मार्ग से गुजरने तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि इसके साथ गहन आध्यात्मिक और व्यावहारिक संवाद के कार्यक्रम भी जोड़े गए हैं। यात्रा के दौरान निर्धारित किए गए प्रत्येक रात्रि विश्राम स्थल पर श्रद्धालुओं के लिए विशेष आध्यात्मिक सत्र आयोजित किए जाएंगे। प्रत्येक पड़ाव पर सामूहिक श्री हनुमान चालीसा का सस्वर पाठ, राष्ट्र कल्याण के लिए आहुतियों सहित वैदिक महायज्ञ (हवन) और उपस्थित जनसमूह को हिंदू राष्ट्र के निर्माण व सामाजिक समरसता की औपचारिक शपथ दिलवाई जाएगी।
इसके साथ ही धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री रात्रि विश्राम के दौरान स्थानीय नागरिकों और क्षेत्रीय भक्तों की व्यक्तिगत, सामाजिक व पारिवारिक समस्याओं को भी सुनेंगे। बागेश्वर धाम की पारंपरिक कार्यशैली के अनुरूप चुनिंदा अर्जियों पर संतों के सान्निध्य में समाधान और मार्गदर्शन प्रदान किया जाएगा। रात्रि चौपालों के जरिए समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति से सीधा संपर्क स्थापित करना इस यात्रा का प्रमुख सामाजिक पक्ष है।
सैकड़ों साधु-संतों की सहभागिता: सामाजिक समरसता और छुआछूत उन्मूलन पर जोर
इस 500 किलोमीटर लंबी यात्रा को विराट स्वरूप देने के लिए बागेश्वर धाम प्रबंधन द्वारा देश भर के प्रमुख संत समाज को आमंत्रित किया गया है। यात्रा के पूरे मार्ग में विभिन्न अखाड़ों के महामंडलेश्वर, नागा संन्यासी, रामानंदी और वैष्णव संप्रदायों के वरिष्ठ संत शामिल रहेंगे। धीरेंद्र शास्त्री का स्पष्ट संदेश रहा है कि सनातन धर्म की सबसे बड़ी कमजोरी उसका जातियों, उपजातियों और छुआछूत के बंधनों में बंटना है।
संतों की इस सामूहिक उपस्थिति का ध्येय यही है कि समाज के सभी वर्गों—विशेष रूप से पिछड़े और वंचित तबकों—को यह विश्वास दिलाया जाए कि सनातन परंपरा में कोई छोटा या बड़ा नहीं है। सभी जातियों को एक सूत्र में पिरोकर एक सशक्त, संगठित और समरस हिंदू समाज का निर्माण करना ही इस अभियान की मूल आधारशिला है।
पिछली यात्राओं का अनुभव: ‘हिंदू जोड़ो’ और ‘सनातन एकता पदयात्रा’ की सफलता
पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री द्वारा समाज को जाग्रत करने के लिए निकाली जाने वाली यह पहली यात्रा नहीं है। इससे पूर्व नवंबर 2024 में उन्होंने 160 किलोमीटर लंबी नौ दिवसीय ‘हिंदू जोड़ो पदयात्रा’ निकाली थी, जो 21 से 29 नवंबर 2024 तक संचालित हुई थी। उस पदयात्रा के माध्यम से उन्होंने बुंदेलखंड के गांवों में पैदल चलकर हिंदुओं को जाति-पाति के संकीर्ण दायरे से बाहर निकलने का आह्वान किया था।
इसके पश्चात नवंबर 2025 में उन्होंने मध्य प्रदेश के छतरपुर स्थित आद्य कात्यायनी मंदिर से लेकर उत्तर प्रदेश के पावन धाम वृंदावन स्थित श्री बांके बिहारी मंदिर तक दस दिवसीय ऐतिहासिक ‘सनातन एकता पदयात्रा’ का सफल संचालन किया था। तीन राज्यों के भू-भाग से होकर गुजरी उस पदयात्रा में लाखों भक्तों ने सहभागिता की थी और सात पावन संकल्प लिए गए थे, जिनमें सामाजिक समरसता, हिंदू राष्ट्र निर्माण, गौमाता का संरक्षण और यमुना नदी की स्वच्छता का संकल्प प्रमुख था। आगामी 11 अक्टूबर से शुरू होने वाली यह रथ यात्रा उन्हीं ऐतिहासिक संकल्पों को ग्रामीण स्तर पर और अधिक सुदृढ़ करने की दिशा में अगला ठोस कदम है।
नवरात्रि की शक्ति उपासना के बीच राष्ट्र चेतना का शंखनाद
शारदीय नवरात्रि को सनातन परंपरा में मां भगवती दुर्गा की नौ रूपों में शक्ति आराधना का परम पावन पर्व माना जाता है। धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने इस विशिष्ट कालखंड का चयन इसलिए किया है क्योंकि यह समय समाज में आध्यात्मिक ऊर्जा, शुचिता और नवचेतना के संचार का होता है। शक्ति की उपासना के इस माहौल में सामाजिक एकता का संदेश जनमानस के हृदय में सहजता से स्थापित हो सकेगा।
बाबा बागेश्वर ने अपने वक्तव्यों में बार-बार रेखांकित किया है कि हिंदू राष्ट्र की उनकी मांग किसी अन्य पंथ या समुदाय के विरोध पर आधारित नहीं है, बल्कि यह सनातन जीवन मूल्यों, सांस्कृतिक धरोहर और राष्ट्रीय संप्रभुता के संरक्षण का एक सकारात्मक अभियान है। बुंदेलखंड के इन पांच जनपदों में बागेश्वर धाम के प्रति अटूट आस्था को देखते हुए प्रशासन और पुलिस तंत्र भी इस विशाल आयोजन के सुगम संचालन हेतु सुरक्षा और यातायात प्रबंधन की प्रारंभिक तैयारियों में जुट गया है।
Baba Bageshwar Rath Yatra 2026: निष्कर्ष
11 अक्टूबर से शुरू होकर 500 किलोमीटर की परिधि में निकलने वाली यह पांच दिवसीय रथ यात्रा मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड अंचल में सनातन जागरण और सामाजिक समरसता का एक नया अध्याय लिखने के लिए तैयार है। पन्ना, छतरपुर, सागर, दमोह और टीकमगढ़ के ग्रामीण व नगरीय जनजीवन को संतों के सान्निध्य, हनुमान चालीसा के पाठ और राष्ट्रभक्ति के संकल्पों से जोड़ना इस यात्रा की सबसे बड़ी शक्ति है। जातिगत दूरियों को मिटाकर भारत को वैचारिक और सांस्कृतिक रूप से हिंदू राष्ट्र के गौरवमय स्वरूप में पुनः प्रतिष्ठित करने के धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के इस अभियान पर अब पूरे देश की नजरें टिकी हुई हैं।
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