Atlantic Niña vs El Niño: क्या अटलांटिक नीना कम कर सकती है एल नीनो का असर?

अटलांटिक नीना और El Niño की टक्कर से चक्रवात व मानसून पर क्या असर पड़ेगा, जानें विज्ञान

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Atlantic Niña vs El Niño: वैश्विक मौसम तंत्र इस समय दो विपरीत समुद्री और वायुमंडलीय परिघटनाओं के दुर्लभ टकराव का गवाह बन रहा है। एक ओर जहां प्रशांत महासागर (Pacific Ocean) में एक अत्यंत शक्तिशाली अल नीनो (El Niño) सक्रिय है, वहीं दूसरी ओर अटलांटिक महासागर में इसके ठीक विपरीत स्वभाव वाली अटलांटिक नीना (Atlantic Niña) के उभरने के पुख्ता संकेत मिले हैं। जलवायु वैज्ञानिकों और मौसम विशेषज्ञों के लिए यह स्थिति कौतूहल और गहन अध्ययन का विषय बन गई है, क्योंकि दोनों प्रमुख महासागरों में एक ही समय पर विकसित हो रहे ये विपरीत तापमान पैटर्न वैश्विक वायुमंडलीय परिसंचरण (Atmospheric Circulation) को अप्रत्याशित रूप से प्रभावित कर सकते हैं।

सामान्य समझ में अल नीनो और ला नीना का संबंध केवल प्रशांत महासागर से माना जाता है, किंतु अटलांटिक महासागर में भी इसी तरह का एक थर्मल चक्र सक्रिय रहता है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) और अमेरिकी एजेंसी एनओएए (NOAA) के अनुसार, दोनों महासागरों की यह परस्पर क्रिया जहां एक तरफ अटलांटिक बेसिन में चक्रवातों की तीव्रता को दबाकर तटीय क्षेत्रों को कुछ राहत दे सकती है, वहीं दूसरी तरफ भारतीय उपमहाद्वीप में कमजोर मानसून और कृषि संकट जैसी चिंताओं को पूरी तरह खत्म करने में असमर्थ है।

Atlantic Niña vs El Niño: प्रशांत महासागर में सुपर El Niño की सक्रियता

वैश्विक स्तर पर मौसम के असंतुलन का सबसे बड़ा कारण प्रशांत महासागर का असामान्य रूप से गर्म होना है। वर्ष 2026 में सक्रिय हुआ अल नीनो लगातार सशक्त होकर ‘मजबूत से अत्यधिक मजबूत’ श्रेणी में प्रवेश कर चुका है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन के ताजा बुलेटिन के अनुसार, इस अल नीनो घटना के फरवरी 2027 तक निरंतर सक्रिय रहने की संभावना लगभग 90 प्रतिशत से अधिक है।

अल नीनो की स्थिति में मध्य और पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर की सतह का जल सामान्य तापमान से कई डिग्री अधिक गर्म हो जाता है। यह विशाल तापीय विसंगति वैश्विक वायुमंडलीय दबाव और व्यापारिक पवनों (Trade Winds) को अस्त-व्यस्त कर देती है। इसके चलते दुनिया के कई हिस्सों में रिकॉर्ड तोड़ गर्मी, भीषण सूखा, वनाग्नि और कुछ अन्य क्षेत्रों में विनाशकारी बाढ़ की घटनाएं दर्ज की जा रही हैं।

Atlantic Niña क्या है? जानिए समुद्र के ठंडे होने का पूरा विज्ञान

अटलांटिक नीना मूलतः अटलांटिक महासागर के भूमध्यरेखीय भाग में समुद्र की सतह के तापमान (SST) के सामान्य से काफी नीचे चले जाने की स्थिति है। जिस प्रकार प्रशांत महासागर में ला नीना ठंडक का प्रतीक है, उसी प्रकार अटलांटिक बेसिन में अल नीनो के विपरीत ठंडे चरण को अटलांटिक नीना कहा जाता है।

यह प्रक्रिया तब शुरू होती है जब भूमध्यरेखीय अटलांटिक में दक्षिण-पूर्वी व्यापारिक पवनें अचानक अप्रत्याशित रूप से तीव्र हो जाती हैं। इन तेज हवाओं के कारण समुद्र की ऊपरी गर्म जल परत पश्चिम की ओर खिसक जाती है, जिससे समुद्र की गहराइयों से ठंडा और पोषक तत्वों से भरपूर पानी सतह पर आने लगता है। जल विज्ञान में इस प्रक्रिया को अपवेलिंग (Upwelling) कहा जाता है। इस तीव्र अपवेलिंग के चलते भूमध्यरेखीय अटलांटिक की सतह सामान्य से ठंडी हो जाती है, जो स्थानीय संवहनीय गतिविधियों (Convection) और बादलों के निर्माण को सीधे तौर पर प्रभावित करती है।

क्या चक्रवातों पर ब्रेक लगा सकती है Atlantic Niña? तटीय इलाकों के लिए राहत के संकेत

मौसम विज्ञानियों का ध्यान सबसे अधिक इस बात पर केंद्रित है कि क्या यह दोहरा संयोजन वर्ष 2026 के अटलांटिक हरीकेन सीजन (Hurricane Season) को शांत कर सकता है। किसी भी उष्णकटिबंधीय तूफान या चक्रवात को बनने और तीव्र होने के लिए दो प्रमुख चीजों की आवश्यकता होती है: पहला, समुद्र की सतह का अत्यधिक गर्म पानी जो उसे ऊर्जा प्रदान करता है, और दूसरा, वातावरण में हवा का कम वर्टिकल विंड शियर (Vertical Wind Shear)।

प्रशांत महासागर में सक्रिय अल नीनो अटलांटिक क्षेत्र के ऊपरी वायुमंडल में तेज हवाएं पैदा करता है, जिससे वर्टिकल विंड शियर काफी बढ़ जाता है। यह विंड शियर विकसित हो रहे तूफानों के ऊपरी ढांचे को छिन्न-भिन्न कर देता है। इसके साथ ही, अटलांटिक नीना के कारण समुद्र की सतह का ठंडा होना तूफानों को मिलने वाले ऊष्मीय ईंधन (Thermal Energy) में भारी कटौती करता है। यह दोहरा अवरोध अटलांटिक महासागर, मैक्सिको की खाड़ी और कैरेबियाई सागर में बड़े चक्रवातों की आवृत्ति और शक्ति को सीमित करने में काफी मददगार साबित हो सकता है, जिससे अमेरिका और मध्य अमेरिकी तटीय देशों को राहत मिलने की उम्मीद है।

भारतीय मानसून और कृषि क्षेत्र पर क्या होगा इसका प्रभाव?

भारत के संदर्भ में अल नीनो हमेशा से चिंता का सबब रहा है, क्योंकि ऐतिहासिक रूप से अल नीनो वर्षों के दौरान भारतीय दक्षिण-पश्चिम मानसून कमजोर पड़ता रहा है। हालिया आंकड़ों के अनुसार, देश में अगस्त माह के दौरान सामान्य से 16 प्रतिशत कम वर्षा दर्ज की गई, जबकि सितंबर के लिए भी मानसूनी बारिश के सामान्य से कम रहने का पूर्वानुमान है।

कमजोर मानसूनी फुहारों का सीधा असर न केवल खरीफ फसलों के अंतिम चरण पर पड़ रहा है, बल्कि मिट्टी की नमी घटने और प्रमुख जलाशयों के जलस्तर में कमी आने से आगामी रबी सीजन (विशेषकर गेहूं, सरसों और चना की बुवाई) के लिए भी चुनौतियां बढ़ सकती हैं। अटलांटिक नीना का क्षेत्रीय प्रभाव मुख्य रूप से पश्चिमी अफ्रीका और अटलांटिक बेसिन तक सीमित रहता है, इसलिए यह भारत पर पड़ रहे अल नीनो के नकारात्मक प्रभाव को सीधे तौर पर निष्प्रभावी नहीं कर सकती।

क्या Atlantic Niña पूरी तरह खत्म कर सकती है El Niño का असर?

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से यह समझना अनिवार्य है कि अटलांटिक नीना किसी भी परिस्थिति में प्रशांत महासागर के अल नीनो को मिटा या समाप्त नहीं कर सकती। दोनों घटनाएं अलग-अलग महासागरीय बेसिनों में घटित होती हैं और उनके अपने स्वतंत्र महासागरीय-वायुमंडलीय चक्र होते हैं।

अटलांटिक नीना केवल कुछ चुनिंदा क्षेत्रों में अल नीनो द्वारा उत्पन्न प्रभावों के साथ परस्पर क्रिया करके एक आंशिक वायुमंडलीय संतुलन (Atmospheric Counterbalance) बना सकती है। यह संतुलन अटलांटिक हरीकेन बेसिन में तो दिखाई दे सकता है, किंतु वैश्विक तापमान वृद्धि, प्रशांत बेसिन के सूखे और एशियाई मानसून पर अल नीनो का दबदबा काफी हद तक यथावत रहने की आशंका है। इसलिए इसे वैश्विक मौसम के लिए ‘सुरक्षा कवच’ मानने के बजाय एक सीमित क्षेत्रीय राहत के रूप में देखना अधिक तर्कसंगत है।

Atlantic Niña vs El Niño: मौसम विज्ञानियों के लिए दुर्लभ अवसर और भविष्य की चेतावनी

एक ही कालखंड में दो अलग-अलग महासागरों में विपरीत तापीय प्रणालियों का सक्रिय होना जलवायु वैज्ञानिकों के लिए आधुनिक मौसम मॉडलिंग को समझने का एक दुर्लभ अवसर है। इससे प्राप्त डेटा भविष्य में लंबी अवधि के मानसूनी और चक्रवाती पूर्वानुमानों को अधिक सटीक बनाने में सहायता करेगा।

यद्यपि अटलांटिक नीना ने तूफानों के खतरे को कुछ हद तक धीमा करने की उम्मीद जगाई है, किंतु दुनिया भर में पहले से मौजूद जलवायु परिवर्तन, बढ़ते वैश्विक तापमान और 2027 तक खिंचने वाले अल नीनो के मद्देनजर आपदा प्रबंधन तंत्र को अपनी सतर्कता में कोई कमी नहीं आने देनी चाहिए। महासागरों के इस बदलते मिजाज के बीच आगामी महीनों में मौसम के पैटर्न पर लगातार वैज्ञानिक निगरानी बेहद अहम बनी रहेगी।

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