Aravalli Engine: भारत का ‘अरावली’ इंजन बदलेगा रक्षा समीकरण, Mi-17 का बनेगा स्वदेशी विकल्प

HAL-Safran बनाएंगे 4000 SHP का इंजन, IMRH और DBMRH हेलीकॉप्टरों को मिलेगी ताकत

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Aravalli Engine: भारतीय रक्षा क्षेत्र में रणनीतिक स्वायत्तता और आत्मनिर्भरता की दिशा में एक ऐतिहासिक और क्रांतिकारी कदम उठाया गया है। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) और फ्रांस की दिग्गज एयरोस्पेस कंपनी सफ्रान हेलीकॉप्टर इंजिन्स (Safran Helicopter Engines) ने संयुक्त उपक्रम के तहत अगली पीढ़ी के हाई-पावर हेलीकॉप्टर इंजन ‘अरावली’ (Aravalli) के सह-डिजाइन और सह-विकास के लिए औपचारिक समझौता किया है।
यह भारत के रक्षा इतिहास में पहला अवसर होगा जब देश में 3500 से 4000 शाफ्ट हॉर्सपावर (SHP) क्षमता वाला अत्याधुनिक एयरो-इंजन स्वदेशी स्तर पर डिजाइन और विकसित किया जाएगा। यह शक्तिशाली इंजन भविष्य के 13-टन वजनी इंडियन मल्टी-रोल हेलीकॉप्टर (IMRH) और नौसेना के डेक-बेस्ड मल्टी-रोल हेलीकॉप्टर (DBMRH) को शक्ति प्रदान करेगा, जिससे भारतीय सशस्त्र बलों की रूसी Mi-17 और अन्य विदेशी हेलीकॉप्टरों पर निर्भरता पूरी तरह समाप्त हो जाएगी।

Aravalli Engine: फ्रांसीसी परंपरा और भारतीय विरासत का अनूठा संगम

फ्रांसीसी कंपनी सफ्रान की वैश्विक परंपरा रही है कि वह अपने प्रमुख हेलीकॉप्टर इंजनों का नाम विश्व प्रसिद्ध पर्वत श्रृंखलाओं, चोटियों और झीलों के नाम पर रखती है। भारत के साथ इस रणनीतिक साझेदारी के तहत इंजन का नाम भारत की सबसे प्राचीन, सुदृढ़ और भौगोलिक रूप से महत्वपूर्ण पर्वत श्रृंखला ‘अरावली’ के नाम पर रखा गया है।
जिस प्रकार अरावली पर्वतमाला युगों-युगों से अडिगता और स्थिरता का प्रतीक रही है, उसी प्रकार यह इंजन भी सियाचिन की बर्फीली चोटियों से लेकर हिंद महासागर की नम व खारी समुद्री हवाओं तक हर विषम परिस्थिति में भारतीय हेलीकॉप्टरों को अटूट शक्ति और विश्वसनीयता प्रदान करेगा।

कर्नाटक के तुमकुरु में होगा निर्माण, भारत को मिलेंगी कोर एयरो-इंजन तकनीकें

अरावली इंजन का विनिर्माण और असेंबली कर्नाटक के तुमकुरु स्थित एचएएल की अत्याधुनिक हेलीकॉप्टर फैक्ट्री और संयुक्त उपक्रम ‘सफल’ (SAFHAL Helicopter Engines) के संयंत्र में की जाएगी। इस संयुक्त विकास कार्यक्रम के तहत एचएएल को इंजन के सबसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील घटकों के डिजाइन तथा बौद्धिक संपदा अधिकारों (IPR) तक सीधी पहुंच प्राप्त होगी।
इस परियोजना के माध्यम से भारतीय इंजीनियरों को हाई-प्रेशर कंप्रेसर, पावर टर्बाइन, फ्यूल व ऑयल मैनेजमेंट सिस्टम, एक्सेसरी गियरबॉक्स और डिजिटल इंजन कंट्रोल सिस्टम (FADEC) जैसी उन्नत तकनीकों का प्रत्यक्ष डिजाइन अनुभव मिलेगा। इससे देश में एयरोस्पेस घटकों के निर्माण, प्रिसिजन मशीनिंग, स्पेशल अलॉय कास्टिंग और एमआरओ (MRO – मेंटेनेंस, रिपेयर व ओवरहॉल) का एक मजबूत घरेलू इकोसिस्टम तैयार होगा।

IMRH और DBMRH: सियाचिन से लेकर समुद्र तक मिशन के लिए तैयार

अरावली इंजन को विशेष रूप से भारतीय सेना, वायुसेना और नौसेना की भविष्य की बहुआयामी आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर तैयार किया जा रहा है। इंजन का विकास और उड़ान परीक्षण 2032-33 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।
यह इंजन 6,700 मीटर (लगभग 22,000 फीट) की अत्यधिक ऊंचाई पर भी पूरा थ्रस्ट बनाए रखने में सक्षम होगा। इसके दम पर सेना का आईएमआरएच हेलीकॉप्टर लद्दाख और सियाचिन जैसे बेहद ठंडे और विरल ऑक्सीजन वाले अग्रिम मोर्चों पर 24 से 36 पूर्णतः हथियारों से लैस सैनिकों को एक साथ एयरलिफ्ट कर सकेगा। वहीं नौसेना के डीबीएमआरएच संस्करण के लिए इंजन में जंग-रोधी एंटी-कोरोजन कोटिंग और मरीन पैकेजिंग दी जाएगी, जिससे यह एंटी-सबमरीन वॉरफेयर और समुद्री निगरानी अभियानों में लंबी दूरी तक निर्बाध उड़ान भर सकेगा।

रूसी Mi-17 का सटीक विकल्प और 2 लाख करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा की बचत

भारतीय वायुसेना वर्तमान में लगभग 250 रूसी मूल के Mi-17 और Mi-17V5 हेलीकॉप्टरों का संचालन कर रही है, जिन्हें अग्रिम चौकियों पर रसद पहुंचाने और सामरिक अभियानों का वर्कहॉर्स माना जाता है। हालांकि, वर्ष 2028-29 से इन हेलीकॉप्टरों के पुराने बेड़े चरणबद्ध तरीके से रिटायर होने शुरू हो जाएंगे। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद उत्पन्न भू-राजनीतिक चुनौतियों और स्पेयर पार्ट्स की अनिश्चितता ने विदेशी प्लेटफार्मों पर निर्भरता को बड़ा जोखिम बना दिया है।
रक्षा अनुमानों के अनुसार, अगले 15 वर्षों में इस भारी श्रेणी के हेलीकॉप्टरों के आयात, कलपुर्जों और मेंटेनेंस पर भारत को करीब दो लाख करोड़ रुपये खर्च करने पड़ते। अरावली इंजन आधारित स्वदेशी IMRH प्लेटफॉर्म के आने से न केवल इस भारी-भरकम धनराशि की बचत होगी, बल्कि युद्धकाल और आपात स्थितियों में स्पेयर पार्ट्स के लिए किसी अन्य देश पर निर्भर रहने की विवशता भी पूरी तरह खत्म हो जाएगी।

Aravalli Engine: सैन्य और नागरिक उड्डयन दोनों क्षेत्रों में होगा बहुआयामी उपयोग

अरावली इंजन केवल सैन्य अभियानों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका उपयोग भविष्य में ऑफशोर तेल व गैस खोज परिवहन, नागरिक उड्डयन, वीवीआईपी ट्रांसपोर्ट और भारी लॉजिस्टिक्स मिशनों में भी किया जा सकेगा।
लाइसेंस आधारित ‘स्क्रूड्राइवर असेंबली’ के दौर से निकलकर सह-डिजाइन और मूल बौद्धिक संपदा के स्तर पर पहुंचना भारत के एयरोस्पेस इतिहास में एक युगांतरकारी मोड़ है। अरावली परियोजना रक्षा विनिर्माण में ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान को एक मजबूत पंख देते हुए देश को वैश्विक एयरोस्पेस मानचित्र पर एक शक्तिशाली निर्यातक और डेवलपर के रूप में स्थापित करेगी।

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