Air India Flight Crash: एअर इंडिया विमान हादसे के एकमात्र बचे यात्री का दर्द, ‘दुनिया मेरा बचना देखती है, मैं अपना रोज मरना’
Air India Flight Crash: दुनिया मेरा बचना देखती है, मैं अपना रोज़ मरना
Air India Flight Crash: दुनिया की नजर में विश्वकुमार रमेश वह ‘भाग्यशाली’ शख्स हैं, जिन्होंने मौत के जबड़ों से वापसी की। लेकिन बंद कमरों में, अंधेरी रातों में और सन्नाटे के बीच रमेश जो जंग लड़ रहे हैं, उसका अंदाजा किसी को नहीं है। एअर इंडिया उड़ान AI-171 के उस भयानक हादसे को आज एक साल पूरा हो गया है, जिसमें 260 लोगों की जान चली गई थी। अपनी पहली बरसी पर रमेश ने अपनी चुप्पी तोड़ी है और उस अदृश्य बोझ के बारे में बताया है, जिसे वह पिछले 365 दिनों से ढो रहे हैं। उन्होंने कहा कि लोग मेरा बचना देखते हैं, लेकिन मेरे भीतर की एंग्जायटी और हर पल का सदमा किसी को दिखाई नहीं देता।
Air India Flight Crash: मौत के साए से बाहर आने का खौफनाक मंजर
पिछले साल 12 जून को अहमदाबाद के मेघानीनगर में जो हुआ, वह भारत के विमानन इतिहास की सबसे दर्दनाक घटनाओं में दर्ज हो गया। बोइंग 787 ड्रीमलाइनर उड़ान भरने के चंद मिनटों बाद ही एक मेडिकल कॉलेज के हॉस्टल परिसर पर जा गिरा। उस मलबे के बीच से जब रमेश बाहर निकले, तो उनके शरीर से खून बह रहा था और वे गहरे सदमे में थे। उस दिन न केवल उन्होंने विमान के 260 लोगों को खोया, बल्कि अपने भाई अजय को भी उसी मलबे में गंवा दिया। रमेश कहते हैं कि मैं जिंदा बचने के लिए आभारी तो हूं, लेकिन जीवित बचना इस पूरी कहानी का बस एक छोटा सा हिस्सा है। उस हादसे के बाद की जो जिंदगी उन्होंने जिया है, उसे शब्दों में पिरोना उनके लिए नामुमकिन सा है।
पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर और अपनों से दूरी
हादसे के बाद रमेश को ‘पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर’ (PTSD) डायग्नोस किया गया। इसका असर केवल उनके शरीर पर ही नहीं, बल्कि उनके निजी रिश्तों पर भी पड़ा है। रमेश ने भारी मन से स्वीकार किया कि वह अपने परिवार से पूरी तरह कट चुके हैं। वह अपनी पत्नी और बेटे से भी बात करने से कतराते हैं। अकेलेपन की चादर ओढ़े वह घंटों अपने कमरे में बैठे रहते हैं। यह उन लोगों के लिए एक कड़वी हकीकत है जो सोचते हैं कि विमान हादसे से बच जाना ही सब कुछ है। हादसे ने उनके भीतर का वह इंसान छीन लिया है, जो खुशियां बांटना जानता था। अब वहां सिर्फ सन्नाटा और खौफनाक यादें हैं।
परिवारों का इंतजार और अधूरी जांच रिपोर्ट
आज इस पहली बरसी पर केवल रमेश ही नहीं, बल्कि उन 260 परिवारों का दर्द भी ताजा हो गया है, जिन्होंने अपने अपनों को खोया था। शुक्रवार को जब पीड़ित परिवारों ने अपनों को याद किया, तो उनकी आंखों में एक ही सवाल था कि आखिर उस दिन क्या हुआ था? भारत की इस भीषण विमानन आपदा को एक साल बीत चुका है, लेकिन आधिकारिक तौर पर अभी तक अंतिम जांच रिपोर्ट सामने नहीं आई है। परिवार वाले आज भी उन जवाबों के इंतजार में हैं, जो बता सकें कि आखिर उस दिन विमान के साथ क्या तकनीकी खामी हुई थी। एयरलाइन और टाटा समूह के प्रतिनिधियों ने रमेश से मुलाकात कर उन्हें हर संभव सहयोग का भरोसा दिया है, लेकिन क्या कोई सहयोग उस खोए हुए भाई की भरपाई कर सकता है?
Air India Flight Crash: सर्वाइवर गिल्ट का मानसिक बोझ
रमेश का मामला ‘सर्वाइवर गिल्ट’ का एक मार्मिक उदाहरण है। अक्सर जो लोग किसी बड़ी त्रासदी से बच जाते हैं, वे यह सोचते हैं कि मैं क्यों बच गया और बाकी क्यों नहीं? यही विचार व्यक्ति को अंदर ही अंदर खत्म करने लगता है। रमेश का कहना है कि लोग मुझे भाग्यशाली कहते हैं, लेकिन उन्होंने अपना सब कुछ खो दिया है। यह अहसास उन्हें चैन की नींद नहीं सोने देता। एंग्जायटी के दौरे और रात भर जागने का क्रम उनकी दिनचर्या बन चुका है।
Air India Flight Crash: आगे का रास्ता क्या है?
भले ही एयरलाइन प्रबंधन रमेश की हर संभव मदद का वादा कर रहा हो, लेकिन मानसिक घावों का इलाज समय और अपनों के साथ की जरूरत होती है। रमेश की यह कहानी हमें याद दिलाती है कि किसी भी बड़ी त्रासदी के बाद का जीवन कितना चुनौतीपूर्ण होता है। समाज के तौर पर हमारी जिम्मेदारी केवल खबरों तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि उन लोगों के प्रति भी होनी चाहिए जो उन हादसों से बचकर तो आ गए, लेकिन अपनी पुरानी जिंदगी हमेशा के लिए खो बैठे। जब तक अंतिम जांच रिपोर्ट नहीं आती, तब तक उन परिवारों और रमेश के लिए यह घाव नासूर की तरह बना रहेगा। सच का सामने आना ही शायद उस अदृश्य बोझ को कम करने की पहली और आखिरी उम्मीद है।
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