ममता बनर्जी की राजनीतिक यात्रा: 1984 में जाधवपुर से सोमनाथ चटर्जी को दी पटखनी, खून से लाल साड़ी बांधकर लेफ्ट के खिलाफ सड़क पर उतरीं, 1990 का हमला बना टर्निंग पॉइंट

जाधवपुर की ऐतिहासिक जीत से लेकर हाजरा के हमले तक; ममता बनर्जी के 'लड़ाकू नेता' बनने का सफर

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Bengal Election 2026: पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी आज भारतीय राजनीति की सबसे मजबूत महिला नेताओं में शुमार हैं। लेकिन उनकी राजनीतिक यात्रा काफी संघर्षपूर्ण रही है। 1984 में मात्र 29 साल की उम्र में उन्होंने जाधवपुर लोकसभा सीट से लेफ्ट के दिग्गज नेता सोमनाथ चटर्जी को हराकर राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोरी थीं। यह जीत ममता बनर्जी को रातों-रात सियासत का बड़ा चेहरा बना गई। इसके बाद 1990 में हाजरा में हुए जानलेवा हमले ने उनकी राजनीतिक छवि को और मजबूत कर दिया।

1984 का लोकसभा चुनाव: सोमनाथ चटर्जी को दी पटखनी, रातों-रात बनीं चर्चा का विषय

ममता बनर्जी की राष्ट्रीय राजनीति में एंट्री 1984 के लोकसभा चुनाव से हुई। उस समय वे मात्र 29 साल की थीं। उन्होंने पश्चिम बंगाल की जाधवपुर सीट से चुनाव लड़ा और लेफ्ट फ्रंट के कद्दावर नेता सोमनाथ चटर्जी को शिकस्त दी। यह जीत इसलिए भी हैरान करने वाली थी क्योंकि सोमनाथ चटर्जी उस समय लेफ्ट की मजबूत पहचान थे और ममता बनर्जी राजनीति में नई थीं। इस जीत ने उन्हें भारत की सबसे युवा सांसदों में शामिल कर दिया। संसद में ममता बनर्जी की बोल्ड और मुखर शैली ने सबका ध्यान खींचा।

1990 का जानलेवा हमला: हाजरा में रैली के दौरान सिर पर रॉड से वार

ममता बनर्जी की राजनीतिक यात्रा में 16 अगस्त 1990 का दिन बेहद महत्वपूर्ण है। उस दिन कांग्रेस ने पश्चिम बंगाल बंद का आह्वान किया था। ममता बनर्जी खुद कोलकाता के हाजरा इलाके में रैली की अगुवाई कर रही थीं। रैली के दौरान हिंसक झड़प हुई और एक हमलावर ने उनके सिर पर रॉड से जोरदार वार कर दिया। इस हमले में ममता बनर्जी गंभीर रूप से घायल हो गईं। उनकी सफेद साड़ी खून से लाल हो गई। अस्पताल से बाहर आते ही सिर पर पट्टी बांधकर वे फिर सड़क पर उतर गईं और लेफ्ट सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करने लगीं।

हमले के बाद और मजबूत हुईं ममता: सिंगूर-नंदीग्राम आंदोलन और लेफ्ट की विदाई

1990 के हमले ने ममता बनर्जी को तोड़ने की बजाय और मजबूत बना दिया। उन्होंने लेफ्ट सरकार के खिलाफ खुलकर आवाज उठाई। 1997 में उन्होंने कांग्रेस छोड़कर तृणमूल कांग्रेस (TMC) की स्थापना की। सिंगूर और नंदीग्राम आंदोलन में ममता बनर्जी की भूमिका निर्णायक रही। उन्होंने किसानों के हक के लिए लंबा संघर्ष किया। इन आंदोलनों ने लेफ्ट सरकार की जड़ें हिला दीं। आखिरकार 2011 के विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी ने लेफ्ट को सत्ता से बेदखल कर दिया और पश्चिम बंगाल की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं।

2011 से अब तक सत्ता में: 2026 चुनाव में सरकार बचाने की चुनौती

2011 से लगातार ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री हैं। उन्होंने तीन बार चुनाव जीतकर अपनी सत्ता मजबूत की। लेकिन अब 2026 के विधानसभा चुनाव में उनकी सरकार बचाने की बड़ी चुनौती है। विपक्ष BJP और कांग्रेस गठबंधन बनाने की कोशिश कर रहा है। ममता बनर्जी की राजनीति हमेशा से जनता के मुद्दों पर केंद्रित रही है। उन्होंने महिलाओं, अल्पसंख्यकों और गरीबों के लिए कई योजनाएं शुरू कीं। लेकिन सत्ता में लंबे समय तक रहने के बाद भ्रष्टाचार और प्रशासनिक मुद्दों पर सवाल भी उठने लगे हैं।

Bengal Election 2026: ममता बनर्जी की विरासत, एक संघर्षशील महिला नेता की कहानी

ममता बनर्जी की कहानी एक साधारण परिवार से निकली महिला की जिद और संघर्ष की कहानी है। 1984 में सोमनाथ चटर्जी को हराकर उन्होंने साबित किया कि युवा और नई नेता भी बड़े चेहरों को चुनौती दे सकती है। 1990 के हमले ने उन्हें तोड़ने की बजाय और मजबूत बनाया। उनकी शैली हमेशा आक्रामक और जन-उन्मुख रही। ममता बनर्जी ने साबित किया कि महिलाएं राजनीति में पुरुषों से कम नहीं हैं। आज वे पश्चिम बंगाल की तीन बार मुख्यमंत्री हैं और उनकी यात्रा युवा नेताओं के लिए प्रेरणा है।

निष्कर्ष: ममता बनर्जी की राजनीति — साहस और जन-समर्थन का प्रतीक

ममता बनर्जी की राजनीतिक शुरुआत 1984 के चुनावी जीत से हुई। 1990 का हमला उनकी लड़ाई का प्रतीक बन गया। उन्होंने लेफ्ट की लंबी सत्ता को चुनौती दी और 2011 में सत्ता हासिल की। आज 2026 के चुनाव में वे अपनी सरकार बचाने की चुनौती का सामना कर रही हैं। उनकी कहानी साहस, संघर्ष और जन-समर्थन की मिसाल है। उनकी यात्रा पश्चिम बंगाल की राजनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी रहेगी।

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