Zepto and Zomato Online Orders: Zepto और Zomato से ऑनलाइन ऑर्डर करना हुआ महंगा, फ्री डिलीवरी की शर्तों और पैकेजिंग लागत में बदलाव से बढ़ेगा ग्राहकों का खर्च
Zepto ने फ्री डिलीवरी की सीमा बढ़ाई, Zomato पर सस्टेनेबल पैकेजिंग से बढ़ सकती है लागत
Zepto and Zomato Online Orders: क्विक कॉमर्स और फूड डिलीवरी प्लेटफॉर्म पर सामान या खाना मंगाना अब थोड़ा महंगा पड़ सकता है। जेप्टो ने फ्री डिलीवरी के लिए न्यूनतम ऑर्डर वैल्यू को 149 रुपये से बढ़ाकर 199 रुपये कर दिया है। वहीं जोमैटो पर सस्टेनेबल पैकेजिंग के इस्तेमाल से खाने के ऑर्डर की लागत 10 से 30 प्रतिशत तक बढ़ सकती है। इन बदलावों का सीधा असर आम ग्राहकों की जेब पर पड़ने वाला है, खासकर उन लोगों पर जो छोटी-मोटी चीजों के लिए बार-बार ऐप पर निर्भर रहते हैं।
जेप्टो का यह कदम ब्लिंकिट और इंस्टामार्ट जैसी प्रतिद्वंद्वी कंपनियों के नियमों के करीब ले आया है। पीक आवर्स यानी ज्यादा डिमांड वाले समय में यह मिनिमम ऑर्डर वैल्यू 299 रुपये तक भी पहुंच सकती है। कंपनी का फोकस अब सिर्फ ऑर्डर की संख्या बढ़ाने पर नहीं, बल्कि औसत कार्ट वैल्यू बढ़ाने पर है ताकि हर डिलीवरी पर होने वाले खर्च को नियंत्रित किया जा सके।
Zepto and Zomato Online Orders: जेप्टो ने क्यों बढ़ाई मिनिमम ऑर्डर वैल्यू
क्विक कॉमर्स बिजनेस में कम वैल्यू वाले ऑर्डर कंपनी के लिए नुकसानदायक साबित होते हैं। पैकेजिंग का खर्च और डिलीवरी पार्टनर को दिया जाने वाला भुगतान छोटी रकम के ऑर्डर पर आसानी से कवर नहीं हो पाता। जेप्टो ने इसी वजह से फ्री डिलीवरी की सीमा बढ़ा दी है। अब ग्राहकों को बिना डिलीवरी चार्ज के सामान मंगाने के लिए कम से कम 199 रुपये का कार्ट बनाना होगा।
इस बदलाव से कंपनी को उम्मीद है कि लोग फ्री डिलीवरी का फायदा उठाने के लिए कार्ट में ज्यादा आइटम ऐड करेंगे। इससे औसत बास्केट वैल्यू बढ़ेगी और डिलीवरी कॉस्ट का बोझ कम होगा। उद्योग के जानकारों का मानना है कि क्विक कॉमर्स कंपनियां लंबे समय से घाटे में चल रही थीं और अब वे प्रॉफिटेबिलिटी की ओर बढ़ने की कोशिश कर रही हैं। कम वैल्यू वाले ऑर्डर कम करने से ऑपरेशनल दक्षता सुधर सकती है।
ग्राहकों पर क्या पड़ेगा असर
आम आदमी के लिए यह बदलाव थोड़ा परेशान करने वाला साबित हो सकता है। कई लोग दूध, रोटी, अंडे या छोटी किराने की चीजें मंगाने के लिए जेप्टो जैसे ऐप का इस्तेमाल करते हैं। पहले 149 रुपये में फ्री डिलीवरी मिल जाती थी, अब 199 रुपये खर्च करने होंगे। पीक टाइम में तो यह सीमा और ऊंची हो जाएगी।
जो लोग रोजाना छोटी मात्रा में ऑर्डर करते हैं, उन्हें या तो डिलीवरी चार्ज देना पड़ेगा या कार्ट वैल्यू बढ़ाने के लिए अतिरिक्त सामान खरीदना होगा। इससे मासिक खर्च बढ़ सकता है। वहीं कुछ ग्राहक अब आसपास की दुकानों पर जाना पसंद कर सकते हैं जहां छोटी खरीदारी पर कोई अतिरिक्त चार्ज नहीं लगता।
जोमैटो पर पैकेजिंग की वजह से बढ़ सकती है कीमत
जोमैटो पर भी ग्राहकों को महंगाई का सामना करना पड़ सकता है। कंपनी अगर प्लास्टिक पैकेजिंग छोड़कर सस्टेनेबल और बायोडिग्रेडेबल सामग्री का इस्तेमाल शुरू करती है तो खाने की डिलीवरी 10 से 30 प्रतिशत तक महंगी हो सकती है। जोमैटो की चीफ सस्टेनेबिलिटी ऑफिसर अंजलि रवि कुमार ने इस बात की पुष्टि की है।
फिलहाल ज्यादातर फूड डिलीवरी प्लास्टिक के डिब्बों या रैपिंग में की जाती है। पैकेजिंग का खर्च ऑर्डर वैल्यू का करीब पांच प्रतिशत होता है, जो आमतौर पर ग्राहक ही वहन करता है। पर्यावरण के अनुकूल विकल्पों की ओर बढ़ने से यह खर्च काफी बढ़ सकता है। कंपनी पर्यावरण संबंधी चिंताओं और ग्राहकों की भुगतान क्षमता दोनों को ध्यान में रखकर फैसला ले रही है।
सस्टेनेबल पैकेजिंग की चुनौती और संभावना
प्लास्टिक पैकेजिंग पर्यावरण के लिए नुकसानदायक मानी जाती है। कई देशों में प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगाने की मांग बढ़ रही है। भारत में भी कई शहरों और राज्यों में सिंगल यूज प्लास्टिक पर पाबंदी लगाई जा चुकी है। ऐसे में फूड डिलीवरी कंपनियों पर दबाव है कि वे पर्यावरण अनुकूल विकल्प अपनाएं।
बायोडिग्रेडेबल पैकेजिंग महंगी पड़ती है क्योंकि इसकी उत्पादन लागत ज्यादा होती है और सप्लाई चेन अभी पूरी तरह विकसित नहीं हुई है। अगर जोमैटो और अन्य कंपनियां इसे अपनाती हैं तो लागत का बोझ या तो रेस्टोरेंट पर पड़ेगा या ग्राहक पर। कुछ कंपनियां इसे आंशिक रूप से अपने मार्जिन से कवर करने की कोशिश कर सकती हैं, लेकिन ज्यादातर मामलों में कीमतों में इजाफा होना तय है।
क्विक कॉमर्स और फूड डिलीवरी इंडस्ट्री का मौजूदा हाल
पिछले कुछ वर्षों में क्विक कॉमर्स और फूड डिलीवरी सेक्टर में भारी प्रतिस्पर्धा रही है। कंपनियों ने भारी छूट और फ्री डिलीवरी देकर ग्राहक आधार बढ़ाने की कोशिश की। इससे यूजर्स की संख्या तो बढ़ी लेकिन मुनाफा न के बराबर रहा। अब उद्योग धीरे-धीरे प्रॉफिट की ओर रुख कर रहा है।
ब्लिंकिट, इंस्टामार्ट और जेप्टो जैसी कंपनियां मिनिमम ऑर्डर वैल्यू बढ़ाकर, डिलीवरी फीस लगाकर और डार्क स्टोर की दक्षता सुधारकर घाटा कम करने की कोशिश कर रही हैं। जोमैटो और स्विगी भी प्लेटफॉर्म फीस, डिलीवरी चार्ज और पैकेजिंग लागत को लेकर नए प्रयोग कर रही हैं। ग्राहकों के लिए सुविधा तो बढ़ी है लेकिन धीरे-धीरे लागत भी बढ़ रही है।
ग्राहक कैसे बचा सकते हैं अतिरिक्त खर्च
ऐसे में ग्राहकों को थोड़ी स्मार्ट प्लानिंग की जरूरत है। छोटे ऑर्डर के बजाय हफ्ते भर की जरूरत का सामान एक साथ मंगाने से मिनिमम ऑर्डर वैल्यू आसानी से पूरी हो सकती है। कई ऐप पर मेंबरशिप प्लान उपलब्ध हैं जिनमें फ्री डिलीवरी या कम चार्ज का लाभ मिलता है।
लोकल किराना स्टोर या पास के रेस्टोरेंट से सीधे ऑर्डर करने का विकल्प भी खुला है। कई रेस्टोरेंट अब खुद की डिलीवरी सेवा दे रहे हैं जिसमें प्लेटफॉर्म चार्ज नहीं लगता। सस्टेनेबल पैकेजिंग वाले ऑप्शन चुनने से पर्यावरण को फायदा तो होगा लेकिन जेब पर बोझ बढ़ेगा, इसलिए जरूरत के हिसाब से फैसला लेना बेहतर रहेगा।
Zepto and Zomato Online Orders: आगे क्या हो सकता है
उद्योग के विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में और कंपनियां मिनिमम ऑर्डर वैल्यू बढ़ा सकती हैं। डिलीवरी चार्ज भी समय-समय पर रिवाइज हो सकते हैं। सस्टेनेबल पैकेजिंग को लेकर नियम सख्त होने पर फूड डिलीवरी की कीमतों में और इजाफा संभव है।
सरकार और रेगुलेटर अगर पैकेजिंग मानकों को लेकर कोई नई गाइडलाइन जारी करते हैं तो कंपनियों को उसके अनुरूप ढलना पड़ेगा। ग्राहकों की प्रतिक्रिया भी महत्वपूर्ण होगी। अगर लोग महंगे ऑर्डर से दूर रहने लगेंगे तो कंपनियों को अपनी रणनीति फिर से बदलनी पड़ सकती है।
कुल मिलाकर जेप्टो और जोमैटो के इन नए नियमों से ऑनलाइन ऑर्डरिंग का खर्चा बढ़ने वाला है। सुविधा और स्पीड तो बनी रहेगी लेकिन अब छोटी-छोटी खरीदारी पर भी ध्यान देना होगा। आम आदमी को अपनी जरूरत और बजट के हिसाब से ऐप का इस्तेमाल करना चाहिए ताकि अतिरिक्त बोझ से बचा जा सके।
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