India Malnutrition: भारत में कुपोषण का काला सच, कौन सा राज्य और जिला है सबसे आगे?

India Malnutrition: भारत में कुपोषण का काला सच, कौन सा राज्य और जिला है सबसे आगे?

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India Malnutrition: भारत में कुपोषण का काला सच, कौन सा राज्य और जिला है सबसे आगे?देश के किसी सुदूर कोने से जब कोई ऐसी खबर सामने आती है, जो दिल दहला दे, तो विकास के तमाम बड़े-बड़े दावे और आंकड़े कागजी साबित होने लगते हैं। मध्य प्रदेश के दतिया जिले से हाल ही में एक ऐसी ही झकझोर देने वाली घटना सामने आई है, जहां एक अतिकुपोषित बच्ची की दर्दनाक मौत ने पूरे सरकारी तंत्र की कलई खोलकर रख दी है। यह कोई पहली या इकलौती घटना नहीं है, बल्कि देश के कई हिस्सों में पसरी गहरी लाचारी और व्यवस्था की नाकामी का एक स्याह सच है। क्या देश के अन्न भंडारों में अनाज के सड़ने के बावजूद मासूम बच्चों की थाली खाली रहना हमारी सबसे बड़ी सामाजिक और प्रशासनिक विफलता नहीं है? इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए जब जमीनी हकीकत और सरकारी आंकड़ों की परतों को टटोलते हैं, तो तस्वीर बेहद डरावनी नजर आती है।

India Malnutrition: पोषण आहार प्लांट बंद और कागजी दावों की हकीकत

दतिया की यह हृदयविदारक घटना इस बात का जीता-जागता सबूत है कि जमीनी स्तर पर सरकारी योजनाएं किस कदर दम तोड़ रही हैं। मध्य प्रदेश की हजारों आंगनवाड़ियों में पंजीकृत बच्चों को साल भर में कम से कम तीन सौ दिन पौष्टिक आहार मिलना चाहिए, लेकिन हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। प्रशासनिक सुस्ती और घोर लापरवाही के चलते प्रदेश के कई पोषण आहार प्लांट भारी घाटे के फेर में पूरी तरह बंद हो चुके हैं। नई व्यवस्था के नाम पर सिर्फ कागजी घोड़े दौड़ाए जा रहे हैं, जबकि इसका सीधा खामियाजा बालाघाट से लेकर दतिया तक के उन मासूमों को भुगतना पड़ रहा है जिनका बचपन कुपोषण की भेंट चढ़ रहा है। बजट के बड़े-बड़े आंकड़ों के बावजूद धरातल पर बच्चों के मुंह से निवाला छिनता जा रहा है।

राज्यों की रैंकिंग में मध्य प्रदेश और झारखंड सबसे आगे

राष्ट्रीय स्तर पर स्वास्थ्य और पोषण की स्थिति का आकलन करने वाले नवीनतम आंकड़े बताते हैं कि बच्चों में कुपोषण का यह संकट कितना गहरा चुका है। ताजा रिपोर्ट के अनुसार, मध्य प्रदेश बाल कुपोषण के मामले में देश में सबसे खराब प्रदर्शन करने वाला राज्य बनकर उभरा है। यहां लगभग चौबीस प्रतिशत बच्चे दुबलेपन यानी वेस्टिंग का शिकार हैं, जो राष्ट्रीय औसत से काफी ज्यादा है। वहीं, कम वजन यानी अंडरवेट की श्रेणी में झारखंड सबसे आगे खड़ा है, जहां चालीस प्रतिशत से अधिक बच्चे इस गंभीर समस्या से जूझ रहे हैं। यह स्थिति स्पष्ट करती है कि देश के कई राज्यों में बच्चों का शारीरिक और मानसिक विकास किस तरह गंभीर रूप से अवरुद्ध हो रहा है।

सबसे ज्यादा प्रभावित जिले और आदिवासी इलाकों की लाचारी

अगर राज्यों से आगे बढ़कर जिलों के स्तर पर नजर डाली जाए, तो स्थिति और भी अधिक भयावह और चिंताजनक नजर आती है। उत्तर प्रदेश का चित्रकूट जिला हो या फिर गुजरात और झारखंड के सुदूर आदिवासी बहुल इलाके, हर जगह कुपोषण अपने पैर पसरे बैठा है। गुजरात के डांग, तापी और नर्मदा जैसे जिलों में गंभीर रूप से कुपोषित बच्चों का प्रतिशत बेहद ऊंचे स्तर पर बना हुआ है। पश्चिमी सिंहभूम और दुमका जैसे आदिवासी इलाकों में तो आधे से ज्यादा बच्चे कुपोषण की चपेट में अपनी जिंदगी जीने को मजबूर हैं। यह देखना वाकई हैरान करने वाला है कि तमाम कल्याणकारी योजनाओं के बाद भी देश के आखिरी छोर पर बैठे इन परिवारों तक बुनियादी पोषण क्यों नहीं पहुंच पा रहा है।

India Malnutrition: बुनियादी ढांचे और प्रशासनिक विफलता

इस विकट स्थिति के पीछे केवल भोजन की कमी ही नहीं, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था की गहरी खामियां भी जिम्मेदार हैं। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय को मिलने वाला बजट अक्सर जमीनी जरूरतों के मुकाबले आधा ही साबित होता है, जिससे कार्यक्रमों का क्रियान्वयन प्रभावित होता है। इसके अलावा, देश भर के लाखों आंगनवाड़ी केंद्र जर्जर इमारतों या बुनियादी सुविधाओं के अभाव में संचालित हो रहे हैं। एक तरफ जहां आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं पर अनगिनत जिम्मेदारियों का बोझ लाद दिया गया है, वहीं उनका मानदेय इतना कम है कि उनका जीवन संघर्ष में बीतता है। इसके साथ ही, जन्म के बाद छह महीने तक विशेष स्तनपान कराने के चलन में आती भारी गिरावट ने भी इस संकट को और ज्यादा हवा दी है।
व्यवस्था की इन तमाम दरारों के बीच हर साल हजारों मासूम दम तोड़ देते हैं और सरकारी फाइलें बंद कर दी जाती हैं। यदि समय रहते इन बुनियादी कमियों को दूर नहीं किया गया, तो देश की आने वाली पीढ़ी का भविष्य अंधेरे में डूबता चला जाएगा। अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि सरकार इस गंभीर राष्ट्रीय संकट से निपटने के लिए क्या कोई ठोस और त्वरित कदम उठाती है।

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