West Bengal SIR: पश्चिम बंगाल में 37 लाख SIR अपील लंबित, निपटारे में लग सकते हैं 12 साल

चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट से अधिकरणों की संख्या 42 करने और डिजिटल सुनवाई की अनुमति मांगी

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West Bengal SIR: पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान के दौरान नाम काटे जाने से प्रभावित लाखों नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों पर गहरा विधिक संकट मंडरा रहा है। उच्चतम न्यायालय के निर्देश पर गठित अपीलीय अधिकरणों (Appellate Tribunals) में लंबित अपीलों के निपटारे की वर्तमान गति को देखते हुए समस्त मामलों के निस्तारण में 12 वर्ष से अधिक यानी लगभग 146 महीने का लंबा समय लग सकता है। भारत निर्वाचन आयोग (ECI) ने सर्वोच्च अदालत में दाखिल अपने विस्तृत हलफनामे में इस चिंताजनक स्थिति को स्वीकार करते हुए तत्काल संस्थागत व तकनीकी सुधारों की अनुमति मांगी है।

तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ सांसद डेरेक ओ ब्रायन द्वारा दायर याचिका के उत्तर में दाखिल इस हलफनामे में निर्वाचन आयोग ने स्पष्ट किया है कि अपीलों की भारी संख्या और अधिकरणों के सीमित ढांचे के चलते वर्तमान गति से निष्पक्ष और समयबद्ध न्याय संभव नहीं हो पा रहा है। आयोग ने शीर्ष अदालत से गुहार लगाई है कि अपीलीय अधिकरणों की संख्या को तत्काल 24 से बढ़ाकर राज्य के कुल संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों के बराबर यानी 42 किया जाए। इसके साथ ही न्यायिक अधिकारियों को डिजिटल सुनवाई और वर्क फ्रॉम होम की विधिक अनुमति प्रदान की जाए, ताकि लाखों वैध नागरिकों को आगामी आम व प्रांतीय चुनावों से पूर्व मताधिकार प्राप्त हो सके।

West Bengal SIR: पांच महीनों में मात्र 1.26 लाख मामलों का निस्तारण

निर्वाचन आयोग द्वारा सुप्रीम कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत किए गए आधिकारिक आंकड़ों ने अपीलीय तंत्र की कार्यप्रणाली की वास्तविक सीमा को उजागर कर दिया है। हलफनामे के अनुसार, अप्रैल 2026 के मध्य से लेकर 16 सितंबर 2026 तक यानी विगत पांच महीनों में सभी अधिकरणों ने मिलकर केवल 1,26,194 अपीलों का अंतिम फैसला किया है।

सातों दिन निरंतर कार्य करने के बावजूद अधिकरणों द्वारा प्रति माह औसतन मात्र 25,238 मामलों का ही निस्तारण हो पा रहा है। 16 सितंबर 2026 तक की स्थिति के अनुसार अधिकरणों के पास कुल 37,05,235 (37 लाख से अधिक) आवेदन लंबित थे। यदि न्यायिक समीक्षा और दस्तावेजों के सत्यापन की गति यही बनी रही, तो शेष 37 लाख मामलों को निपटाने में कम से कम 146.8 महीने यानी 12 वर्ष और 2 महीने से अधिक का समय लगेगा। यह स्थिति लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिकों के मूल अधिकारों के सीधे हनन का कारण बन सकती है।

अधिकरणों की संख्या 24 से बढ़ाकर 42 करने और वर्चुअल सुनवाई का प्रस्ताव

लंबित मामलों के इस विशालकाय अंबार को नियंत्रित करने के लिए चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के सम्मुख दो प्रमुख व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत किए हैं। प्रथम प्रस्ताव के तहत राज्य में कार्यरत 24 अपीलीय अधिकरणों की संख्या को बढ़ाकर 42 करने की मांग की गई है, जिससे प्रत्येक लोकसभा क्षेत्र के लिए एक समर्पित अधिकरण उपलब्ध हो सके। इससे क्षेत्रीय स्तर पर मुकदमों का भार विभाजित होगा और न्यायिक प्रक्रिया सुव्यवस्थित हो सकेगी।

दूसरे महत्वपूर्ण प्रस्ताव में आयोग ने न्यायिक अधिकारियों के लिए ‘वर्क फ्रॉम होम’ और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से डिजिटल सुनवाई संचालित करने की अनुमति मांगी है। आयोग का तर्क है कि सेवानिवृत्त उच्च न्यायालय न्यायाधीशों और वरिष्ठ न्यायिक अधिकारियों को भौतिक रूप से अधिकरण कार्यालयों तक आने-जाने में लगने वाले समय की बचत होगी। डिजिटल सुनवाई के माध्यम से दूरदराज के क्षेत्रों में रहने वाले अपीलकर्ताओं और उनके अधिवक्ताओं की वर्चुअल उपस्थिति सुनिश्चित कर प्रतिदिन निपटाए जाने वाले मामलों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि की जा सकेगी।

विशेष गहन पुनरीक्षण और अपीलीय अधिकरणों की पृष्ठभूमि

पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की प्रक्रिया नवंबर 2025 में बड़े पैमाने पर शुरू की गई थी, जिसका घोषित उद्देश्य मतदाता सूची को शत-प्रतिशत शुद्ध, त्रुटिहीन और पारदर्शी बनाना था। इस सघन अभियान के दौरान विसंगतियों, पते के बदलाव और दस्तावेजी अपर्याप्तता के आधार पर लाखों की संख्या में मतदाताओं के नाम सूची से हटा दिए गए थे।

सूची से नाम विलोपन के विरुद्ध बड़े पैमाने पर असंतोष और राजनीतिक विवाद उत्पन्न होने के बाद मामला सर्वोच्च अदालत की दहलीज पर पहुंचा। मार्च 2026 में उच्चतम न्यायालय ने एक स्वतंत्र, पारदर्शी और न्यायिक अपील तंत्र स्थापित करने का ऐतिहासिक निर्देश दिया, जिसके अनुपालन में निर्वाचन आयोग ने अधिसूचना जारी कर उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की अध्यक्षता में अधिकरणों का गठन किया। कलकत्ता उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली समिति ने इन अधिकरणों के संचालन के लिए विस्तृत मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) भी तैयार की, किंतु अपीलों की अप्रत्याशित संख्या ने समूचे तंत्र को अत्यधिक दबाव में डाल दिया।

लाखों नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों पर असर

यदि अधिकरणों की कार्यप्रणाली और उनकी क्षमता में तत्काल विस्तार नहीं किया गया, तो लाखों पात्र मतदाताओं को अपने सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक अधिकार से वंचित रहना पड़ेगा। चुनाव आयोग द्वारा निपटाए गए शुरुआती 1.26 लाख मामलों में से एक बड़ी संख्या में अधिकरण ने अपीलकर्ताओं के पक्ष में निर्णय सुनाते हुए उनके नाम पुनः मतदाता सूची में शामिल करने के आदेश दिए हैं।

यह तथ्य प्रमाणित करता है कि प्रशासनिक स्तर पर की गई प्रारंभिक छंटनी में कई वास्तविक और वैध भारतीय नागरिकों के नाम त्रुटिवश हटा दिए गए थे। पश्चिम बंगाल जैसे संवेदनशील सीमावर्ती और सघन आबादी वाले राज्य में विधानसभा अथवा संसदीय चुनावों से पूर्व मतदाता सूची का शुद्ध होना अति आवश्यक है। वर्षों तक मामलों के लटके रहने से वे नागरिक अपने जनप्रतिनिधि चुनने की प्रक्रिया से स्वतः बाहर हो जाएंगे।

सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप पर टिकीं निगाहें

लोकतंत्र की जीवंतता इस बात पर निर्भर करती है कि किसी भी पात्र नागरिक का नाम अनुचित आधार पर मतदाता सूची से बाहर न रहे। चुनाव आयोग द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दाखिल यह हलफनामा इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि मौजूदा प्रशासनिक और न्यायिक संसाधन 37 लाख नागरिकों की याचिकाओं की सुनवाई के लिए सर्वथा अपर्याप्त हैं।

अब देश की सर्वोच्च अदालत के रुख पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं। यदि शीर्ष अदालत अधिकरणों की संख्या 42 करने, डिजिटल सुनवाई को अधिकृत करने और अतिरिक्त प्रशासनिक स्टाफ की तैनाती के प्रस्तावों को स्वीकृति दे देती है, तो निस्तारण की गति कई गुना बढ़ सकती है। इससे दशकों के संभावित विलंब को समाप्त कर लाखों मतदाताओं को समय पर न्याय और मताधिकार की गारंटी मिल सकेगी।

West Bengal SIR: निष्कर्ष

पश्चिम बंगाल में 37 लाख से अधिक वोटर अपीलों के निस्तारण में 12 साल लगने का गणितीय अनुमान देश के निर्वाचन इतिहास की सबसे बड़ी प्रशासनिक चुनौतियों में से एक को उजागर करता है। चुनाव आयोग द्वारा उच्चतम न्यायालय से मांगी गई राहत—जिसमें अधिकरणों की संख्या 42 करना और डिजिटल सुनवाई की अनुमति शामिल है—समय की अनिवार्य मांग है। विधिक प्रक्रियाओं को सरल और डिजिटल बनाकर ही लाखों नागरिकों के मताधिकार की समयबद्ध रक्षा की जा सकती है, ताकि भारतीय लोकतंत्र की समावेशी और निष्पक्ष साख अक्षुण्ण बनी रहे।

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