West Bengal OBC Reservation Survey: पश्चिम बंगाल में OBC आरक्षण पर बड़ा फैसला, नई सूची तैयार करने के लिए होगा महा-सर्वे
West Bengal OBC Reservation Survey: बंगाल में 7% हुआ ओबीसी कोटा
West Bengal OBC Reservation Survey: पश्चिम बंगाल की राजनीति और सामाजिक ताने-बाने से इस वक्त की एक बेहद महत्वपूर्ण और बड़ी खबर सामने आ रही है। राज्य में सत्ता परिवर्तन के बाद मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की अगुवाई वाली नई सरकार ने पूर्ववर्ती तृणमूल कांग्रेस (TMC) सरकार की ओबीसी आरक्षण नीति को पूरी तरह पलट दिया है। सोमवार को राज्य सचिवालय ‘नबान्न’ में हुई कैबिनेट और विधायकों की एक उच्च स्तरीय बैठक में यह निर्णय लिया गया कि राज्य में अब नए सिरे से ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) श्रेणियों का सर्वे कराया जाएगा, जिसकी विस्तृत रिपोर्ट अगले चार महीनों के भीतर सौंपनी होगी। इसके साथ ही सरकार ने कैबिनेट बैठक में ओबीसी आरक्षण के कोटे को भी 17 प्रतिशत से घटाकर दोबारा 7 प्रतिशत करने का एक बड़ा और नीतिगत फैसला लिया है।
प्रशासनिक स्तर पर उठाए गए इस कदम के तहत वर्ष 2011 के बाद से जारी किए गए सभी ओबीसी प्रमाण पत्रों की गहनता से जांच की जाएगी। कलकत्ता हाई कोर्ट के पिछले फैसलों को आधार बनाते हुए राज्य की वर्तमान सरकार अब एक पारदर्शी और त्रुटिहीन नई ओबीसी तालिका (OBC List) तैयार करने की कवायद में जुट गई है, जिससे आने वाले समय में राज्य की सियासत और प्रशासनिक व्यवस्था में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं।
West Bengal OBC Reservation Survey: मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने सचिवालय में विधायकों के साथ की अहम बैठक
सोमवार को राज्य सचिवालय नबान्न भवन में मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने अपनी पार्टी के 26 प्रमुख विधायकों के साथ एक अत्यंत महत्वपूर्ण समीक्षा बैठक की। इस बैठक में सिलीगुड़ी, पुरुलिया, बर्दवान और उत्तर 24 परगना समेत कई संवेदनशील और बड़े जिलों के जनप्रतिनिधियों को विशेष रूप से आमंत्रित किया गया था।
बैठक का मुख्य एजेंडा राज्य में प्रस्तावित ओबीसी सर्वे की रूपरेखा तैयार करना और जमीनी स्तर पर इसके क्रियान्वयन को सुनिश्चित करना था। मुख्यमंत्री ने बैठक में मौजूद सभी विधायकों को सख्त निर्देश दिए हैं कि वे अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों में जाकर नए सिरे से सामाजिक और आर्थिक वास्तविकताओं का आकलन करें। इस पूरी प्रक्रिया को बेहद पारदर्शी रखने की हिदायत दी गई है ताकि समाज के वास्तविक जरूरतमंदों को ही इस सूची में स्थान मिल सके।
2011 से जारी सभी ओबीसी सर्टिफिकेट्स की होगी कड़ाई से जांच
राज्य के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी और शहरी विकास मंत्री अग्निमित्रा पॉल ने सरकार के रुख को स्पष्ट करते हुए कहा है कि साल 2011 के बाद से राज्य में जितने भी ओबीसी सर्टिफिकेट जारी किए गए हैं, उन सभी की प्रामाणिकता की जांच की जाएगी। सरकार का मानना है कि पिछली सरकार के दौरान नियमों को ताक पर रखकर कई विसंगतियां की गई थीं।
विधायकों को निर्देश दिए गए हैं कि वे स्थानीय प्रशासन के साथ मिलकर चार महीने के भीतर अपनी विस्तृत सर्वे रिपोर्ट मुख्यालय को सौंपें। इस सर्वे के आधार पर एक व्यापक डेटाबेस तैयार किया जाएगा, जिसके बाद यह तय होगा कि कौन सी जाति या उपजाति इस नई आरक्षण तालिका का हिस्सा बनने की पात्रता रखती है।
West Bengal OBC Reservation Survey: क्यों रद्द की गई पुरानी ओबीसी आरक्षण पॉलिसी? जानिए कानूनी विवाद
पश्चिम बंगाल में ओबीसी आरक्षण का यह पूरा विवाद काफी पुराना है। पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के कार्यकाल के दौरान राज्य में ओबीसी आरक्षण के दायरे को 7 प्रतिशत से बढ़ाकर 17 प्रतिशत कर दिया गया था। इस नई सूची में कई मुस्लिम समुदायों को भी शामिल किया गया था, जिसे लेकर कानूनी और राजनीतिक हलकों में तीखी बहस छिड़ गई थी।
इस नीति के खिलाफ कलकत्ता हाई कोर्ट से लेकर देश की शीर्ष अदालत (सुप्रीम कोर्ट) तक याचिकाएं दायर की गई थीं। कलकत्ता हाई कोर्ट ने मामले की लंबी सुनवाई के बाद वर्ष 2010 के बाद जारी किए गए सभी ओबीसी प्रमाण पत्रों को प्रक्रियात्मक खामियों के कारण रद्द करने का ऐतिहासिक आदेश दिया था। हाई कोर्ट के इसी विधिक आदेश का पालन करते हुए वर्तमान सरकार ने पुरानी नीति को अमान्य घोषित कर नई सूची बनाने की प्रक्रिया शुरू की है।
राज्य मंत्रिमंडल की बैठक में लिए गए निर्णय के अनुसार, ओबीसी कोटे को 17% से घटाकर 7% करने के पीछे विधिक और संवैधानिक संतुलन को बहाल करना बताया गया है। नई सरकार का तर्क है कि आरक्षण की सूची को राजनीतिक लाभ-हानि से ऊपर उठकर पूरी तरह से निष्पक्ष और न्यायसंगत बनाया जाना चाहिए, ताकि न्यायालय के निर्देशों का अक्षरशः पालन हो सके।
West Bengal OBC Reservation Survey: जिलों में प्रशासनिक स्तर पर हलचल तेज, नई श्रेणियां होंगी चिन्हित
सरकार की इस घोषणा के बाद से ही राज्य के विभिन्न जिला प्रशासनों में हलचल काफी तेज हो गई है। उत्तर और दक्षिण 24 परगना, हावड़ा, हुगली और मालदा जैसे घनी आबादी वाले जिलों में पिछड़े वर्गों की पहचान के लिए विशेष टीमों का गठन किया जा रहा है।
शहरी विकास मंत्रालय और पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग संयुक्त रूप से इस सर्वे की डिजिटल मॉनिटरिंग करेंगे। विधायकों और स्थानीय निकायों के समन्वय से बनने वाली इस नई सूची में केवल उन्हीं जातियों को शामिल किया जाएगा, जो वास्तव में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ी हैं और जिनके पास इसके पर्याप्त विधिक साक्ष्य मौजूद हैं।
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