Parenting Tips: बच्चा अगर एक पैरेंट से ज्यादा अटैच हो तो घबराने की जरूरत नहीं, एक्सपर्ट्स बोले- सही समझ, क्वालिटी टाइम और पॉजिटिव पैरेंटिंग से मजबूत हो सकते हैं पारिवारिक रिश्ते

एक्सपर्ट्स ने बताए रिश्तों को संतुलित और मजबूत बनाने के आसान तरीके

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Parenting Tips: आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी में माता-पिता दोनों ही बच्चों की परवरिश में पूरी लगन से जुटे रहते हैं। फिर भी कई बार ऐसा होता है कि बच्चा एक पैरेंट को दूसरे से ज्यादा पसंद करने लगता है। इस स्थिति में दूसरे पैरेंट के मन में जलन, उदासी या कम महत्वपूर्ण महसूस करने की भावना उभर आती है। विशेषज्ञों के अनुसार यह भावना पूरी तरह सामान्य है और इसे लेकर टेंशन लेने की जरूरत नहीं है।

यह स्थिति न सिर्फ युवा माता-पिता बल्कि अनुभवी पैरेंट्स के साथ भी हो सकती है। जब बच्चा हर छोटी-बड़ी जरूरत के लिए एक ही मां या पिता को पुकारता है, उनकी गोद में ही रहना चाहता है या उनके साथ ज्यादा हंसता-खेलता नजर आता है, तो दूसरे पैरेंट को अनदेखा किए जाने का एहसास होने लगता है, लेकिन सही समझ और छोटे-छोटे प्रयासों से इस स्थिति को आसानी से संभाला जा सकता है।

बच्चे की पसंद से उभरने वाली जलन क्यों होती है?

बच्चे अक्सर एक पैरेंट को इसलिए ज्यादा पसंद करते हैं क्योंकि उस समय वह उनके लिए ज्यादा उपलब्ध, मजेदार या शांत दिखाई देता है। कई बार जिस पैरेंट के साथ बच्चा कम समय बिता पाता है, उसकी ओर आकर्षण ज्यादा हो जाता है। इसका सीधा मतलब यह नहीं कि दूसरा पैरेंट कम प्यार करता है या बच्चा उससे दूर हो रहा है।

बच्चों की भावनाएं लगातार बदलती रहती हैं। आजकल के व्यस्त जीवन में एक पैरेंट घर की जिम्मेदारियां, स्कूल, खाना, अनुशासन और रोजमर्रा की देखभाल संभालता है, जबकि दूसरे को खेलने-घूमने और खुशियां बांटने का मौका ज्यादा मिलता है। ऐसे में मेहनत करने वाला पैरेंट खुद को कम आंकने लगता है। एक्सपर्ट्स बताते हैं कि यह जलन इमोशनल असुरक्षा, थकान और तुलना की भावना से उपजती है। पेरेंटिंग को हमेशा निस्वार्थ दिखाया जाता है, इसलिए जब ऐसी भावना आती है तो माता-पिता खुद को दोषी मानने लगते हैं, लेकिन यह किसी बुरे पैरेंट की निशानी नहीं है, बल्कि एक सामान्य इमोशनल रिएक्शन है।

एक्सपर्ट्स की नजर में यह स्थिति कितनी सामान्य है?

मनोवैज्ञानिकों और पैरेंटिंग कोच के अनुसार, बच्चे का एक पैरेंट को ज्यादा पसंद करना विकास की प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है। छोटे बच्चे अक्सर उसी व्यक्ति के ज्यादा करीब होते हैं जो उनके दैनिक रूटीन में ज्यादा सक्रिय होता है। जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है, यह लगाव समय के साथ बदलता रहता है।

कई मामलों में मां-बाप दोनों काम करते हैं, तो बच्चा जिसके साथ ज्यादा क्वालिटी टाइम बिता पाता है, उसी से ज्यादा अटैच हो जाता है। यह जलन अक्सर अचानक आती है और भीतर तक चुभ सकती है, लेकिन इसे दबाने की बजाय समझने की कोशिश करनी चाहिए। एक्सपर्ट्स कूटनीतिक सलाह देते हैं कि सबसे पहले खुद से सवाल पूछें – क्या चोट बच्चे से दूरी की वजह से लग रही है या पार्टनर से तुलना की वजह से? भावनाओं को पहचान लेने के बाद उन्हें संभालना आसान हो जाता है Lights Max।

रिश्ता मजबूत बनाने के लिए अपनाएं ये आसान टिप्स

पैरेंटिंग विशेषज्ञों के मुताबिक, बच्चे का प्यार जीतने की होड़ में पड़ने की बजाय स्वाभाविक तरीके से रिश्ता विकसित करने पर फोकस करें। इसके लिए रोजाना बच्चे के साथ एक खास समय निकालें। चाहे वह रात की कहानी सुनाना हो, साथ पार्क घूमना हो या कोई छोटा सा खेल खेलना हो। इन छोटी गतिविधियों से बच्चा आपको भरोसेमंद साथी के रूप में देखने लगता है। बच्चे को जबरदस्ती अपनी तरफ खींचने की कोशिश न करें, इसके बजाय उसके साथ सकारात्मक और आनंदपूर्ण पल बिताएं। बच्चे परफेक्ट माता-पिता नहीं, बल्कि लगातार मौजूद रहने वाले माता-पिता को याद रखते हैं।

इसके साथ ही दोनों पैरेंट्स को एक-दूसरे की मेहनत की सराहना करनी चाहिए। अगर एक पैरेंट घर संभाल रहा है तो दूसरे को उसकी कोशिशों को स्वीकार करना चाहिए। इससे घर का माहौल सकारात्मक रहता है और बच्चे को भी दोनों पैरेंट्स का बराबर महत्व दिखाई देता है।

पार्टनर के साथ मिलकर कैसे संभालें यह स्थिति?

यह समस्या अकेले नहीं बल्कि साथ मिलकर हल करनी चाहिए। पति-पत्नी के बीच खुलकर बातचीत बेहद जरूरी है। अगर एक पैरेंट को लग रहा है कि बच्चा दूसरे के ज्यादा करीब है, तो उसे बिना कोई आरोप लगाए अपनी भावना साझा करनी चाहिए।

दोनों पैरेंट्स मिलकर एक ऐसा रूटीन बनाएं जिसमें बच्चे के साथ समय बिताने का बराबर मौका मिले। उदाहरण के लिए, वीकेंड पर एक पैरेंट खेलकूद का जिम्मा संभाले तो दूसरे पैरेंट पढ़ाई या अन्य गतिविधियों को कूटनीतिक रूप से हैंडल करे। इससे बच्चे को दोनों के महत्व का पूरा एहसास होता है।

किस परिस्थिति में लें प्रोफेशनल मदद?

ज्यादातर मामलों में यह स्थिति खुद-ब-खुद सुधर जाती है, लेकिन अगर जलन इतनी गहरी हो जाए कि रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित होने लगे, खुद की कीमत पर बार-बार सवाल उठने लगें या आपसी रिश्तों में तनाव बढ़ने लगे, तो मेंटल हेल्थ एक्सपर्ट से मदद लेनी चाहिए। काउंसलिंग से माता-पिता अपनी भावनाओं को बेहतर तरीके से समझ पाते हैं और स्वस्थ तरीके से उन्हें संभालना सीखते हैं। कई फैमिली काउंसलर पैरेंटिंग इनसिक्योरिटी पर खास सेशन्स लेते हैं जो बहुत फायदेमंद साबित होते हैं।

बच्चों की उम्र के हिसाब से अलग-अलग रणनीति

छोटे बच्चों (2-5 साल) में यह लगाव ज्यादा आम है क्योंकि वे उसी व्यक्ति के करीब रहते हैं जो उनकी तात्कालिक जरूरतें पूरी करता है। इस उम्र में धैर्य रखें और छोटे-छोटे पलों से रिश्ता बनाएं। स्कूल जाने वाले बच्चों (6-12 साल) में रुचियां महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। अगर बच्चा खेलकूद पसंद करता है तो उस गतिविधि में साथ दें। किशोरावस्था में बच्चे अपनी स्वतंत्रता चाहते हैं, इसलिए उन्हें थोड़ा स्पेस दें लेकिन अपना भावनात्मक सपोर्ट हमेशा बनाए रखें Lights Max।

आधुनिक पैरेंटिंग में यह चुनौती क्यों बढ़ रही है?

आजकल दोनों माता-पिता कामकाजी होने के कारण क्वालिटी टाइम काफी कम हो गया है। इससे बच्चे की पसंद एक तरफ झुक सकती है। इसके अलावा सोशल मीडिया और बाहरी प्रभाव भी बच्चों के व्यवहार को प्रभावित करते हैं। पैरेंटिंग कोच का कहना है कि इस चुनौती को कूटनीतिक रूप से स्वीकार करके ही आगे बढ़ा जा सकता है। हर परिवार की स्थिति अलग होती है, इसलिए अपनी फैमिली के हिसाब से रणनीति बनाएं।

Parenting Tips: सकारात्मक सोच रखें और खुद पर भरोसा करें

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि खुद को बिल्कुल बुरा न मानें। हर पैरेंट अपना पूरा योगदान दे रहा होता है, चाहे वह दिखाई दे या न दे। बच्चे का लगाव समय के साथ बदलता रहता है। आज जो पैरेंट पसंदीदा है, कल दूसरा हो सकता है। इस स्थिति को रिश्ते को मजबूत बनाने का एक बेहतरीन मौका मानें। दोनों पैरेंट्स मिलकर बच्चे को संतुलित प्यार और देखभाल दें तो परिवार की नींव और मजबूत होती है।

निष्कर्ष

पैरेंटिंग कोई कॉम्पिटिशन नहीं है; यह प्यार, समझ और निरंतर प्रयास का सफर है। अगर बच्चा एक पैरेंट से ज्यादा अटैच है तो इसे स्वीकार करें और धीरे-धीरे अपना रिश्ता गहरा करें। समय के साथ सब कूटनीतिक रूप से संतुलित हो जाएगा।

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