US Debt Impact on Indian Stock Market: अमेरिका के बढ़ते कर्ज से क्यों दबाव में भारतीय शेयर बाजार?

US Treasury Yield बढ़ने से FPI आउटफ्लो, रुपये और भारतीय शेयरों पर बढ़ रहा दबाव

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US Debt Impact on Indian Stock Market: भारतीय शेयर बाजार में पिछले एक वर्ष के दौरान देखा गया तेज उतार-चढ़ाव घरेलू कारकों के बजाय अंतरराष्ट्रीय वृहद-आर्थिक हलचलों से अधिक संचालित हो रहा है। दलाल स्ट्रीट पर बेंचमार्क सूचकांक सेंसेक्स और निफ्टी पर वैश्विक लिक्विडिटी का कड़ा पहरा है। ऐतिहासिक रूप से 82 हजार के उच्च स्तरों को छूने वाला सेंसेक्स पिछले बारह महीनों में टूटकर 72 हजार के मनोवैज्ञानिक दायरे में आ चुका है। बाजार विश्लेषक इस गिरावट और सुस्ती के पीछे अमेरिकी संघीय सरकार के अनियंत्रित कर्ज और वहां की 10 वर्षीय बॉन्ड यील्ड में आए अप्रत्याशित उछाल को सबसे प्रमुख कारक मान रहे हैं।

सामान्य दृष्टि से अमेरिकी राजकोषीय घाटा या वहां का सार्वजनिक ऋण सीधे तौर पर भारतीय कंपनियों के आंतरिक मुनाफे को प्रभावित नहीं करता, किंतु वैश्विक वित्तीय प्रणाली में अमेरिका केंद्रीय धुरी है। जब वाशिंगटन अपने विशाल बजट घाटे को पाटने के लिए रिकॉर्ड मात्रा में ट्रेजरी बॉन्ड जारी करता है और निवेशक भविष्य के मुद्रास्फीति जोखिमों के एवज में अधिक प्रतिफल की मांग करते हैं, तो उसका सीधा असर वैश्विक पूंजी प्रवाह पर पड़ता है। 10 वर्षीय अमेरिकी बॉन्ड प्रतिफल का 5.17 प्रतिशत के स्तर पर टिकना भारतीय इक्विटी के मूल्यांकन और विदेशी संस्थागत निवेश के लिए एक गंभीर चुनौती बनकर उभरा है।

US Debt Impact on Indian Stock Market: 40 ट्रिलियन डॉलर के मुहाने पर अमेरिकी कर्ज और ट्रेजरी यील्ड की उड़ान

अमेरिकी ट्रेजरी विभाग के आधिकारिक आंकड़ों और हालिया वैश्विक रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिका का राष्ट्रीय सार्वजनिक ऋण तेजी से 40 ट्रिलियन डॉलर के स्तर की ओर अग्रसर है। इस भारी उधारी की भरपाई के लिए अमेरिकी सरकार को वैश्विक वित्तीय बाजारों में लगातार नई प्रतिभूतियां बेचनी पड़ रही हैं। जब बाजार में बॉन्ड की आपूर्ति अत्यधिक बढ़ जाती है और निवेशकों को यह आशंका होती है कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व मुद्रास्फीति पर काबू पाने के लिए ब्याज दरों को लंबे समय तक ऊंचा रखेगा, तो वे इन बॉन्ड्स पर अधिक ब्याज यानी यील्ड की मांग करने लगते हैं।

पिछले एक वर्ष के भीतर 10 वर्षीय यूएस ट्रेजरी यील्ड में लगभग 102 आधार अंकों की भारी वृद्धि दर्ज की गई है, जिससे यह 5.17 प्रतिशत के आसपास पहुंच चुकी है। वैश्विक वित्त में इसे ‘जोखिम-मुक्त दर’ (Risk-Free Rate) का बेंचमार्क माना जाता है। जब किसी वैश्विक निवेशक को बिना किसी क्रेडिट जोखिम के दुनिया की सबसे मजबूत मुद्रा डॉलर में 5 प्रतिशत से अधिक का गारंटीड रिटर्न मिल रहा हो, तो वह स्वाभाविक रूप से भारत, ब्राजील या दक्षिण कोरिया जैसे विकासशील देशों के शेयर बाजारों से मिलने वाले रिटर्न और वहां के जोखिमों का पुनर्मूल्यांकन करने लगता है।

विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) की निरंतर बिकवाली और पूंजी का पलायन

भारतीय प्रतिभूति बाजार में विदेशी संस्थागत निवेशकों की उपस्थिति तरलता और बाजार की दिशा निर्धारित करने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड के आकर्षक होते ही अंतरराष्ट्रीय फंड प्रबंधकों के लिए ‘एसेट एलोकेशन’ का गणित पूरी तरह बदल गया है। भारत जैसे उभरते बाजारों में निवेश करते समय विदेशी निवेशकों को न केवल शेयर बाजार की अस्थिरता का जोखिम उठाना पड़ता है, बल्कि मुद्रा विनिमय दर (करेंसी रिस्क) का जोखिम भी झेलना पड़ता है।

यदि अमेरिकी बॉन्ड पर 5 प्रतिशत से अधिक रिटर्न उपलब्ध है, तो भारतीय बाजार में उन्हें आकर्षित करने के लिए कम से कम 12 से 14 प्रतिशत का ठोस रिटर्न मिलना चाहिए। जब ऐसा नहीं होता, तो विदेशी निवेशक अपने मुनाफे को सुरक्षित करने के लिए भारतीय शेयरों में बिकवाली करते हैं और उस पूंजी को वापस अमेरिकी ऋण बाजार में स्थानांतरित करते हैं। पिछले कुछ महीनों में भारतीय कैश सेगमेंट में एफपीआई द्वारा की गई भारी शुद्ध बिकवाली ने सेंसेक्स और निफ्टी पर निरंतर ऊपर से दबाव बनाए रखा है।

भारतीय रुपये की कमजोरी और कच्चे तेल के आयात का दोहरा संकट

विदेशी निवेशकों की बिकवाली का प्रभाव केवल शेयरों की कीमतों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह भारत के विदेशी मुद्रा बाजार को भी सीधे तौर पर अस्थिर करता है। जब कोई विदेशी निवेशक भारतीय इक्विटी बेचता है, तो उसे मिलने वाली राशि रुपये में होती है, जिसे वह तुरंत अमेरिकी डॉलर में परिवर्तित कर देश से बाहर ले जाता है। डॉलर की इस अचानक बढ़ी मांग से घरेलू मुद्रा रुपये पर मूल्यह्रास का दबाव बढ़ जाता है।

एक कमजोर रुपया भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए इसलिए चिंताजनक है क्योंकि देश अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरतों का 85 प्रतिशत से अधिक हिस्सा आयात करता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें पहले से ही ऊंचे स्तरों पर बनी हुई हैं और तेल का भुगतान अमेरिकी डॉलर में किया जाता है। रुपये की कमजोरी और महंगे कच्चे तेल का यह दोहरा संयोग भारत के आयात बिल और व्यापार घाटे को विस्तृत कर देता है, जिससे घरेलू बाजार में ‘आयातित मुद्रास्फीति’ (Imported Inflation) बढ़ने का खतरा उत्पन्न होता है।

ऊंचे मूल्यांकन वाले शेयरों और ग्रोथ स्टॉक्स पर बट्टे खाते का प्रभाव

अमेरिकी यील्ड में बढ़ोतरी का सबसे गंभीर तकनीकी प्रहार भारतीय कंपनियों के मूल्यांकन (Valuation) पर पड़ता है। वित्तीय सिद्धांतों के अनुसार, किसी भी विकासशील कंपनी के शेयर का वर्तमान मूल्य भविष्य में होने वाले संभावित नकदी प्रवाह के वर्तमान मूल्य (Discounted Cash Flow) पर आंका जाता है। जब वैश्विक जोखिम-मुक्त ब्याज दर में वृद्धि होती है, तो विश्लेषकों द्वारा भविष्य के मुनाफे को वर्तमान में बट्टे खाते (Discounting) में डालने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली दर (Cost of Capital) भी बढ़ जाती है।

डिस्काउंट रेट बढ़ते ही उन कंपनियों का मूल्यांकन स्वतः घट जाता है जिनका अधिकांश मुनाफा वर्तमान में न होकर भविष्य के वर्षों में आने की उम्मीद होती है। यही कारण है कि हाल के महीनों में भारतीय बाजार में अत्यधिक महंगे पीई अनुपात (Price-to-Earnings Ratio) पर कारोबार कर रहे न्यू-एज फिनटेक, सॉफ्टवेयर और टेक्नोलॉजी कंपनियों के साथ-साथ स्मॉलकैप और मिडकैप इंडेक्स में भारी बिकवाली देखने को मिली है। जिन शेयरों का मूल्यांकन बुनियादी आंकड़ों के बजाय केवल भविष्य की संभावनाओं पर टिका था, वे इस यील्ड उछाल में सर्वाधिक प्रभावित हुए हैं।

भारतीय सॉवरेन बॉन्ड बाजार पर असर और सरकारी उधारी लागत

अमेरिकी ऋण बाजार में जारी हलचल का असर भारत के घरेलू बॉन्ड बाजार पर भी स्पष्ट दिखाई दे रहा है। भारत के 10 वर्षीय बेंचमार्क सरकारी बॉन्ड की यील्ड भी हाल के कारोबारी सत्रों में चढ़कर चार महीने के उच्चतम स्तर के आसपास दर्ज की गई है। जब वैश्विक स्तर पर प्रतिफल बढ़ता है, तो विदेशी निवेशक भारतीय सरकारी प्रतिभूतियों से भी दूरी बनाने लगते हैं, जिससे घरेलू बॉन्ड यील्ड को ऊपर की ओर बढ़ना पड़ता है।

सरकारी बॉन्ड यील्ड बढ़ने का सीधा अर्थ यह है कि भारत सरकार और भारतीय कॉरपोरेट्स के लिए बाजार से नई पूंजी जुटाना महंगा हो जाता है। जब उधारी की लागत बढ़ती है, तो निजी क्षेत्र के पूंजीगत व्यय (Capex) और विस्तार योजनाओं की गति धीमी पड़ सकती है, जिससे दीर्घकालिक आर्थिक विकास दर पर प्रतिकूल असर पड़ने की आशंका उत्पन्न हो जाती है।

US Debt Impact on Indian Stock Market: घरेलू संस्थागत निवेशक बने मजबूत दीवार: फिर भी सतर्कता जरूरी

इस संपूर्ण वैश्विक उथल-पुथल के बीच भारतीय बाजार की सबसे बड़ी मजबूती इसके घरेलू निवेशक बनकर उभरे हैं। घरेलू संस्थागत निवेशकों (DIIs), विशेषकर व्यवस्थित निवेश योजना (SIP) के माध्यम से आ रहे म्यूचुअल फंड प्रवाह और खुदरा निवेशकों ने एफआईआई की बिकवाली को काफी हद तक अवशोषित किया है। यदि घरेलू नकदी का यह निरंतर सहारा न होता, तो वैश्विक यील्ड में 100 आधार अंकों के उछाल के बाद भारतीय सूचकांकों में और अधिक तीव्र गिरावट देखी जा सकती थी।

तथापि, बाजार विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि केवल घरेलू निवेश के बल पर बाजार को अनिश्चितकाल तक वैश्विक झटकों से पूरी तरह सुरक्षित नहीं रखा जा सकता। यदि अमेरिकी संघीय ऋण का संकट बढ़ता रहा और ट्रेजरी यील्ड लंबे समय तक 5 प्रतिशत से ऊपर बनी रही, तो भारतीय बाजार में उतार-चढ़ाव का यह दौर आगामी तिमाहियों में भी खिंच सकता है। निवेशकों के लिए समझदारी इसी में है कि वे केवल हेडलाइन तेजी के पीछे भागने के बजाय मजबूत बैलेंस शीट, कम कर्ज और वास्तविक नकदी प्रवाह वाली गुणवत्तापूर्ण कंपनियों पर ही अपना ध्यान केंद्रित रखें।

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