UP Election 2027: कुर्मी वोटबैंक का कितना असर, 50-60 सीटों पर प्रभाव और सत्ता में 40 विधायक
UP Election 2027: कुर्मी वोटबैंक का कितना असर, 50-60 सीटों पर प्रभाव और सत्ता में 40 विधायक
UP Election 2027: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले जातीय समीकरणों की चर्चा तेज हो गई है। ओबीसी राजनीति में कुर्मी समाज की भूमिका हमेशा से महत्वपूर्ण रही है। प्रदेश में कुर्मी-सैंथवार समाज की आबादी करीब 6 से 7 प्रतिशत बताई जाती है। यादवों के बाद ओबीसी में इसे बड़ी जातियों में गिना जाता है। भाजपा, समाजवादी पार्टी और अपना दल के अलग-अलग धड़े इस समुदाय के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश में लगे हैं। सवाल यह है कि यूपी की किन सीटों पर कुर्मी मतदाताओं का प्रभाव है और सत्ता में उनकी भागीदारी कितनी है।
UP Election 2027: कुर्मी समाज की आबादी और पहचान
उत्तर प्रदेश में कुर्मी समाज की आबादी 6 से 7 प्रतिशत के आसपास आंकी जाती है। पटेल, गंगवार, सचान, कटियार, निरंजन, चौधरी और वर्मा जैसे उपनामों से इस समुदाय के लोग पहचाने जाते हैं। हालांकि इन उपनामों का इस्तेमाल दूसरे समुदायों में भी होता है। इसलिए सिर्फ उपनाम के आधार पर किसी की जाति तय नहीं की जा सकती।
ओबीसी वर्ग में यादवों के बाद कुर्मी समाज की गिनती होती है। यही वजह है कि हर प्रमुख दल 2027 के चुनाव से पहले इस समुदाय को ध्यान में रखकर अपनी रणनीति बना रहा है।
किन जिलों और सीटों पर प्रभाव
कुर्मी समाज का प्रभाव पूर्वांचल, अवध, रुहेलखंड, तराई और बुंदेलखंड के अलग-अलग हिस्सों में बताया जाता है। जिन जिलों में समुदाय की उल्लेखनीय आबादी का जिक्र है उनमें महाराजगंज, संत कबीर नगर, कुशीनगर, मिर्जापुर, सोनभद्र, बरेली, उन्नाव, जालौन, फतेहपुर, प्रतापगढ़, कौशांबी, प्रयागराज, सीतापुर, बहराइच, श्रावस्ती, बलरामपुर, सिद्धार्थनगर, बस्ती, बाराबंकी और लखीमपुर खीरी शामिल हैं।
प्रदेश की करीब चार दर्जन विधानसभा सीटों पर कुर्मी मतदाताओं की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। कुछ अनुमानों में यह प्रभाव 50 से 60 सीटों तक बताया गया है। हालांकि यह कोई आधिकारिक सीटवार जातीय गणना नहीं है। किसी सीट का नतीजा सिर्फ एक समुदाय की आबादी से तय नहीं होता। उम्मीदवार, स्थानीय मुद्दे, गठबंधन और दूसरे मतदाता समूह भी अहम भूमिका निभाते हैं।
विधानसभा में कितने विधायक
उत्तर प्रदेश विधानसभा में कुर्मी समाज से जुड़े 40 विधायकों का उल्लेख है। इनमें 27 भाजपा गठबंधन से, 12 समाजवादी पार्टी से और एक कांग्रेस से बताए गए हैं। 2022 के विधानसभा चुनाव में इस समुदाय से 34 विधायक चुने गए थे। 2017 में भी यह संख्या 34 रही थी।
राज्य सरकार में भी कुर्मी समाज से जुड़े नेताओं की मौजूदगी का जिक्र किया गया है। स्वतंत्र देव सिंह, राकेश सचान, संजय गंगवार और आशीष पटेल को समुदाय से जुड़े कैबिनेट मंत्री बताया गया है। मंत्रियों की संख्या और पद समय के साथ बदल सकते हैं। इसलिए मौजूदा मंत्रिपरिषद की आधिकारिक सूची से पुष्टि जरूरी है।
लोकसभा में प्रतिनिधित्व
2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश से कुर्मी समाज के 11 सांसद चुने गए। इनमें सात समाजवादी पार्टी, तीन भाजपा और एक अपना दल (एस) से बताए गए हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव में इस समुदाय से आठ सांसद चुने गए थे।
यह प्रतिनिधित्व बताता है कि कुर्मी समाज के नेता अलग-अलग राजनीतिक दलों में मौजूद हैं। हालांकि सांसदों या विधायकों की जातीय पहचान से यह नहीं कहा जा सकता कि समुदाय का हर मतदाता उसी दल को समर्थन देता है।
दलों की रणनीति और बड़े चेहरे
भाजपा ने पंकज चौधरी को उत्तर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष की जिम्मेदारी दी है। पूर्वांचल में अनुप्रिया पटेल अपना दल (एस) का प्रमुख चेहरा हैं। समाजवादी पार्टी के साथ भी कुर्मी समाज से जुड़े कई नेता हैं। अपना दल के दूसरे धड़े में कृष्णा पटेल और पल्लवी पटेल की राजनीतिक भूमिका का उल्लेख किया जाता है।
इस तरह कुर्मी समाज का राजनीतिक प्रतिनिधित्व किसी एक पार्टी तक सीमित नहीं है। अलग-अलग क्षेत्रों में स्थानीय नेताओं का प्रभाव और दलों की रणनीति भी अलग हो सकती है। 2027 के चुनाव से पहले सभी प्रमुख दल इस समुदाय सहित विभिन्न ओबीसी समूहों के साथ अपना समर्थन मजबूत करने की कोशिश करेंगे।
यूपी की राजनीति में कुर्मी समाज का प्रतिनिधित्व, क्षेत्रीय प्रभाव और राजनीतिक भागीदारी महत्वपूर्ण विषय हैं। फिर भी किसी समुदाय को एकमुश्त वोटबैंक मानना सही नहीं होगा। मतदाताओं का फैसला स्थानीय समस्याओं, रोजगार, विकास, उम्मीदवारों, सरकार के कामकाज और अन्य मुद्दों से भी प्रभावित होता है। 2027 के चुनाव से पहले कुर्मी समाज की राजनीतिक भूमिका को समझने के लिए केवल आबादी के अनुमानों के बजाय सीटवार पिछले चुनावी नतीजों, उम्मीदवारों और क्षेत्रीय मुद्दों को भी देखना जरूरी होगा। सभी दल इस समुदाय पर नजर रखे हुए हैं लेकिन अंतिम फैसला मतदाता ही करेंगे।
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