Bengal Politics: बंगाल की सियासत में भूचाल, दो फूल अब इतिहास, टीएमसी के दोनों गुटों को मिला नया चुनाव चिन्ह और पहचान
Bengal Politics: बंगाल की सियासत में भूचाल, दो फूल अब इतिहास, टीएमसी के दोनों गुटों को मिला नया चुनाव चिन्ह और पहचान
Bengal Politics: पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस को जिस दो फूल के सिंबल से पहचाना जाता रहा है, वह चिन्ह अब चुनावी मैदान से बाहर हो चुका है। पार्टी में हुई टूट के बाद निर्वाचन आयोग ने ममता बनर्जी और बागी नेता रितब्रत बनर्जी, दोनों खेमों को अलग-अलग नाम और नए चुनाव चिन्ह सौंप दिए हैं। यह घोषणा ऐसे मौके पर हुई है जब नंदीग्राम और रेजिनगर सीटों पर छह अक्टूबर को उपचुनाव होने वाला है, यानी दोनों गुटों के पास खुद को नई पहचान के साथ जनता के सामने साबित करने के लिए बहुत कम वक्त बचा है। ममता बनर्जी की अगुवाई वाले धड़े को ऑल इंडिया तृणमूल ममता कांग्रेस नाम मिला है और उनका सिंबल फुटबॉल खिलाड़ी होगा, जबकि रितब्रत गुट डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस के नाम से लिफाफा चिन्ह लेकर उतरेगा। यह फैसला पार्टी के भीतर महीनों से चल रही खींचतान का ही नतीजा माना जा रहा है।
Bengal Politics: आखिर कैसे पहुंचा मामला नाम-निशान बदलने तक
टीएमसी के भीतर विवाद की जड़ नेतृत्व को लेकर उठे सवालों में छिपी है। रितब्रत बनर्जी गुट ने आयोग के सामने दावा पेश किया था कि पार्टी संविधान के हिसाब से ममता बनर्जी का अध्यक्ष पद पहले ही समाप्त हो चुका है और नई कार्यकारिणी ने अरुप रॉय को यह जिम्मेदारी सौंप दी है। इसके उलट ममता खेमे ने तर्क दिया कि संविधान के अनुसार पार्टी अध्यक्ष के तौर पर सारे अधिकार सिर्फ ममता बनर्जी के पास ही सुरक्षित हैं और नई नियुक्तियां करने का हक भी उन्हीं को है। दोनों पक्षों के परस्पर विरोधाभासी दावों के चलते आयोग को हस्तक्षेप करना पड़ा। लगभग एक हफ्ते पहले ही चुनाव आयोग ने दोनों गुटों से अपने-अपने पक्ष में सबूत और दस्तावेज पेश करने का निर्देश दिया था, ताकि असली पार्टी पर दावे का फैसला निष्पक्ष तरीके से किया जा सके।
गुरुवार को हुई पुराने सिंबल पर रोक, शुक्रवार को मिली नई पहचान
विवाद पर सुनवाई करते हुए आयोग ने गुरुवार को पहला बड़ा कदम उठाया और टीएमसी के मूल नाम व परिचित दो फूल-पत्तियों वाले चुनाव चिन्ह को फ्रीज करने का ऐलान कर दिया। इसका मतलब साफ था कि अब कोई भी गुट पुराने नाम या सिंबल का इस्तेमाल नहीं कर सकेगा, जब तक असली उत्तराधिकार का मसला हल नहीं होता। इसके ठीक अगले दिन यानी शुक्रवार को आयोग ने दोनों पक्षों की ओर से सुझाए गए नामों की सूची पर विचार करते हुए अंतिम निर्णय सुना दिया। ममता गुट ने आयोग को तीन विकल्प दिए थे, जिनमें से AITMC नाम को चुना गया, जबकि रितब्रत गुट के दो सुझाए नामों में से डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस को मंजूरी मिली। इस तरह महज दो दिनों के भीतर पार्टी की पुरानी पहचान पूरी तरह बदल गई।
कल्याण बनर्जी बोले, फैसला मंजूर नहीं मगर चारा भी नहीं
आयोग के फैसले पर ममता बनर्जी खेमे की प्रतिक्रिया तीखी रही। पार्टी सांसद कल्याण बनर्जी ने खुलकर कहा कि यह निर्णय उन्हें स्वीकार नहीं है, लेकिन मौजूदा हालात में फिलहाल कुछ किया नहीं जा सकता। उनके इस बयान से यह संकेत मिलता है कि पार्टी के भीतर नाराजगी गहरी है, भले ही तत्काल कोई कानूनी कदम न उठाया गया हो। राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी शुरू हो गई है कि क्या ममता गुट आने वाले दिनों में इस फैसले को अदालत में चुनौती देगा, हालांकि इस बारे में फिलहाल कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
विपक्ष ने चुनाव आयोग को घेरा, राहुल गांधी का सीधा हमला
टीएमसी के भीतर के इस विवाद ने राष्ट्रीय राजनीति में भी हलचल मचा दी है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने चुनाव आयोग के इस फैसले पर सीधा प्रहार करते हुए कहा कि भारतीय जनता पार्टी पहले वोट लूटने का आरोप झेलती रही है, और अब पार्टियों को ही छीनने का काम कर रही है। उन्होंने इसे केवल ममता बनर्जी की निजी लड़ाई न बताते हुए हर उस मतदाता की लड़ाई करार दिया, जो साफ-सुथरा और निष्पक्ष चुनाव चाहता है। कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल ने भी आयोग की भूमिका पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि निर्वाचन आयोग एक बार फिर सत्तारूढ़ भाजपा के इशारे पर काम करता नजर आया। विपक्ष की इन तीखी प्रतिक्रियाओं से साफ है कि यह मुद्दा आने वाले दिनों में और तूल पकड़ सकता है।
मतदाताओं के लिए नई चुनौती, पहचान का संकट
टीएमसी के लिए यह बदलाव सिर्फ नाम या निशान का मसला नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर पहचान का संकट भी है। दशकों से दो फूल के सिंबल के सहारे वोट मांगती आई पार्टी के कार्यकर्ताओं और समर्थकों के लिए अचानक नए चिन्ह के साथ मतदाताओं तक पहुंचना आसान नहीं होगा। फुटबॉल खिलाड़ी और लिफाफा, दोनों ही चिन्ह मतदाताओं के लिए बिल्कुल नए हैं, और चुनाव प्रचार के इतने कम समय में इन्हें जनता के दिमाग में बिठाना दोनों गुटों के सामने बड़ी चुनौती होगी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जिस गुट का संगठनात्मक ढांचा जमीन पर मजबूत होगा, वही इस बदलाव को बेहतर तरीके से भुना पाएगा।
नंदीग्राम-रेजिनगर उपचुनाव बनेगा पहली अग्निपरीक्षा
छह अक्टूबर को होने वाला नंदीग्राम और रेजिनगर उपचुनाव अब दोनों गुटों के लिए नई पहचान की सबसे पहली और सबसे बड़ी परीक्षा साबित होगा। यह नतीजे ही तय करेंगे कि बंगाल की जनता असली तृणमूल किसे मानती है, ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले AITMC को या रितब्रत बनर्जी के डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस को। दोनों पक्षों के लिए यह चुनाव सिर्फ सीट जीतने भर का मामला नहीं, बल्कि आने वाले विधानसभा चुनाव से पहले अपनी राजनीतिक साख और जनाधार साबित करने का मौका भी है।
पार्टी में हुई टूट के बाद चुनाव आयोग का यह फैसला बंगाल की सियासत में एक नया अध्याय जोड़ता है। दो फूल का पुराना सिंबल इतिहास बन चुका है, और अब मैदान में फुटबॉल खिलाड़ी व लिफाफा जैसे बिल्कुल नए निशान होंगे। जहां ममता गुट फैसले से नाखुश दिख रहा है, वहीं कांग्रेस जैसे विपक्षी दल भी आयोग की भूमिका पर सवाल उठा रहे हैं। आने वाला उपचुनाव यह साफ करेगा कि जनता किस गुट के साथ खड़ी होती है, और यही नतीजा आगे की बंगाल की सियासी दिशा भी तय करेगा।
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