Sonali Singh: टूटी कलाई से नहीं टूटा हौसला, गोरखपुर की सोनाली सिंह बनीं अंतरराष्ट्रीय हॉकी अंपायर
Sonali Singh: टूटी कलाई से नहीं टूटा हौसला, गोरखपुर की सोनाली सिंह बनीं अंतरराष्ट्रीय हॉकी अंपायर
Sonali Singh: उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले से एक ऐसी प्रेरक कहानी सामने आई है, जो हर उस युवा के लिए मिसाल बन सकती है जो विपरीत परिस्थितियों में अपने सपनों को अधूरा छोड़ देता है। बांसगांव थाना क्षेत्र के राजगढ़ गांव की रहने वाली 25 वर्षीय सोनाली सिंह ने एक गंभीर चोट के बावजूद हार मानने से इनकार कर दिया और आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हॉकी अंपायर के रूप में देश का नाम रोशन कर रही हैं। एक साधारण किसान परिवार से ताल्लुक रखने वाली सोनाली के पिता नवल किशोर सिंह का निधन हो चुका है, जबकि उनकी मां कंचन सिंह गृहिणी हैं। खिलाड़ी बनने का सपना देखने वाली सोनाली की कलाई में एक प्रतियोगिता के दौरान गंभीर चोट लग गई थी, जिसके बाद उनके करियर पर संकट के बादल मंडराने लगे थे। लेकिन मां और कोच के सहयोग से उन्होंने अंपायरिंग की राह चुनी और हाल ही में चीन में आयोजित महिला जूनियर हॉकी एशिया कप 2026 में अंपायरिंग कर अपनी काबिलियत साबित की।
Sonali Singh: साधारण परिवार से निकली असाधारण प्रतिभा
गोरखपुर के राजगढ़ गांव में जन्मी सोनाली सिंह का बचपन से ही खेलों की तरफ खास रुझान रहा। गांव के स्कूल में पढ़ाई के दौरान उन्होंने हॉकी खेलना शुरू किया और जल्द ही अपनी प्रतिभा से सबका ध्यान अपनी ओर खींच लिया। उनकी क्षमता को पहचानते हुए परिवार ने उनका दाखिला गोरखपुर के वीर बहादुर सिंह स्पोर्ट्स कॉलेज में करवाया, जहां उन्होंने पढ़ाई के साथ-साथ हॉकी की बारीकियां सीखनी शुरू कीं।
सात साल की मेहनत के बाद लगी गंभीर चोट
वीर बहादुर सिंह स्पोर्ट्स कॉलेज में करीब सात वर्षों तक कठिन ट्रेनिंग लेने के दौरान सोनाली ने स्कूल स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक कई जूनियर प्रतियोगिताओं में शानदार प्रदर्शन किया। हालांकि एक प्रतियोगिता के दौरान उनकी कलाई में एक गंभीर चोट लग गई, जिसके बाद ऑपरेशन कर उनकी कलाई में स्टील की तीन रॉड डालनी पड़ीं। इस दुर्घटना ने उनके खिलाड़ी बनने के सपने को लगभग खत्म ही कर दिया था।
मां और कोच ने बढ़ाया हौसला
चोट के बाद सोनाली और उनके परिवार को यह लगने लगा था कि खिलाड़ी के तौर पर उनका सफर शायद यहीं थम जाएगा। लेकिन इस मुश्किल दौर में उनकी मां कंचन सिंह और कोच शशि नवैत ने उनका मनोबल टूटने नहीं दिया। मां ने उन्हें यह समझाया कि जिंदगी में केवल खिलाड़ी बनना ही एकमात्र रास्ता नहीं होता, बल्कि खेल की दुनिया में और भी कई क्षेत्र हैं जहां पहचान बनाई जा सकती है। इसी बीच कोच शशि नवैत ने उन्हें अंपायरिंग के क्षेत्र में करियर बनाने की सलाह दी।
अंपायरिंग में शुरू किया नया सफर
कोच के सुझाव को गंभीरता से लेते हुए सोनाली ने हॉकी से जुड़े रहने के लिए अंपायर बनने का फैसला किया। उन्होंने शुरुआती प्रशिक्षण अपने कोच से लिया, इसके बाद भारतीय हॉकी फेडरेशन के अंपायर पैनल से जुड़े रघु प्रसाद आरवी से भी विशेष ट्रेनिंग हासिल की। लगातार मेहनत और समर्पण के बल पर सोनाली ने हॉकी अंपायर के रूप में एफआईएच की पात्रता हासिल कर ली, जो उनके करियर का एक अहम पड़ाव साबित हुआ।
राज्य से राष्ट्रीय स्तर तक बनाई पहचान
एफआईएच पात्रता हासिल करने के बाद सोनाली ने राज्य स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक आयोजित कई प्रतियोगिताओं में बतौर अंपायर अपनी सेवाएं दीं। उनकी निष्पक्ष निर्णय क्षमता और खेल की गहरी समझ ने उन्हें जल्द ही एक भरोसेमंद अंपायर के रूप में स्थापित कर दिया। उनके इसी प्रदर्शन को देखते हुए अंतरराष्ट्रीय हॉकी महासंघ ने उन्हें अपने अंपायर पैनल में शामिल किया, जो उनके लिए एक बड़ी उपलब्धि थी।
चीन में एशिया कप में की अंतरराष्ट्रीय अंपायरिंग
सोनाली सिंह के करियर का सबसे बड़ा पड़ाव तब आया जब उन्हें 4 से 13 सितंबर 2026 तक चीन के मोकी शहर में आयोजित महिला जूनियर हॉकी एशिया कप में अंपायरों के पैनल में शामिल किया गया। इस प्रतिष्ठित टूर्नामेंट के दौरान उन्होंने कई अहम मुकाबलों में सटीक और निष्पक्ष अंपायरिंग करते हुए अपनी काबिलियत का शानदार प्रदर्शन किया। गौरतलब है कि इस टूर्नामेंट में भारतीय टीम ने खिताब पर कब्जा जमाया, जिससे यह जीत सोनाली के लिए भी दोहरी खुशी का मौका बन गई।
Sonali Singh: युवाओं के लिए बनीं प्रेरणा
सोनाली सिंह की यह कहानी सिर्फ एक खिलाड़ी से अंपायर बनने की कहानी नहीं है, बल्कि यह उन तमाम युवाओं के लिए एक सीख भी है जो मुश्किल हालातों में हिम्मत हार जाते हैं। गोरखपुर जैसे छोटे शहर से निकलकर अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचने का उनका सफर यह दिखाता है कि सही मार्गदर्शन और अटूट संकल्प से किसी भी चुनौती को पार किया जा सकता है। आज वह क्षेत्र की कई युवा खिलाड़ियों और खासकर लड़कियों के लिए एक प्रेरणास्रोत बन चुकी हैं।
गंभीर चोट के बावजूद हार न मानने वाली सोनाली सिंह की यह यात्रा संघर्ष, समर्पण और सकारात्मक सोच की मिसाल पेश करती है। एक साधारण किसान परिवार से निकलकर अंतरराष्ट्रीय हॉकी अंपायर बनने तक का उनका सफर आसान नहीं रहा, लेकिन मां और कोच के सहयोग ने उन्हें हर मुश्किल दौर से उबारा। चीन में एशिया कप में उनकी अंपायरिंग और भारत की खिताबी जीत ने इस सफर को और भी यादगार बना दिया। सोनाली की यह कहानी बताती है कि सपने टूटने के बाद भी नए रास्ते खोजे जा सकते हैं, बशर्ते हौसला बुलंद रहे।
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