Teesta River Project: तीस्ता नदी प्रोजेक्ट पर चीन का दखल, भारत की सुरक्षा चिंताओं को दरकिनार कर बीजिंग ने दोहराया समर्थन
Teesta River Project: तीस्ता नदी प्रोजेक्ट पर चीन का दखल, भारत की सुरक्षा चिंताओं को दरकिनार कर बीजिंग ने दोहराया समर्थन
Teesta River Project: भारत और बांग्लादेश के बीच दशकों से तीस्ता नदी के जल बंटवारे को लेकर बातचीत चल रही है, लेकिन अब इस मामले में चीन की सीधी भागीदारी ने एक नया रणनीतिक मोड़ ले लिया है। भारत की गंभीर सुरक्षा चिंताओं को पूरी तरह नजरअंदाज करते हुए चीन ने बांग्लादेश की तीस्ता नदी व्यापक प्रबंधन और बहाली परियोजना (TRCMRP) के लिए अपना पूर्ण समर्थन फिर से दोहराया है। बीजिंग ने दो टूक शब्दों में कहा है कि बांग्लादेश के साथ उसका सहयोग किसी तीसरे पक्ष के प्रभाव से पूरी तरह मुक्त होना चाहिए। यह बयान सीधे तौर पर नई दिल्ली के लिए एक कूटनीतिक संदेश माना जा रहा है।
चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गुओ जियाकुन ने बीजिंग में मीडिया से बात करते हुए कहा कि चीन और बांग्लादेश का सहयोग किसी तीसरे देश को निशाना नहीं बनाता है। उनके अनुसार, यह परियोजना बांग्लादेश की जनता की आजीविका से सीधे जुड़ी हुई है और वहां की सरकार इसे लेकर काफी गंभीर है। चीन का कहना है कि वह व्यवहार्यता अध्ययन (feasibility study) के आधार पर इस काम को आगे बढ़ाने के लिए हर संभव सहयोग देने को तैयार है। लेकिन चीन की यह ‘आजीविका परियोजना’ भारत के लिए बड़ी बेचैनी का सबब बनी हुई है।
Teesta River Project: सिलीगुड़ी कॉरिडोर और भारत की सुरक्षा चिंताएं
भारत के लिए तीस्ता नदी परियोजना का मुद्दा सिर्फ पानी के बंटवारे का नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का है। तीस्ता नदी का बेसिन भारत के उत्तर-पूर्वी हिस्से के बेहद करीब है। सबसे बड़ी चिंता ‘सिलीगुड़ी कॉरिडोर’ को लेकर है, जिसे ‘चिकन नेक’ के नाम से भी जाना जाता है। यह संकरा गलियारा भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को शेष भारत से जोड़ता है।
रणनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि चीन इस इलाके में आधारभूत ढांचे के बहाने अपनी पैठ बनाता है, तो यह भारत के लिए सुरक्षा के लिहाज से एक बड़ा जोखिम हो सकता है। चीन की किसी भी प्रकार की सैन्य या तकनीकी मौजूदगी इस संवेदनशील कॉरिडोर के लिए भविष्य में खतरा पैदा कर सकती है। भारत लगातार इस बात पर जोर देता रहा है कि सीमावर्ती इलाकों में किसी भी बाहरी शक्ति का दखल क्षेत्रीय स्थिरता के लिए सही नहीं है।
बांग्लादेश का रुख और भविष्य की राह
इस पूरे मामले में बांग्लादेश की स्थिति संतुलन बनाने वाली रही है। बांग्लादेश के विदेश मंत्री खलीलुर रहमान ने जानकारी दी है कि दोनों देशों के विशेषज्ञ अब पहली बार इस परियोजना के लिए तकनीकी व्यवहार्यता अध्ययन शुरू करेंगे। उन्होंने स्पष्ट किया कि पिछली सरकारों के दौर में यह मामला इस चरण तक नहीं पहुंच पाया था। बांग्लादेश का मानना है कि चीन का निवेश और तकनीकी सहयोग उनके लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि तीस्ता नदी का प्रबंधन उनकी अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी है।
इस साल जनवरी में बांग्लादेश जल विकास बोर्ड और चीन की सरकारी कंपनी ‘पॉवर चाइना’ ने एक समझौता ज्ञापन (MoU) की अवधि बढ़ाने पर हस्ताक्षर किए थे। इससे साफ संकेत मिलते हैं कि ढाका और बीजिंग इस परियोजना को लेकर काफी गंभीर हैं। हालांकि, बांग्लादेश यह भी अच्छी तरह जानता है कि भारत के साथ उसके संबंध कितने गहरे हैं, इसलिए वह इस मामले में बहुत सावधानी से कदम आगे बढ़ा रहा है।
Teesta River Project: कूटनीतिक दबाव और भारत की रणनीति
चीन का यह कहना कि सहयोग ‘तीसरे पक्ष के प्रभाव से मुक्त’ होना चाहिए, सीधे तौर पर भारत की ओर इशारा है। बीजिंग चाहता है कि दक्षिण एशिया में उसके बढ़ते प्रभाव में भारत कोई बाधा न बने। वहीं, नई दिल्ली के लिए यह एक कूटनीतिक चुनौती है। भारत एक तरफ तो अपने पड़ोसी देशों के साथ बेहतर आर्थिक संबंध चाहता है, लेकिन दूसरी तरफ चीन के बढ़ते कदमों को अपनी सुरक्षा के नजरिए से भी देख रहा है।
भारत आने वाले दिनों में तीस्ता परियोजना से जुड़ी हर छोटी-बड़ी गतिविधि पर बारीक नजर रखेगा। नई दिल्ली लगातार बांग्लादेश को यह समझाने की कोशिश कर रही है कि उसके साथ सहयोग के दीर्घकालिक फायदे क्या हैं। भारत ने हमेशा कहा है कि वह बांग्लादेश के विकास के लिए हर संभव मदद करने को तैयार है, लेकिन चीन के साथ इस तरह के संवेदनशील प्रोजेक्ट्स पर भारत का रुख सदैव संशय से भरा रहा है।
Teesta River Project: आने वाला समय क्या संकेत देता है?
तीस्ता नदी परियोजना पर चीन की सक्रियता ने दक्षिण एशिया में एक नई कूटनीतिक बहस छेड़ दी है। यह केवल एक नदी के प्रबंधन का सवाल नहीं रह गया है, बल्कि यह इस बात का पैमाना बन गया है कि पड़ोसी देश अपनी विदेश नीति में चीन और भारत के बीच कैसे संतुलन बिठाते हैं। भारत के लिए इस क्षेत्र में अपनी पकड़ बनाए रखना और अपने सुरक्षा हितों की रक्षा करना सबसे बड़ी प्राथमिकता है।
आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि जब इस परियोजना का तकनीकी अध्ययन शुरू होगा, तो भारत सरकार की ओर से क्या कदम उठाए जाते हैं। क्या ढाका इस मुद्दे पर भारत की चिंताओं को पूरी तरह से दूर कर पाएगा, या यह परियोजना आने वाले सालों में भारत और बांग्लादेश के बीच एक कूटनीतिक तनाव का विषय बनी रहेगी? यह तो समय ही बताएगा, लेकिन फिलहाल चीन की इस चाल ने पूरे दक्षिण एशियाई भू-राजनीति को एक बार फिर से गर्मा दिया है। भारत को अब अपनी कूटनीतिक सक्रियता बढ़ानी होगी ताकि वह अपने सुरक्षा गलियारे को सुरक्षित रखते हुए पड़ोसी देशों के साथ अपने संबंधों को मजबूत बनाए रख सके।
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